भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 971

कर्ण तब एक प्रसिद्ध धनुर्धारी था। महारथी था। उसने सर्व प्रथम पांचाल पर आक्रमण करके द्रुपदराज और उनके अन्य अनुयायियोंसे कर ले लिया। फिर वह उत्तरकी ओर मुडा। उसने भगदत्तको जीता, हिम-पर्वतके राज्योंको जीता, फिर पूर्वकी ओर मुडा। नेपाल, वंग, कलिङ्ग, शुंडिक, मिथिला, मागध, कर्कखंड, भावद्गीर, अहिक्षत्र, वरसभूमि, मृत्तिकावती, मोहननगरी, कोसलनगरी, आदि जीतकर उन राजाओंसे कर ले लिया और दक्षिणकी ओर मुडा। दक्षिणमें कुंडिनपुरके रुक्मीको जीता, रुक्मी इसका मित्र बनकर दिग्विजयमें इसका साथी बन गया। इसके बाद, पांड्य, शैल, केरल, नील प्रदेशके राजाओंको जीता, इसके बाद चेदिराजाको जीता, पार्थ और अवंती राजाको जीता और पश्चिमकी ओर मुडा। पश्चिममें इसने यवन और बर्बर लोगोंको जीता। म्लेंच्छ, अरण्यवासी मद्र, रोहितक, आग्नेय, मालव आदि लोगोंका पराजय करके इसने अपना दिग्विजय पूर्ण किया। इससे, दुर्योधन आदि कौरवोंको यह विश्वास हो गया कि कर्ण पांडवोंको जीत सकेगा। कलिंगाधिपति चित्रांगदने जब अपनी कन्याका स्वयंवर रचा और दुर्योधन उस कन्याको उठा ले आया तब कर्णने ही दुर्योधनको चित्रांगदसे बचाया था। दुर्योधनकी कृपासे कर्ण अंगराज बना। अंगराज्य उस समयके भारतके १८ विभागोंमें एक विभाग था। अंगराज कर्ण, अत्यंत उदार प्रवृत्तिका राजा था। कोई भी ब्राह्मण कर्णके पास आकर रिक्तहस्त नहीं लौट सकता था। वह इच्छा दानी था। सदैव अपना सर्वस्व देनेको तैयार राहाता था। कर्णकी इसी उदारताका लाभ लेकर इंद्रने उसके स्वाभाविक कवच कुंडल शरीरसे तराश लिये। यह कवच कुंडल अमृतसे बने थे। स्वाभाविक रूपसे शरीरसे चिपके हुए थे। इसी कवचके कारण कर्ण आजेय्य था। इसी लिये अर्जुनके हितमें इंद्रने ब्राह्मण रूपसे कर्णके कवच कुंडल दानमें मांग लिये और कर्णने भी “यह कवच कुंडल शरीरसे छीलकर निकालने होगे। ऐसे करनेसे मेरा शरीर विद्रूप न हो” यह वर लेकर वे छोल दिये। सूर्यने ऐसे न करनेको कहा था किंतु कर्णने “आयुष्यसे कीर्ति महान् है !” कहते हुए सूर्यकी बातको अस्वीकार कर दिया। स्वयं कर्ण जब शांत भावसे अपना कवच-कुंडल छीलने लगा तब यह देख कर इंद्र चकित रह गया। इंद्रने कर्णके कवच कुंडल लेकर इसके उपलक्षमें उसको वासवी शक्ति दी जिस पर यह फेंकी जाय उसका वध हो सके। कर्णने ये कवच कुंडल अपना शरीर छील कर दिये इसलिये कर्णको वैकर्तन भी कहते हैं। कृष्ण जब शिष्टाईके लिये दुर्योधनके पास गया था तब कृष्णने कर्णको उसका जन्म रहस्य कह कर “पांडव-पक्ष ग्रहण करनेसे तू सम्राट बनेगा और पांडव तेरी सेवा करेंगे!” ऐसे कहा था। “इससे होनेवाला कुल-क्षय भी रुकेगा!” यह भी कहा था किंतु कर्णने कृष्णसे “तू कहता है यह मुझे मान्य है। मैं तेरी बात पर विश्वास करता हूं। कुंती मेरी मां है, पांडव भाई हैं किंतु राधाने मुझे अकृत्रिम स्नेह दिया है। अधिरथने उदार आश्रय दिया है। अनेक सूत-कन्याओंने मुझसे विवाह करके प्रेम दिया है। दुर्योधनको मैंने आजीवन मैत्रीका आश्वासन दिया है! यह सब छोड़कर मैं नहीं आ सकता !” यह कहते हुए उसे लौटा दिया। ये ही बातें उसने कुंतीसे कही थीं। कुंतीको इसने “अर्जुनके अलावा मैं और किसी पांडवका वध नहीं करूंगा” ऐसे वचन भी दिया था। भारत युद्धमें कर्णने यह वचन निभाया। भारत-युद्धमें भीष्म और द्रोणाचार्यके बाद कर्ण सेनापति हुवा। जब यह सेनापति बनाया गया तो सर्व प्रथम भीष्माचार्यके पास गया जो शर-शय्या पर पडे थे। भीष्मको प्रणाम करके इसने (३) २५ परिशिष्ट १.