भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 977

उद्धवने कहा "अपने विचारसे प्रथम युधिष्ठिरके पास जाना उचित होगा" और कृष्ण उन दूतोंको साथ लेकर ही इंद्रप्रस्थ गये । कृष्णने इंद्रप्रस्थसे ही उन राजाओंको संदेश भेज दिया । "जरासंधका वध करके तुम्हारी मुक्ति की जायेगी !" कृष्णको इंद्रप्रस्थमें देख कर पांडवोंको आनंद हुवा । राजसूय यज्ञ करनेके लिये पांडवोंको भी जरासंधको मारना आवश्यक था। इसलिये कृष्ण, अर्जुन और भीमको साथ लेकर मगध गये । भीमसे जरासंधका वध कराया और जरासंधके पुत्रका राज्याभिषेक करके २० हजार राजपुत्रोंको मुक्त किया । चेद देशमें पौंड्रक वासुदेव जो जरासंधका मित्र था अपनेको पुरुषोत्तम मान कर सत्ताधीश बना था। उसने अपनेको परमात्म रूप घोषित करके कृष्णको शरण आनेका संदेशा भेजा। प्रत्युत्तरमें कृष्ण चेदि देश पर चढ़ाई कर युद्धके लिये चल पडे । वह अपने मित्र काशीराजाके साथ कृष्णका ही स्वांग भरकर युद्ध करने आगे आया और कृष्णसे मारा गया । युधिष्ठिरने राजसूययज्ञमें भीष्माचार्यकी आज्ञासे कृष्णकी प्रथम पाद्यपूजा की। इससे शिशुपाल संतप्त हुवा । शिशुपाल चेदि प्रदेशका राजा था । इसकी माता श्रुतश्रवा, कृष्णकी बूआ । शिशुपाल अत्यंत शक्तिशाली था । यह जरासंधका सेनापति भी था। भाई होने पर भी सदैव कृष्णका द्वेष करता था और कृष्ण इसे सहन करता था । राजसूयज्ञकी राज-सभा में इसने भीष्मको भला बुरा कहा । युधिष्ठिरको धमकियां दीं । "रुक्मिणीने मेरा स्वीकार किया है और यह उसे अपनी पत्नी कहकर भगा कर ले गया है" कहता हुवा राज सभाके दरवाजेसे बाहर पडते समय इसे कृष्णने वहीं वध किया । कृष्णके चक्रसे यह राजसूयके राजदरबारमें ही मारा गया । युधिष्ठिरके यज्ञ-समाप्तिके बाद कृष्ण द्वारका गये । किंतु जब कृष्ण राजसूय यज्ञमें इंद्रप्रस्थ गये थे तब कृष्णकी अनुपस्थितिमें शाल्वने द्वारका पर आक्रमण कर दिया था। शाल्व दैत्य कुलका राजा था । जरासंधका सखा था। इसीने जरासंध और कालयवनमें संधि करायी थी। रुक्मिणीके विवाहके समय वह कृष्णसे पराजित हुवा था। इसने "निर्यादव पृथ्वी" करनेकी प्रतिज्ञा भी की थी । इसके लिये मायासुरसे सौभ नामक अभेद्य विमान भी बनवा लिया था और जब इसको ज्ञात हुवा कि कृष्ण यज्ञमें इंद्रप्रस्थ गये हैं इसने द्वारका पर आक्रमण किया। वहां प्रद्युम्न और शाल्वका २७ दिन तक भयंकर युद्ध हुवा और शाल्व अपना विमान लेकर सौभ देशको लौट गया किंतु कृष्णने इसका पीछा किया । इसने अनेक प्रकारकी चालें चलीं किंतु कृष्णने अपने चक्रसे इसका विमान तोड फोडकर फेंक दिया और इसका वध किया । इसके बाद शिशुपाल-शाल्वादिक मित्रोंके वधसे संतप्त विदूरथने मित्र-वधका बदला लेनेके लिये कृष्ण पर आक्रमण किया । कृष्णने इसका भी वध किया । कृष्णने शोणितपुरका राजा बाणासुरको जीतकर अपने पोते अनिरुद्धसे उसकी लडकी उषाका विवाह किया। वैसे ही प्राग्ज्योतिषपुरके नरकासुरको मार कर उसके बंदीगृहसे १६ हजार राजकन्याओंको मुक्त किया । विश्वकी प्रत्येक अच्छी वस्तु अपने पास होनी चाहिए, ऐसी नरकासुरकी इच्छा दीखती है । किंतु यह उन वस्तुओंका भोग नहीं करता था । नरकासुरने विश्वके विविध देशोंसे अनेक प्रकारके रत्न, वस्त्र, आभूषण आदिसे अपना कोश भर लिया था किंतु किसीका भोग नहीं किया । वैसे ही १६ हजार सुंदर कन्याओंको लाकर अपने राज्यमें रखा, पर उनका भी भोग ३१ परिशिष्ट १-