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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सेनापतिके रूपमें लड़नेकी आज्ञा मांगी। तब भीष्मने भी इसे उसका जन्म-वृत्त कह कर युद्ध रोकनेकी सलाह दी थी। किंतु कर्णने इसके प्रथम जब जब भीष्माचार्यकी अवहेलना की थी उन सबके लिये क्षमायाचना करते हुए भी यह बात माननेसे अस्वीकार कर दिया और कर्ण युद्ध-भूमि पर आया। कर्ण जैसे अद्वितीय धनुर्धरको वैसे ही सारथीकी आवश्यकता थी। उन दिनोंमें कृष्ण और शल्य ये दो ही महान सारथी थे। उसमें कृष्ण तो अर्जुनका सारथी था। शल्य मद्र देशका राजा था। क्षत्रिय था। महारथी था। वह कर्णका सारथ्य क्यों करें ? और कर्णका जन्म भी संदिग्ध था तब !! किंतु दुर्योधनने शल्यसे प्रार्थना की। शल्यने इसको अपना अपमान मान कर भी मित्र प्रेमके लिये "मैं जो उचित समझूंगा उससे कहूंगा !" इस शर्त पर सारथ्य किया और सारथ्य करते समय अर्जुनके शौर्यकी बखान करके कर्णका तेजोवध करने लगा। कर्णने इसको भी सहन करके उसको यथायोग्य उत्तर दे कर चुप किया। फिर शल्य भी कर्णको प्रोत्साहित करने लगा। इस युद्धमें अर्जुनने इसके पुत्र वृषसेनको मारा। तब इसे बडा दुःख हुआ। और वह अत्यंत आवेशमें आकर लड़ने लगा। उसको परशुरामका शाप स्मरण हो आया। अस्त्रोंकी विस्मृति होने लगी। ब्रह्मास्त्र का प्रयोग ही भूल गया। और इंद्रकी दी हुई वासवी शक्ति ! कर्णने वह अर्जुनके लिये संभालकर रखी थी किंतु जब द्रोणाचार्य सेनापति थे, जयद्रथ वध हुवा और रात्रीके समय भी युद्ध होने लगा, उस युद्धमें घटोत्कचने त्राहि मचा दिया। कौरव सेनाको उसने घासकी भांति काटा। वीरोंको वह पिस्सू खटमलोंकी भांति मसलने लगा। दुर्योधनको लगा भारत युद्ध सूर्यो- दयके पहले ही समाप्त हो जायेगा। कर्णके पास जा कर दुर्योधनने कहा "घटोत्कचपर वासवी शक्तिका प्रयोग करो !" कर्णने कहा "वह अर्जुनके लिये है !" दुर्योधन नहीं माना। अंतमें वह शक्ति उसको अपनी इच्छाके विरुद्ध घटोत्कच पर छोड़नी पडी !! अब बार बार प्रयत्न करने पर भी ब्रह्मास्त्र-प्रयोगका स्मरण ही नहीं होता और अरे ! उसका रथचक्र पृथ्वीने निगला ! वह रथपरसे उतरा। रथचक्र उठानेके लिये उसने "कुछ क्षण युद्ध रोकनेको" कहा किंतु कृष्णने उसके सारे कुकर्म उसको सुना कर पूछा "तब तुम्हारी धर्म-बुद्धि कहां गयी थी ?" और अर्जुनको कर्णपर आक्रमण करनेको कहा। ऐसी हालतमें कर्ण मारा गया। इस युद्धमें कर्णके ङ पुत्र मारे गये। इनमें से वृषसेन और सुदामाको अर्जुनने मारा। सत्यसेन, चित्रसेन, और सुशर्माको नकुलने मारा और सुषेणको भीमने। वैसे ही कर्णके छ भाई भी मारे गये। इनमेंसे शत्रुंजय, शत्रुंतप, तथा द्विपाटको अर्जुनने मारा। एकको अभिमन्यूने मारा। द्रुम और शूकरथको भीमने मारा। गीता अ० १. श्लो० ८-कृपाचार्य— उत्तर पांचालके राजकुलके गौतम नामक मुनिका पोता। गौतमको शरद्वान नामक एक लड़का था। वह महान् तपस्वी था। उसका तपो-भंग करनेके लिये इंद्रने एक अप्सरा भेज दी; उस समय इनको एक पुत्र और पुत्री हुई। ये दोनों संतान वनमें बढे। आगे उसी वनमें शिकार खेलनेके लिये जब शांतनु आया तब शांतनुने इन बालकोंको देख कर इन्हें घर ले गया। शांतनुकी कृपासे इनका पालन पोषण हुआ। इसलिये इन्हें कृप और कृपी कहा गया। यह कृपी आगे द्रोणाचार्यकी पत्नी हुई। ज्ञानेश्वरी ३६