भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 970, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 970

साथ ही साथ परशुरामने कर्णको आश्रम छोड़ कर जानेकी आज्ञा दी और जाते जाते "कोई भी क्षत्रिय तुझ जैसा योद्धा नहीं होगा !" ऐसा आशीर्वाद भी दिया । एक बार इसने मल्ल-युद्धमें जरासंधकी हड्डी-पसली ढीली कर दी थी ! इससे खुश होकर जरासंधने इसे मालिनी नगर देकर इससे स्नेह किया था। साथ साथ इनके हाथसे एक ब्राह्मणकी गायका बछडा मारा जानेसे ब्राह्मणने जीवन मरणके युद्धमें पृथ्वी तेरा रथचक्र निगलेगी !!" ऐसा शाप दिया। एक बार धृतराष्ट्रने कौरव-पांडवोंका शस्त्रास्त्र कौशल्य देखनेके लिये रंगभूमि तैयार की । उस समय कर्णने उद्धततासे केवल द्रोणाचार्य और कृपाचार्यको ही प्रणाम किया । उस प्रणाममें भी नम्रता नहीं थी। वैसे ही, सभी जब, अर्जुनका अस्त्र-कौशल्य देख प्रसन्न होकर उसका गुणवर्णन करने लगे तब कर्णने "मैं उससे भी अधिक कौशल्य दिखला सकता हूं" कहते हुए अर्जुनको द्वंद्व-युद्धके लिये ललकारा ! तब सब लोग आश्चर्य विमूढ होकर कर्णकी ओर देखने लगे। यह ध्यानमें रखना आवश्यक है कि इस समय अर्जुन ब्रह्मास्त्रकी सप्रयोग-प्रक्रिया जानता था और कर्ण उससे पूर्ण रूपसे अनभिज्ञ था । किंतु सुदैवसे ( कर्णके ?) कर्णके जन्मके विषयमें तब कोई कुछ नहीं जानते थे । तथा कर्णने अपने पालक पिता अधिरथको देख कर प्रणाम किया था, इसलिये सभी इसको सूतपुत्र तथा राधेय कहने लगे और द्वंद्वयुद्ध टल गया । किंतु कौरव पांडव वैरके साथ बढ़नेवाला कर्ण-पांडव वैर देख कर, कुंती मन ही मन रोती रही ! दुर्योधनने कर्णको अंग-देशका राजा बना दिया था । "इस उपकारके लिये मैं क्या दूं तुम्हे ?" कर्णने पूछा और दुर्योधनने कहा "चिर मैत्री !" जिसे कर्णने अंतिम क्षण तक निभाया । यह अकृत्रिम मित्रता सहज रूपसे बढ़ती ही गयी। कर्णने अनेक सूत-पुत्रियोंसे विवाह किया । द्रौपदी स्वयंवरमें भी यह गया था । जब यह मत्स्यभेदके लिये आगे बढा द्रौपदीके "मैं सूत-पुत्रका वरण नहीं करूंगी" कहनेसे पीछे हठ कर बैठ गया । पांडव-वनवासके दिनोंमें कौरव जिस घोष-यात्रामें गये थे उसमें कर्ण था। इस यात्रामें कौरव और चित्रसेन गंधर्वका युद्ध हुवा । इस युद्धमें कर्णने प्रथम चित्रसेनका पराभव किया था किंतु चित्रसेनकी सेना अकेले कर्ण पर टूट पडी ! कर्णका रथ तोड दिया। तब इसे विकर्णके रथ पर बैठ कर भाग जाना पडा और चित्रसेनने दुर्योधनको बंदी बना लिया। अर्जुनने जब दुर्योधनको चित्रसेनसे छुडाया तब लज्जित दुर्योधन प्रायोपवेशन करके मरनेकी बात करने लगा । ऐसी स्थितिमें कर्णने कहा था "द्यूतमें तुमने अर्जुनको जीता है। अर्जुन तुम्हारा दास है। अपने स्वामीके लिये लडना सेवकका स्वाभाविक धर्म है। तुम्हारे लिये इसमें दुःखकी क्या बात है ?" वैसे ही अज्ञातवासके उत्तर गोग्रहणमें भी कर्ण दुर्योधनके साथ था । दुर्योधनके साथ तब कर्ण, संसप्तक, सुशर्मा आदि थे इस युद्धमें भी कर्ण अर्जुनसे पराजित होकर भाग गया था । इस युद्धमें कर्णके सामने अर्जुनने उसका प्रिय बंधु शत्रुंतपका वध किया था। जब कभी कर्ण और अर्जुन आमने सामने आये हैं कर्ण पर अर्जुनकी विजय हुई है। कभी कर्ण अर्जुनका पराभव नहीं कर पाया । यद्यपि वह अपनेको अर्जुनसे श्रेष्ठ धनुर्धारी कहता रहा है । इसी बातको एक बार भीष्माचार्यने कहा था । अर्जुनने चित्ररथ गंधर्वसे दुर्योधनकी रक्षा की तब भीष्माचार्यने दुर्योधनको इसका महत्त्व समझाकर पांडवोंसे सख्य करनेको कहा था। तब दुर्योधन हंसा और कर्ण अपना पराक्रम दिखानेके लिये दिग्विजय करनेके लिये निकला । अंगराज ज्ञानेश्वरी ३४

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