भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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रहा, उत्तरमें पुरुत्कुलोत्पन्न वेणुदारी, विदर्भाधिपति सोमराज, भोजेश्वर रुक्मि, सूर्णाक्ष, अवंतिकाके विंद अनुविंद, दंतवक्त्र, क्षात्रलि, पुरमित्र, मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण, और पंचनदकी व्यवस्था की, पूर्वकी ओर उलूक केतव, अंशुमान्‌का पुत्र बृहत्क्षत्र, बृहधर्मन् जयद्रथ, उत्तमो जस काश्य, कैकेय, वैदिश, सितीदेशका राजा सांकृतिकी व्यवस्था की और पश्चिममें मद्राजा, कहलिंगेश, चेकितान, बाह्विक, काश्मीर नरेश गोनर्द, करूषेश, द्रुमराज दर्पतीय अनामयको खड़ा किया। इस युद्धमें जरासंध २० अक्षौहिणी सेना लाया था। इसके विरुद्ध यादवोंकी सेना छोटी थी। फिर भी यादवोंने इन्हे हराया। बलरामने जरासंधको हराया। जरासंधने कई बार ऐसा आक्रमण किया। कृष्णने सत्रह बार जरासंधका पराभव किया और यह अकारण वैर करता है, बार बार आक्रमण करता है इस लिये इससे बचनेके लिये कृष्णने सौराष्ट्रके पास द्वारका बसाई। सत्रह बार हारनेके बाद भी यह शांत नहीं रहा। इसने यवनराजा कालयवनकी सहायतासे अठारवी बार हमला किया। कालयवन यादवोंके पुरोहित आर्यका पुत्र ! किसी यादवसे अपमानित होकर आर्यने यादवोंका पराजय कर सकनेवाले पुत्रके लिये तपस्या की और शंकरसे ऐसा वर भी पा लिया। इस भांति यह आर्य-पुत्र यवनोंके घर पर पला और यवनोंका राजा भी बन गया। जरासंधने इससे संधि की और इसने उसी रोज मथुरा पर आक्रमण कर दिया। इसकी सेना भी बडी विशाल थी; जरासंधकी थी ही। इसी समय कृष्णने राजधानी बदली। सबको द्वारका पहुंचा कर कृष्ण मथुरा आये । और निःशस्त्र कृष्णको देख कर कालयवनने उनका पीछा किया। कृष्ण आगे, आगे आगे कृष्ण और पीछे पीछे कालयवन। जाते जाते कृष्ण एक गुफाके अंदर जा कर छिप गये। उस गुफामें महा पराक्रमी मुचकुंद राजा सोया था। कालयवनने उसको लाथ मार कर पूछा कृष्ण कहां ? देवोंका भी सेनापति बननेवाला मुचुकुंद ! मुचुकुंदने कालयवनको वहीं राख बना दिया। इन्हीं दिनों रुक्मिणी स्वयंवरमें कृष्णने शिशुपालका पराभव करके रुक्मिणीसे विवाह किया। स्यमंतक मणिकी चोरीके आरोपसे मुक्ति पानेके प्रयासमें सत्यभामा और जांबवतीसे विवाह हुआ। उसी स्यमंतक मणिके कारण कृष्णको शतधन्वाका वध करना पडा। इस घटनाके कुछ काल बाद पांडव और कृष्णका संबंध आया। द्रौपदी स्वयंवरके समय कृष्ण वहां थे। कृष्णने द्रौपदीके विवाहके समय पांडवोंको वस्त्राभरण भूषण भेजा था। जिसका पांडवोंने स्वीकार किया। यहींसे पांडव व कृष्णका संबंध प्रारंभ होता है। पांडवोंके साथ कृष्ण हस्तिनापुर भी गये थे। इंद्रप्रस्थ नगर बसानेके बाद वे और बलराम द्वारका आये। सुभद्रा विवाहके बाद भी कृष्ण कुछ काल पांडवोंके साथ रहे थे। आगे खांडवन दहनके बाद ये द्वारका गये। द्वारकामें एक नई समस्या कृष्णकी राह देख रही थी। जरासंधने २० हजार राज-पुत्रोंको बंदी बना रखा था। गुप्त रूपसे उन राज-पुत्रोंने मुक्तिकी याचना करनेके लिये कृष्णके पास अपना दूत भेजा था। उस दूतने कहा "यदि आप शीघ्रता करेंगे तो हमारे प्राण बचेंगे नहीं तो यज्ञमें हमारी आहुति पडेगी !" इस विषयमें कृष्ण अपने यादव साथियोंसे विचार विनिमय कर ही रहे थे युधिष्ठिरका दूत आया "युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहता है। आपको बुलाया है !!" कृष्ण सोचमें पडे अब किस ओर जाना चाहिए। -ज्ञानेश्वरी १०