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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

साथ ही साथ परशुरामने कर्णको आश्रम छोड़ कर जानेकी आज्ञा दी और जाते जाते "कोई भी क्षत्रिय तुझ जैसा योद्धा नहीं होगा !" ऐसा आशीर्वाद भी दिया । एक बार इसने मल्ल-युद्धमें जरासंधकी हड्डी-पसली ढीली कर दी थी ! इससे खुश होकर जरासंधने इसे मालिनी नगर देकर इससे स्नेह किया था। साथ साथ इनके हाथसे एक ब्राह्मणकी गायका बछडा मारा जानेसे ब्राह्मणने जीवन मरणके युद्धमें पृथ्वी तेरा रथचक्र निगलेगी !!" ऐसा शाप दिया। एक बार धृतराष्ट्रने कौरव-पांडवोंका शस्त्रास्त्र कौशल्य देखनेके लिये रंगभूमि तैयार की । उस समय कर्णने उद्धततासे केवल द्रोणाचार्य और कृपाचार्यको ही प्रणाम किया । उस प्रणाममें भी नम्रता नहीं थी। वैसे ही, सभी जब, अर्जुनका अस्त्र-कौशल्य देख प्रसन्न होकर उसका गुणवर्णन करने लगे तब कर्णने "मैं उससे भी अधिक कौशल्य दिखला सकता हूं" कहते हुए अर्जुनको द्वंद्व-युद्धके लिये ललकारा ! तब सब लोग आश्चर्य विमूढ होकर कर्णकी ओर देखने लगे। यह ध्यानमें रखना आवश्यक है कि इस समय अर्जुन ब्रह्मास्त्रकी सप्रयोग-प्रक्रिया जानता था और कर्ण उससे पूर्ण रूपसे अनभिज्ञ था । किंतु सुदैवसे ( कर्णके ?) कर्णके जन्मके विषयमें तब कोई कुछ नहीं जानते थे । तथा कर्णने अपने पालक पिता अधिरथको देख कर प्रणाम किया था, इसलिये सभी इसको सूतपुत्र तथा राधेय कहने लगे और द्वंद्वयुद्ध टल गया । किंतु कौरव पांडव वैरके साथ बढ़नेवाला कर्ण-पांडव वैर देख कर, कुंती मन ही मन रोती रही ! दुर्योधनने कर्णको अंग-देशका राजा बना दिया था । "इस उपकारके लिये मैं क्या दूं तुम्हे ?" कर्णने पूछा और दुर्योधनने कहा "चिर मैत्री !" जिसे कर्णने अंतिम क्षण तक निभाया । यह अकृत्रिम मित्रता सहज रूपसे बढ़ती ही गयी। कर्णने अनेक सूत-पुत्रियोंसे विवाह किया । द्रौपदी स्वयंवरमें भी यह गया था । जब यह मत्स्यभेदके लिये आगे बढा द्रौपदीके "मैं सूत-पुत्रका वरण नहीं करूंगी" कहनेसे पीछे हठ कर बैठ गया । पांडव-वनवासके दिनोंमें कौरव जिस घोष-यात्रामें गये थे उसमें कर्ण था। इस यात्रामें कौरव और चित्रसेन गंधर्वका युद्ध हुवा । इस युद्धमें कर्णने प्रथम चित्रसेनका पराभव किया था किंतु चित्रसेनकी सेना अकेले कर्ण पर टूट पडी ! कर्णका रथ तोड दिया। तब इसे विकर्णके रथ पर बैठ कर भाग जाना पडा और चित्रसेनने दुर्योधनको बंदी बना लिया। अर्जुनने जब दुर्योधनको चित्रसेनसे छुडाया तब लज्जित दुर्योधन प्रायोपवेशन करके मरनेकी बात करने लगा । ऐसी स्थितिमें कर्णने कहा था "द्यूतमें तुमने अर्जुनको जीता है। अर्जुन तुम्हारा दास है। अपने स्वामीके लिये लडना सेवकका स्वाभाविक धर्म है। तुम्हारे लिये इसमें दुःखकी क्या बात है ?" वैसे ही अज्ञातवासके उत्तर गोग्रहणमें भी कर्ण दुर्योधनके साथ था । दुर्योधनके साथ तब कर्ण, संसप्तक, सुशर्मा आदि थे इस युद्धमें भी कर्ण अर्जुनसे पराजित होकर भाग गया था । इस युद्धमें कर्णके सामने अर्जुनने उसका प्रिय बंधु शत्रुंतपका वध किया था। जब कभी कर्ण और अर्जुन आमने सामने आये हैं कर्ण पर अर्जुनकी विजय हुई है। कभी कर्ण अर्जुनका पराभव नहीं कर पाया । यद्यपि वह अपनेको अर्जुनसे श्रेष्ठ धनुर्धारी कहता रहा है । इसी बातको एक बार भीष्माचार्यने कहा था । अर्जुनने चित्ररथ गंधर्वसे दुर्योधनकी रक्षा की तब भीष्माचार्यने दुर्योधनको इसका महत्त्व समझाकर पांडवोंसे सख्य करनेको कहा था। तब दुर्योधन हंसा और कर्ण अपना पराक्रम दिखानेके लिये दिग्विजय करनेके लिये निकला । अंगराज ज्ञानेश्वरी ३४

कर्ण तब एक प्रसिद्ध धनुर्धारी था। महारथी था। उसने सर्व प्रथम पांचाल पर आक्रमण करके द्रुपदराज और उनके अन्य अनुयायियोंसे कर ले लिया। फिर वह उत्तरकी ओर मुडा। उसने भगदत्तको जीता, हिम-पर्वतके राज्योंको जीता, फिर पूर्वकी ओर मुडा। नेपाल, वंग, कलिङ्ग, शुंडिक, मिथिला, मागध, कर्कखंड, भावद्गीर, अहिक्षत्र, वरसभूमि, मृत्तिकावती, मोहननगरी, कोसलनगरी, आदि जीतकर उन राजाओंसे कर ले लिया और दक्षिणकी ओर मुडा। दक्षिणमें कुंडिनपुरके रुक्मीको जीता, रुक्मी इसका मित्र बनकर दिग्विजयमें इसका साथी बन गया। इसके बाद, पांड्य, शैल, केरल, नील प्रदेशके राजाओंको जीता, इसके बाद चेदिराजाको जीता, पार्थ और अवंती राजाको जीता और पश्चिमकी ओर मुडा। पश्चिममें इसने यवन और बर्बर लोगोंको जीता। म्लेंच्छ, अरण्यवासी मद्र, रोहितक, आग्नेय, मालव आदि लोगोंका पराजय करके इसने अपना दिग्विजय पूर्ण किया। इससे, दुर्योधन आदि कौरवोंको यह विश्वास हो गया कि कर्ण पांडवोंको जीत सकेगा। कलिंगाधिपति चित्रांगदने जब अपनी कन्याका स्वयंवर रचा और दुर्योधन उस कन्याको उठा ले आया तब कर्णने ही दुर्योधनको चित्रांगदसे बचाया था। दुर्योधनकी कृपासे कर्ण अंगराज बना। अंगराज्य उस समयके भारतके १८ विभागोंमें एक विभाग था। अंगराज कर्ण, अत्यंत उदार प्रवृत्तिका राजा था। कोई भी ब्राह्मण कर्णके पास आकर रिक्तहस्त नहीं लौट सकता था। वह इच्छा दानी था। सदैव अपना सर्वस्व देनेको तैयार राहाता था। कर्णकी इसी उदारताका लाभ लेकर इंद्रने उसके स्वाभाविक कवच कुंडल शरीरसे तराश लिये। यह कवच कुंडल अमृतसे बने थे। स्वाभाविक रूपसे शरीरसे चिपके हुए थे। इसी कवचके कारण कर्ण आजेय्य था। इसी लिये अर्जुनके हितमें इंद्रने ब्राह्मण रूपसे कर्णके कवच कुंडल दानमें मांग लिये और कर्णने भी “यह कवच कुंडल शरीरसे छीलकर निकालने होगे। ऐसे करनेसे मेरा शरीर विद्रूप न हो” यह वर लेकर वे छोल दिये। सूर्यने ऐसे न करनेको कहा था किंतु कर्णने “आयुष्यसे कीर्ति महान् है !” कहते हुए सूर्यकी बातको अस्वीकार कर दिया। स्वयं कर्ण जब शांत भावसे अपना कवच-कुंडल छीलने लगा तब यह देख कर इंद्र चकित रह गया। इंद्रने कर्णके कवच कुंडल लेकर इसके उपलक्षमें उसको वासवी शक्ति दी जिस पर यह फेंकी जाय उसका वध हो सके। कर्णने ये कवच कुंडल अपना शरीर छील कर दिये इसलिये कर्णको वैकर्तन भी कहते हैं। कृष्ण जब शिष्टाईके लिये दुर्योधनके पास गया था तब कृष्णने कर्णको उसका जन्म रहस्य कह कर “पांडव-पक्ष ग्रहण करनेसे तू सम्राट बनेगा और पांडव तेरी सेवा करेंगे!” ऐसे कहा था। “इससे होनेवाला कुल-क्षय भी रुकेगा!” यह भी कहा था किंतु कर्णने कृष्णसे “तू कहता है यह मुझे मान्य है। मैं तेरी बात पर विश्वास करता हूं। कुंती मेरी मां है, पांडव भाई हैं किंतु राधाने मुझे अकृत्रिम स्नेह दिया है। अधिरथने उदार आश्रय दिया है। अनेक सूत-कन्याओंने मुझसे विवाह करके प्रेम दिया है। दुर्योधनको मैंने आजीवन मैत्रीका आश्वासन दिया है! यह सब छोड़कर मैं नहीं आ सकता !” यह कहते हुए उसे लौटा दिया। ये ही बातें उसने कुंतीसे कही थीं। कुंतीको इसने “अर्जुनके अलावा मैं और किसी पांडवका वध नहीं करूंगा” ऐसे वचन भी दिया था। भारत युद्धमें कर्णने यह वचन निभाया। भारत-युद्धमें भीष्म और द्रोणाचार्यके बाद कर्ण सेनापति हुवा। जब यह सेनापति बनाया गया तो सर्व प्रथम भीष्माचार्यके पास गया जो शर-शय्या पर पडे थे। भीष्मको प्रणाम करके इसने (३) २५ परिशिष्ट १.

सेनापतिके रूपमें लड़नेकी आज्ञा मांगी। तब भीष्मने भी इसे उसका जन्म-वृत्त कह कर युद्ध रोकनेकी सलाह दी थी। किंतु कर्णने इसके प्रथम जब जब भीष्माचार्यकी अवहेलना की थी उन सबके लिये क्षमायाचना करते हुए भी यह बात माननेसे अस्वीकार कर दिया और कर्ण युद्ध-भूमि पर आया। कर्ण जैसे अद्वितीय धनुर्धरको वैसे ही सारथीकी आवश्यकता थी। उन दिनोंमें कृष्ण और शल्य ये दो ही महान सारथी थे। उसमें कृष्ण तो अर्जुनका सारथी था। शल्य मद्र देशका राजा था। क्षत्रिय था। महारथी था। वह कर्णका सारथ्य क्यों करें ? और कर्णका जन्म भी संदिग्ध था तब !! किंतु दुर्योधनने शल्यसे प्रार्थना की। शल्यने इसको अपना अपमान मान कर भी मित्र प्रेमके लिये "मैं जो उचित समझूंगा उससे कहूंगा !" इस शर्त पर सारथ्य किया और सारथ्य करते समय अर्जुनके शौर्यकी बखान करके कर्णका तेजोवध करने लगा। कर्णने इसको भी सहन करके उसको यथायोग्य उत्तर दे कर चुप किया। फिर शल्य भी कर्णको प्रोत्साहित करने लगा। इस युद्धमें अर्जुनने इसके पुत्र वृषसेनको मारा। तब इसे बडा दुःख हुआ। और वह अत्यंत आवेशमें आकर लड़ने लगा। उसको परशुरामका शाप स्मरण हो आया। अस्त्रोंकी विस्मृति होने लगी। ब्रह्मास्त्र का प्रयोग ही भूल गया। और इंद्रकी दी हुई वासवी शक्ति ! कर्णने वह अर्जुनके लिये संभालकर रखी थी किंतु जब द्रोणाचार्य सेनापति थे, जयद्रथ वध हुवा और रात्रीके समय भी युद्ध होने लगा, उस युद्धमें घटोत्कचने त्राहि मचा दिया। कौरव सेनाको उसने घासकी भांति काटा। वीरोंको वह पिस्सू खटमलोंकी भांति मसलने लगा। दुर्योधनको लगा भारत युद्ध सूर्यो- दयके पहले ही समाप्त हो जायेगा। कर्णके पास जा कर दुर्योधनने कहा "घटोत्कचपर वासवी शक्तिका प्रयोग करो !" कर्णने कहा "वह अर्जुनके लिये है !" दुर्योधन नहीं माना। अंतमें वह शक्ति उसको अपनी इच्छाके विरुद्ध घटोत्कच पर छोड़नी पडी !! अब बार बार प्रयत्न करने पर भी ब्रह्मास्त्र-प्रयोगका स्मरण ही नहीं होता और अरे ! उसका रथचक्र पृथ्वीने निगला ! वह रथपरसे उतरा। रथचक्र उठानेके लिये उसने "कुछ क्षण युद्ध रोकनेको" कहा किंतु कृष्णने उसके सारे कुकर्म उसको सुना कर पूछा "तब तुम्हारी धर्म-बुद्धि कहां गयी थी ?" और अर्जुनको कर्णपर आक्रमण करनेको कहा। ऐसी हालतमें कर्ण मारा गया। इस युद्धमें कर्णके ङ पुत्र मारे गये। इनमें से वृषसेन और सुदामाको अर्जुनने मारा। सत्यसेन, चित्रसेन, और सुशर्माको नकुलने मारा और सुषेणको भीमने। वैसे ही कर्णके छ भाई भी मारे गये। इनमेंसे शत्रुंजय, शत्रुंतप, तथा द्विपाटको अर्जुनने मारा। एकको अभिमन्यूने मारा। द्रुम और शूकरथको भीमने मारा। गीता अ० १. श्लो० ८-कृपाचार्य— उत्तर पांचालके राजकुलके गौतम नामक मुनिका पोता। गौतमको शरद्वान नामक एक लड़का था। वह महान् तपस्वी था। उसका तपो-भंग करनेके लिये इंद्रने एक अप्सरा भेज दी; उस समय इनको एक पुत्र और पुत्री हुई। ये दोनों संतान वनमें बढे। आगे उसी वनमें शिकार खेलनेके लिये जब शांतनु आया तब शांतनुने इन बालकोंको देख कर इन्हें घर ले गया। शांतनुकी कृपासे इनका पालन पोषण हुआ। इसलिये इन्हें कृप और कृपी कहा गया। यह कृपी आगे द्रोणाचार्यकी पत्नी हुई। ज्ञानेश्वरी ३६

जब शांतनु इन बालकोंको अपने पास ले गया तब गौतमको इसकी जानकारी हुई। शांतनुको गौतमने कृप-कृपीका जन्म-वृत्तांत सुनाया और उन्हें योग्य शिक्षा दी। कृपाचार्य चार प्रकारके धनुर्वेद तथा अन्य शास्त्रमें पारंगत-आचार्य हो गये। धृतराष्ट्रने अपने सभी लडकोंको विद्याध्ययनके लिये कृपाचार्यके पास ही रखा था। सभी कौरव द्रोणाचार्यके पहले कृपाचार्यके विद्यार्थी थे। भारतीय युद्धमें यह कौरवोंकी ओरसे लडे थे। सदैव ये पांडवोंकी स्तुति और कर्णकी निंदा करते थे। ऐसे ही एक बार कर्णने इन्हें कहा था "हे दुर्मते! फिर यदि तू ऐसा भाषण करेगा तो तेरी जीभ ही काटकर फेंक दूंगा!" कृपाचार्यने भारतीय युद्धमें महान पराक्रम किया है। पांडव पक्षके कई वीर इनके हाथसे मारे गये हैं। किंतु जयद्रथके वधके बाद जब ये अश्वत्थामाके साथ अर्जुन पर चढ दौडे तब अर्जुनके बाणोंसे जर्जर हो गये। इन्होंने धृष्टद्युम्नको अपने बाणोंसे जर्जर किया था। दुर्योधनका पतन हो कर जब भारतीय युद्ध समाप्त हुवा तब अश्वत्थामा अत्यंत अस्वस्थ हो गया था। अश्वत्थामाने निश्शस्त्र पांडव और पांडव-पुत्रोंके वधकी अपनी योजना कृपाचार्यको सुनायी तब कृपाचार्यने कहा था "उद्योग क्षीण होनेके बाद दैव कुछ नहीं कर सकता। किसी भी मनुष्यको अपना उद्योग प्रारंभ करते समय अपने बुजुर्गोंसे सलाह करनी चाहिये। इसलिये हम यह कार्य करनेसे पहले धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर आदिकी राय लें!" इन्होंने विवाह नहीं किया। कौरवोंकी मृत्युके बाद इन्होंने धृतराष्ट्र और गांधारीको सांत्वन दिया था। फिर ये घोडेपर बैठ कर अज्ञात स्थान चले गये। गीता अ० १. श्लो० ८-अश्वत्थामा- पिताका नाम द्रोणाचार्य, माताका नाम गौतमी कृपी। इनका यह इकलौता पुत्र। जन्मके साथ यह उच्चैःश्रवा घोडेकी भांति हिनहिनाया इसलिये इसे अश्वत्थामा कहा गया। यह अत्यंत तेजस्वी तथा क्रोधी था। अश्वत्थामाने कौरव-पांडवोंके साथ द्रोणाचार्यसे अस्त्र-विद्या सीखी। भारत-युद्धके अंतमें जब सभी सेनापति पडे, भीम-दुर्योधनके युद्धमें दुर्योधन पड़ा तब मृत्यु समयमें दुर्योधनने अश्वत्थामाको सेनापति बनाया। तब अश्वत्थामाने पांडवोंका नाश करनेकी प्रतिज्ञा की। इसी एकने पांडवोंकी एक अक्षोहिणी सेना मारी है! अनेक बार यह भीमार्जुनसे लड़कर पराजित हुवा है। पांडवोंको अश्वत्थामा प्रिय था और अश्वत्थामाको पांडव! इतना होने पर भी, भारत- युद्धमें दुर्योधनकी कटूक्तियोंसे तंग आकर इसने द्रोण-पुत्रको शोभा दे ऐसा पराक्रम किया। भारत युद्धमें द्रोणाचार्यका वध हुवा। कौरव सेनामें तहलका मच गया। सारी सेना अस्त- व्यस्त हो कर भागने लगी। तब अश्वत्थामाने दुर्योधनसे पूछा "किसके वधसे यह सेना ऐसी भाग रही है?" धृष्टद्युम्नसे अपने पिताका वध हुवा यह सुनते ही अश्वत्थामाने धृष्टद्युम्नके वधकी प्रतिज्ञा की। पितृवधसे संतप्त अश्वत्थामाने, सात्यकी, धृष्टद्युम्न, तथा भीमसे लड़कर उनको भगा दिया। तब इसने पांडव सेनापर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। इससे पांडव सेनामें हाहाकार मच गया। तब कृष्णने सबको निःशस्त्र होनेको कहा। सबके निःशस्त्र होने पर वह नारायणास्त्र शांत हुवा। सभी कौरव मारे गये। हताश और क्षत-विक्षत दुर्योधन अश्वत्थामाको सेनापति बनाकर रणभूमिपर तड़पता पड़ा रहा। रातका समय। कौरव सेनाके तीन थके हुए सेनानी, कृपाचार्य, ३७ परिशिष्ट १.

अश्वत्थामा और कृतवर्मा, विचार मग्न हो एक वृक्षके नीचे आये थे। तब एक उल्लू वहीं एक घोंसलेके अनेक कौवोंको मार गिरा रहा था। यह देखकर अश्वत्थामाके मस्तिष्कमें एक नई बात आयी। रातको पांडवोंकी छावनी पर हमला करके ऐसे ही निद्रस्थ सेनाका सफाया किया जा सकता है! इसने अपना यह विचार कृपाचार्य और कृतवर्मासे कहा। उन्होंने इसका अस्वीकार करके अश्वत्थामाको इस विचारसे परावृत्त करनेका प्रयत्न किया परंतु अश्वत्थामाने नहीं माना। वह अकेला हमला करनेके लिये चल पड़ा और अभिचार पूर्ण यज्ञमें अपने मांसकी आहुति देकर रुद्र खङ्ग प्राप्त करके इसने निद्रस्थ सेनानियोंका संहार करना प्रारंभ किया। इस हत्याकांडमें द्रौपदीके सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, पांचालकुल, सूत, सोम, शिखंडी, आदि अनेक वीर मारे गये। इतना सब करके, यह खबर देनेके लिये कृपाचार्य और कृतवर्माको साथ लेकर युद्ध भूमिपर क्षत-विक्षत हो पडे हुए दुर्योधनके पास गया। दुर्योधन मृत्यु-पीडासे तडप रहा था। वहां जाकर अश्वत्थामाने कहा "दोनो सेनामें अब बस कृष्ण, पांच पांडव और हम तीन ही रहे हैं! और सब मारे गये।" वह सुनकर दुर्योधनके प्राण पखेरू उड़ गये। किंतु इससे द्रौपदीको अत्यंत दुःख हुवा। द्रौपदीने "अश्वत्थमाके सिर पर जो मणि है वह युधिष्ठिरके सिर पर देख कर ही जीवित रहूंगी" ऐसी प्रतिज्ञा की और इस प्रतिज्ञाकी पूर्तिका लिये भीम गदा लेकर चल पडा। किंतु अश्वत्थामाके अस्त्र प्रभावके आगे भीमका कुछ भी नहीं चलेगा यह जान कर कृष्णार्जुन भी उसके साथ चले। अश्वत्थामाने पांडवोंके विनाशके लिये ब्रह्मा- सिरस् नामके अस्त्रका प्रयोग किया और इसका प्रतिकार करनेके लिये अर्जुनने भी उसी अस्त्रका प्रयोग किया, परिणाम स्वरूप पृथ्वी कांप उठी। अश्वत्थामाके अविचारके लिये व्यास्रादने उसकी भर्त्सना की और सिरका दिव्य मणि देकर अर्जुन को शरण जानेको कहा। अश्वत्थामाने वह मणि तो दिया किंतु यह अस्त्र पांडव वंशका नाश करके शांत होगा ऐसा कहा। यह सुन कर, कृष्णने अश्वत्थामाको महा-रोगसे पीडित होकर मूक भावमें लंबी आयु भोगनेका शाप दिया और इस अस्त्रसे उत्तराके गर्भमें जो पांडव-वंश बढ़ रहा था उसकी रक्षा की। इसे चीरजीवी कहा गया है। गीता अ० १. श्लो० ८-विकर्ण- धृतराष्ट्र-पुत्र । द्रौपदी स्वयंवरमें गया था। यह महारथी था। न्यायवान था। जब द्रौपदीको सभामें लाया जा रहा था तब इसने कहा था "यह अन्याय है!" युद्धमें यह नकुलसे पराजित हुवा और भीमसे मारा गया। गीता अ० १. श्लो० ८-सौमदत्ति- यह सोमदत्तका पुत्र। इसका वास्तविक नाम भूरिश्रवा। यह अत्यंत पराक्रमी था। महाभारत युद्धमें इसने सात्यकीको पराजित किया था। अर्जुनने सात्यकीको इसके हाथसे बचानेके लिये भूरिश्रवाके हाथ तोडे। तब भूरिश्रवाका कहना था अर्जुनने उनके साथ अन्याय किया। अन्यायके प्रतिकार के लिये इसने टूटा हुवा हाथ अर्जुनकी ओर फेंक दिया और सात्यकीने इसका सिर उडाया। यह अग्निहोत्री था। इसने सात्यकीके दस पुत्र मारे थे संभवतः इसीलिये सात्यकीको इस पर इतना क्रोध था। ज्ञानेश्वरी २६

गीता अ० १. श्लो० १४-माधव-

कृष्ण । वृष्णि कुलका यादव । बापका नाम वसुदेव । माताका देवकी । माता पिता अब कंसके बंदिगृहमें थे तब इसका जन्म हुवा । कृष्णका पिता वसुदेव उग्रसेनका प्रधान मंत्री था । अत्यंत राजकारण पटु । मुत्सैद् ! इसलिये इस पर कंसकी नज़र थी । बापको बंदी बनाकर कंसने राज्य- पद पाते ही इसको भी बंदी बना दिया । कंसके भयसे कृष्ण जन्म होते ही इसे गोकुलमें भेज दिया तथा नंदके घर जनमी हुई लड़की यहां लायी गयी । कंस इस बच्चीको मारने गया किंतु वह उस बच्चीको नहीं मार सका । कंसने बाल्यावस्थामें ही कृष्णको मार डालनेके लिये अनेक प्रयास किये जो व्यर्थ गये । नंद कृष्ण-जन्मसे अत्यंत प्रसन्न था । नंद, कंसका आधीन राजा था । कृष्णने गोकुलके बालकोंमें नया प्राण फूंक दिया । बचपनसे ही या स्वभावसे ही वे चतुर संघटक थे । खेलकूदमें बच्चोंके नेता बनकर उनको प्रोत्साहन और प्रेरणा देते रहते थे । वे अतुल बलशाली और धैर्यशाली थे । हर संकटके समय आगे बढ़कर संकटोंसे जूझते थे । संकटोंपर विजय पाते थे । इसलिये सारे गोप गोपियां इनके आधीन रहे । जब कृष्ण और बलराम-कृष्णके बड़े भाई-कौमार्यावस्थासे तारुण्यमें पदार्पण करने लगे तब कंसने धनुर्यागमें उनको निमंत्रित किया और उन्हे लानेके लिये अक्रूरको भेजा । नंद कंसके आधीन होनेसे ना नहीं कह सकते थे । अक्रूरके साथ कृष्ण बलराम मथुरा आये । मथुरामें सबने इन युवकोंका स्वागत किया । इससे कंस संतप्त हुवा । कृष्णने शस्त्रागारके एक भव्य धनुष्यको झुकानेके प्रयासमें तोड दिया । उत्सवमें कंसने कृष्ण बलरामसे चाणूर-मुष्टिकको कुश्ती खेलनेको कहा । कृष्ण बलराम जब मल्लशालाकी ओर बढ़ने लगे तब एक मस्त हाथी भड़काकर उन पर डाला गया । उस हाथीका नाम था कुवलयापीड़ । मल्लशालाके दरवाजे पर आते आते हाथी सामने आया और कृष्णने उसका प्रतिकार करके उसको मार डाला । कृष्ण बलरामने चाणूर मुष्टिकको कुश्तीमें ऐसे दबोचा कि बेचारे उठ भी नहीं पाये । इसके बाद, तोषलक कृष्णसे लड़ने आया और एक ही झटकेमें समाप्त हो गया । यह देख कर दूसरे मल्ल भाग गये और कृष्ण कंसकी ओर बढे । कृष्णने कंसके दरबारमें, उसीको सिंहासनपरसे नीचे खींच कर केवल मुष्टि-प्रहारसे ही मार डाला । इस भरे दरबारमें "सुनाभ" नामक कंसके एक अंग रक्षकके अलावा और कोई भी उसको बचाने आगे नहीं आया और कृष्णने सुनामको भी कंसके साथ परलोक दिखाया । इसके बाद बलराम-कृष्णका उपनयन संस्कार हुवा और ये दोनों विद्याध्ययनके लिये अवंतीकाके पास सांदीपनी आश्रममें भेज दिये गये । वहां वे शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखे । ये इतने बुद्धि-शाली थे कि जो बात इनके सामने आती तुरंत सीख लेते थे । ये गुरुकुलमें केवल ६४ दिन रहे । और, यहां कंसवधके बाद कंसकी पत्नियोंसे यह बात जरासंध तक गयी । कंस जरासंधका जामात था । जरासंधने कंसकी शक्ति देख कर अपनी दो पुत्रियां अस्ति और प्राप्ति कंसको देकर विवाह कर दिया था । अपने श्वशुरकी प्रेरणासे ही वह राजा बन बैठा था । जरासंध अत्यंत शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी राजा था । अपनी पुत्रियोंसे अपने पतिके वधकी बात सुनते ही अपनी प्रचंड सेनाके साथ मथुरा पर चढ़ आया । उनके साथ उनके आधीन राजा भी थे । मथुराके चारों दरवाजों पर जरासंधकी सेनाएं जम गयीं । दक्षिणमें दरद, चेदिराज और वह स्वयं

११ परिशिष्ट १.

अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

रहा, उत्तरमें पुरुत्कुलोत्पन्न वेणुदारी, विदर्भाधिपति सोमराज, भोजेश्वर रुक्मि, सूर्णाक्ष, अवंतिकाके विंद अनुविंद, दंतवक्त्र, क्षात्रलि, पुरमित्र, मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण, और पंचनदकी व्यवस्था की, पूर्वकी ओर उलूक केतव, अंशुमान्‌का पुत्र बृहत्क्षत्र, बृहधर्मन् जयद्रथ, उत्तमो जस काश्य, कैकेय, वैदिश, सितीदेशका राजा सांकृतिकी व्यवस्था की और पश्चिममें मद्राजा, कहलिंगेश, चेकितान, बाह्विक, काश्मीर नरेश गोनर्द, करूषेश, द्रुमराज दर्पतीय अनामयको खड़ा किया। इस युद्धमें जरासंध २० अक्षौहिणी सेना लाया था। इसके विरुद्ध यादवोंकी सेना छोटी थी। फिर भी यादवोंने इन्हे हराया। बलरामने जरासंधको हराया। जरासंधने कई बार ऐसा आक्रमण किया। कृष्णने सत्रह बार जरासंधका पराभव किया और यह अकारण वैर करता है, बार बार आक्रमण करता है इस लिये इससे बचनेके लिये कृष्णने सौराष्ट्रके पास द्वारका बसाई। सत्रह बार हारनेके बाद भी यह शांत नहीं रहा। इसने यवनराजा कालयवनकी सहायतासे अठारवी बार हमला किया। कालयवन यादवोंके पुरोहित आर्यका पुत्र ! किसी यादवसे अपमानित होकर आर्यने यादवोंका पराजय कर सकनेवाले पुत्रके लिये तपस्या की और शंकरसे ऐसा वर भी पा लिया। इस भांति यह आर्य-पुत्र यवनोंके घर पर पला और यवनोंका राजा भी बन गया। जरासंधने इससे संधि की और इसने उसी रोज मथुरा पर आक्रमण कर दिया। इसकी सेना भी बडी विशाल थी; जरासंधकी थी ही। इसी समय कृष्णने राजधानी बदली। सबको द्वारका पहुंचा कर कृष्ण मथुरा आये । और निःशस्त्र कृष्णको देख कर कालयवनने उनका पीछा किया। कृष्ण आगे, आगे आगे कृष्ण और पीछे पीछे कालयवन। जाते जाते कृष्ण एक गुफाके अंदर जा कर छिप गये। उस गुफामें महा पराक्रमी मुचकुंद राजा सोया था। कालयवनने उसको लाथ मार कर पूछा कृष्ण कहां ? देवोंका भी सेनापति बननेवाला मुचुकुंद ! मुचुकुंदने कालयवनको वहीं राख बना दिया। इन्हीं दिनों रुक्मिणी स्वयंवरमें कृष्णने शिशुपालका पराभव करके रुक्मिणीसे विवाह किया। स्यमंतक मणिकी चोरीके आरोपसे मुक्ति पानेके प्रयासमें सत्यभामा और जांबवतीसे विवाह हुआ। उसी स्यमंतक मणिके कारण कृष्णको शतधन्वाका वध करना पडा। इस घटनाके कुछ काल बाद पांडव और कृष्णका संबंध आया। द्रौपदी स्वयंवरके समय कृष्ण वहां थे। कृष्णने द्रौपदीके विवाहके समय पांडवोंको वस्त्राभरण भूषण भेजा था। जिसका पांडवोंने स्वीकार किया। यहींसे पांडव व कृष्णका संबंध प्रारंभ होता है। पांडवोंके साथ कृष्ण हस्तिनापुर भी गये थे। इंद्रप्रस्थ नगर बसानेके बाद वे और बलराम द्वारका आये। सुभद्रा विवाहके बाद भी कृष्ण कुछ काल पांडवोंके साथ रहे थे। आगे खांडवन दहनके बाद ये द्वारका गये। द्वारकामें एक नई समस्या कृष्णकी राह देख रही थी। जरासंधने २० हजार राज-पुत्रोंको बंदी बना रखा था। गुप्त रूपसे उन राज-पुत्रोंने मुक्तिकी याचना करनेके लिये कृष्णके पास अपना दूत भेजा था। उस दूतने कहा "यदि आप शीघ्रता करेंगे तो हमारे प्राण बचेंगे नहीं तो यज्ञमें हमारी आहुति पडेगी !" इस विषयमें कृष्ण अपने यादव साथियोंसे विचार विनिमय कर ही रहे थे युधिष्ठिरका दूत आया "युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहता है। आपको बुलाया है !!" कृष्ण सोचमें पडे अब किस ओर जाना चाहिए। -ज्ञानेश्वरी १०

उद्धवने कहा "अपने विचारसे प्रथम युधिष्ठिरके पास जाना उचित होगा" और कृष्ण उन दूतोंको साथ लेकर ही इंद्रप्रस्थ गये । कृष्णने इंद्रप्रस्थसे ही उन राजाओंको संदेश भेज दिया । "जरासंधका वध करके तुम्हारी मुक्ति की जायेगी !" कृष्णको इंद्रप्रस्थमें देख कर पांडवोंको आनंद हुवा । राजसूय यज्ञ करनेके लिये पांडवोंको भी जरासंधको मारना आवश्यक था। इसलिये कृष्ण, अर्जुन और भीमको साथ लेकर मगध गये । भीमसे जरासंधका वध कराया और जरासंधके पुत्रका राज्याभिषेक करके २० हजार राजपुत्रोंको मुक्त किया । चेद देशमें पौंड्रक वासुदेव जो जरासंधका मित्र था अपनेको पुरुषोत्तम मान कर सत्ताधीश बना था। उसने अपनेको परमात्म रूप घोषित करके कृष्णको शरण आनेका संदेशा भेजा। प्रत्युत्तरमें कृष्ण चेदि देश पर चढ़ाई कर युद्धके लिये चल पडे । वह अपने मित्र काशीराजाके साथ कृष्णका ही स्वांग भरकर युद्ध करने आगे आया और कृष्णसे मारा गया । युधिष्ठिरने राजसूययज्ञमें भीष्माचार्यकी आज्ञासे कृष्णकी प्रथम पाद्यपूजा की। इससे शिशुपाल संतप्त हुवा । शिशुपाल चेदि प्रदेशका राजा था । इसकी माता श्रुतश्रवा, कृष्णकी बूआ । शिशुपाल अत्यंत शक्तिशाली था । यह जरासंधका सेनापति भी था। भाई होने पर भी सदैव कृष्णका द्वेष करता था और कृष्ण इसे सहन करता था । राजसूयज्ञकी राज-सभा में इसने भीष्मको भला बुरा कहा । युधिष्ठिरको धमकियां दीं । "रुक्मिणीने मेरा स्वीकार किया है और यह उसे अपनी पत्नी कहकर भगा कर ले गया है" कहता हुवा राज सभाके दरवाजेसे बाहर पडते समय इसे कृष्णने वहीं वध किया । कृष्णके चक्रसे यह राजसूयके राजदरबारमें ही मारा गया । युधिष्ठिरके यज्ञ-समाप्तिके बाद कृष्ण द्वारका गये । किंतु जब कृष्ण राजसूय यज्ञमें इंद्रप्रस्थ गये थे तब कृष्णकी अनुपस्थितिमें शाल्वने द्वारका पर आक्रमण कर दिया था। शाल्व दैत्य कुलका राजा था । जरासंधका सखा था। इसीने जरासंध और कालयवनमें संधि करायी थी। रुक्मिणीके विवाहके समय वह कृष्णसे पराजित हुवा था। इसने "निर्यादव पृथ्वी" करनेकी प्रतिज्ञा भी की थी । इसके लिये मायासुरसे सौभ नामक अभेद्य विमान भी बनवा लिया था और जब इसको ज्ञात हुवा कि कृष्ण यज्ञमें इंद्रप्रस्थ गये हैं इसने द्वारका पर आक्रमण किया। वहां प्रद्युम्न और शाल्वका २७ दिन तक भयंकर युद्ध हुवा और शाल्व अपना विमान लेकर सौभ देशको लौट गया किंतु कृष्णने इसका पीछा किया । इसने अनेक प्रकारकी चालें चलीं किंतु कृष्णने अपने चक्रसे इसका विमान तोड फोडकर फेंक दिया और इसका वध किया । इसके बाद शिशुपाल-शाल्वादिक मित्रोंके वधसे संतप्त विदूरथने मित्र-वधका बदला लेनेके लिये कृष्ण पर आक्रमण किया । कृष्णने इसका भी वध किया । कृष्णने शोणितपुरका राजा बाणासुरको जीतकर अपने पोते अनिरुद्धसे उसकी लडकी उषाका विवाह किया। वैसे ही प्राग्ज्योतिषपुरके नरकासुरको मार कर उसके बंदीगृहसे १६ हजार राजकन्याओंको मुक्त किया । विश्वकी प्रत्येक अच्छी वस्तु अपने पास होनी चाहिए, ऐसी नरकासुरकी इच्छा दीखती है । किंतु यह उन वस्तुओंका भोग नहीं करता था । नरकासुरने विश्वके विविध देशोंसे अनेक प्रकारके रत्न, वस्त्र, आभूषण आदिसे अपना कोश भर लिया था किंतु किसीका भोग नहीं किया । वैसे ही १६ हजार सुंदर कन्याओंको लाकर अपने राज्यमें रखा, पर उनका भी भोग ३१ परिशिष्ट १-

नहीं किया। इसने इंद्रकी अमरावती भी लूटी थी। नरकासुरके वधके लिये इंद्रने कृष्णसे प्रार्थना की थी। इंद्रको साथ लेकर ही कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर गया। प्रथम इन्होंने गरुड पर बैठ कर प्राग्ज्योतिषपुरका अवलोकन किया तब कृष्णने युद्धार्थ शंखनाद किया। शंखध्वनि सुनकर नरकासुर संतप्त हुवा। वह अपने विशाल भव्य रथमें बैठकर युद्धके लिये आ गया। कई घोडे इनका रथ खींचते थे। इसके साथ कृष्णका बडा ही घमासान युद्ध हुआ। अंतमें कृष्णने अपने सुदर्शनसे इसका शिरच्छेद किया। नरकासुरकी माताने तब इसके कवच कुंडल और राज्य कृष्णार्पण किया। इस युद्धसे कृष्णको अपार संपत्ति मिली। कृष्णने नरकासुरका पुत्र भगदत्तको सिंहासन पर बिठाकर उसे प्राग्ज्योतिष्यपुरका राजा बनाया। जैसे शिशुपाल कृष्णकी बुआका लड़का था वैसे पांडव भी कृष्णकी बुआके लडके। द्रौपदी स्वयंवरमें सर्व प्रथम कृष्ण और पांडवोंकी भेंट हुई। तब कृष्णने वस्त्राभरण भूषणोंसे पांडवोंका सत्कार किया था और पांडवोंने भी अत्यंत प्रेमसे उसका स्वीकार किया था। तबसे लेकर पांडवोंसे कृष्णका संबंध बढ़ता गया। विशेषतः राजसूय-यज्ञमें युधिष्ठिरके बुलाते ही कृष्णका आना इस संबंधका मधुर प्रारंभ है। इसके बाद जरासंघ वध, राजसूय-यज्ञमें कृष्णकी अग्र-पूजा, खांडववन दहन आदिसे वह बढ़ने लगा। पांडव-वनवासमें कृष्ण कई बार उनसे मिलने गये। कभी कभी सपत्नीक भी गये। अभिमन्युके विवाहमें जो राजा महाराजा आये थे उनसे कृष्णनेही पांडवोंके वास्तविक अधिकारकी बात कही थी। कृष्णने ही सामोपचारसे सब मिटानेके लिये धृतराष्ट्रसे शिष्टाई की। किंतु इसका कुछ भी उपयोग नहीं हुवा। कृष्ण शिष्टाईसे प्रथम जब दुर्योधन और अर्जुन युद्धमें कृष्णकी सहायता मांगने आये तब कृष्णने दुर्योधनको अपनी तीन अक्षौहिणी नारायणी सेना दी ओर स्वयं पांडवोंकी ओर गये। भारतीय युद्धमें कृष्णने ही धृष्टद्युम्न और सात्यकीकी सहायतासे पांडवोंके मूल शिबिरकी स्थापना की थी। भारत-युद्धके प्रारंभमें ही दोनों ओर युद्धके लिये खडे स्वजनोंको देख कर सं-भ्रममें पडे अर्जुनको अत्यंत मार्मिक उपदेश दे कर उसे युद्ध सन्नद्ध किया। इसीको आज भगद्गीता कहते हैं। महाभारत के युद्धमें अर्जुनका सारथ्य करके घोडोंकी भी सेवा की। युद्धमें भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा की। द्रोणवध के लिये कृष्णने ही युधिष्ठिरको असत्य बोलनेकी प्रेरणा दी। जयद्रथ वधमें इसीने अर्जुन की सहायता की। कर्णके सर्प मुख बाणसे कृष्णने ही अर्जुनकी रक्षा की। कृष्णने ही शल्यवधके लिये युधिष्ठिरको उकसाया। भीमको दुर्योधनके जांघपर गदा मारनेको कृष्णने ही कहा। भारत-युद्धका सूक्ष्म अवलोकन किया जाय तो वहां कृष्णकी मंत्रणा-शक्तिका सुंदर परिचय मिलता है। इस प्रकार कुरुकुलके महायुद्धमें पांडवोंको विजय दिलाकर कृष्ण द्वारका गये। कृष्णने केवल अर्जुनको ही गीतोपदेश दिया ऐसा नहीं, पुत्रोंकी मृत्युसे दुःखतप्त गांधारी, धृतराष्ट्र आदिका सांत्वन कृष्णने ही किया। अभिमन्युकी मृत्युके बाद सुभद्राका सांत्वन भी कृष्णने ही किया था। धर्मराजके अश्वमेध यज्ञमें भी कृष्ण आया था। किंतु ऐसा लगता है कि महाभारत युद्धके बाद कृष्ण राजनीतिसे अधिक धर्मनीतीकी ओर झुके। अंतमें राज-सत्तासे मत्त यादव जब आपसमें ही लड पडे तब प्रद्युम्नके वधका दृश्य देख कर कृष्ण इतने क्रोधाविष्ट हो गये कि बचे हुए सभी यादवोंको कृष्णने खतम कर दिया। कृष्णका यह प्रचंड क्रोध देखकर दारुक-कृष्णका सारथी और अक्रूरने कृष्णको प्रणाम करके कहा “ भगवन् ! आपने सभी यादवोंका संहार कर दिया अब बकरासको ढूंढें कर्यों ? ! ” तब कृष्ण शांत हुए। ज्ञानेश्वरी ३५

मृत्युके समय कृष्णकी आयु १०१ (?) वर्षकी थी। यह अर्जुनसे तीन महीने बड़े थे। अर्जुनसे पहले इनकी मृत्यु हुई। यादव युद्धके बाद कृष्ण एक पीपलके पेड़के नीचे अपने दाहिने घुटनों पर बायां पैर रख कर जब चिंतन मग्न हो पड़े थे तब जरा नामके व्याधने-एकलव्य-पुत्र ? पक्षी मानकर इसी पैरमें बाण मारा। इसी बाणसे कृष्णकी इह लीला समाप्त हुई। इनके इस महा निर्वाणके बाद द्वारका डूब गयी। गीता अ० १. श्लो० १६-युधिष्ठिर— पांडुराजका ज्येष्ठ पुत्र। माताका नाम कुंती। मृगयामें हुई एक घटनासे दुःखी हो कर पांडुराजा वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करके कुंती और माद्रीके साथ वनमें रहने लगा। इसी अवस्थामें युधिष्ठिरका जन्म हुआ। इसका जन्मस्थान शतशृंग पर्वतका वन था। इसका पहला शस्त्र गृह शस्त्र शर्याती पुत्र शुक्र। प्रथम उसीके पास यह शस्त्र और शास्त्र सीखा। हस्तिनापुरमें आनेके बाद कृप और द्रोण इसके आचार्य बने। यह तोमर-विद्यामें प्रवीण था। हस्तिनापुर आनेके बाद धृतराष्ट्रने इसको युवराज्याभिषेक कराया। इससे दुर्योधन युधिष्ठिरसे जलने लगा। दुर्योधनने पांडवोंके विरुद्ध षड्यंत्र रचनाप्रारंभ कर दिया। सर्व प्रथम दुर्योधनने पांडव और कुंतीको लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेका प्रयास किया। विदुरकी सहायतासे यह वहांसे मां और भाइयोंके साथ बचकर निकला। लाक्षागृहसे बच निकलनेके बाद ब्राह्मण-वेषमें यह अपने भाइयोंके साथ द्रौपदी स्वयंवरमें प्रकट हुआ। द्रौपदी स्वयंवरके बाद द्रुपद राजाने बड़े वैभवके साथ इसे हस्तिनापुर पहुंचाया। वहांकी प्रजाने भी इसका हार्दिक स्वागत किया। यह सब देखकर धृतराष्ट्रने आधा राज देकर इसको अलग कर दिया। युधिष्ठिरने भी इंद्रप्रस्थको राजधानी बनाकर राज्य करना प्रारंभ किया। नारदने इसको राजनीति शास्त्र सिखाया। इंद्र, वरुण, यम, कुबेर आदिकी राज्यव्यवस्था समझायी। तथा राजसूय- यज्ञ करनेको कहा। इसके राजसूय यज्ञमें स्वयं वेदव्यास ब्रह्मा थे। सुसामन् सामग था। याज्ञवल्क्य अध्वर्यु था। इस यज्ञके ऋत्विजोंमें पौम्य, धौम्य, आदि ऋषियोंकी लंबी सूची मिलती है। इसी यज्ञमें भीष्मपितामहकी आज्ञासे युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको अग्रपूजाका मान दिया था। यह देखकर कौरवोंने युधिष्ठिरका विरोध किया। दूसरी बात, युधिष्ठिरके इस यज्ञमें दुर्योधन कोषाध्यक्ष था। यज्ञमें दुर्योधनकी ओरसे अनापशनाप खर्च करने पर भी, जब राजकोश रीता नहीं हुआ तब दुर्योधन पांडवोंको दारिद्र्यमें लोटानेका उपाय ढूंढने लगा। एक बार शकुनी मामा ने इससे कहा "पांडवोंको दरिद्री बनानेके दोही साधन हैं। एक युद्ध और दूसरा द्यूत।" इसीसे द्यूतक्रीड़ाकी योजना बनी। धृतराष्ट्रने विदुरके द्वारा युधिष्ठिरको द्यूतके लिये निमंत्रण भेजा। दुर्योधनकी ओरसे शकुनी युधिष्ठिरसे जूआ खेला। युधिष्ठिर हारता गया। अंतमें सर्वस्व खोनेके बाद इसने दुर्योधनकी प्रेरणासे द्रौपदीको दांवपर लगाया और उसमें भी हार गया। इसके साथ ही पांडवोंको बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास भोगना था। इस अज्ञातवासमें पकड़े जानेपर "पुनः बारह वर्ष वनवास" ऐसी भी शर्त थी। युधिष्ठिर जब अपने भाइयोंके साथ वनवासके लिये निकला तब इसकी प्रजा भी शोकाकुल हो कर वनवास जानेके लिये तैयार हो गयी थी। बहुत ही समझा बुझा कर उसको राज्यमें रहनेके ३३ परिशिष्ट १.

लिये तैयार करना पड़ा । फिर भी पुरोहित धौम्य आदि कुछ उसके साथ गये थे। वनवासमें किर्मीर राक्षस इसका रास्ता रोक कर भीमसे मारा गया। द्रौपदी और भीमने प्रह्लाद और बलीका अनुकरण करके दुर्योधनको मारकर राज्य लेनेकी बात कही थी किंतु युधिष्ठिरने इसका अस्वीकार किया। द्वैतवनमें यह व्याससे प्रति-स्मृति विद्या सीखा। व्यासने इससे वनमें एक ही स्थान पर न रह कर भ्रमण करनेको कहा। व्यासकी आज्ञासे युधिष्ठिर द्वैतवनसे काम्यकवनमें गया। काम्यकवनमें इसको बृहदश्व ऋषिने नलका इतिहास कहा और अक्ष-विद्या सिखाई । फिर युधिष्ठिर तीर्थ-यात्रा करने लगा । इस तीर्थ यात्रामें बृहदश्वऋषि युधिष्ठिरके साथ रहा । ऋषिने इसे अनेक तीर्थोंका इतिहास कहा। पांडव जब काम्यकवनमें थे तब कृष्ण इनसे मिलने आये थे । यहीं युधिष्ठिर मार्कंडेय ऋषिसे मिला। मार्कंडेय ऋषिने युधिष्ठिरको परलोकके विषयमें जानकारी दी। अज्ञातवासमें यह कंक नामसे विराट राजाके घर रहा । यह विराटराजाके साथ जूआ खेलता था । इस समय युधिष्ठिरका गुप्तनाम "जय" था। जब युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ विराटके राज्यमें था तब विराट पर त्रिगर्तके सुशर्माने आक्रमण कर दिया। लड़ाईमें सुशर्मा जीता और विराट हारा। सुशर्माने विराटको बंदी बनाया। तब युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीम सुशर्माको जीत कर बंदी बनाके ले आया । एक बार क्रोधमें आकर विराटने अपने आश्रित कंककी नाक पर पांसा मारा और नाकसे जो खून बहने लगा वह द्रौपदीने पोंछा । इस घटनाके दो ही दिन बाद पांडव प्रकट हुए । उस समय विराट राजाने पुनः पुनः पांडवोंकी क्षमा मांगी ।

पांडवोंके प्रकट होते ही द्रुपदराजाके पुरोहितको संधान के लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा गया । द्रुपद-पुरोहितने पांडवोंकी मांग धृतराष्ट्रके सम्मुख रखी। भीष्म, द्रोण, विदुरने उसका समर्थन किया । धृतराष्ट्रने भी "धृतराष्ट्र पांडवोंका सख्य चाहता है।" ऐसा संदेश देकर पुरोहितको लौटा दिया। इसके बाद कृष्ण संधानके लिये आया। कृष्णका प्रयत्न भी व्यर्थ गया। तब कृष्णने कहा "युधिष्ठिरने कहा है आधे राज्यके स्थान पर (१) अविस्थल (२) वृकस्थल (३) माकंदी (४) वारणावत (५) कोई भी एक ग्राम और दें" किंतु दुर्योधनने "बिना युद्धके सुईके नोकके बराबरकी भी भूमि न दूंगा !" कह कर कृष्णको लोटा दिया। इससे संधान व्यर्थ गया और कुरुक्षेत्रपर हिरण्यवती नदीके किनारे खाइयां खोदकर युद्धकी तैयारियां होने लगीं।

युद्धके समय कौरव सेनाको देख कर इसको बड़ा दुःख हुआ । क्यों कि दोनों सेनामें सभी इसके बंधु-जन थे । अज, अभिमन्यु, अर्जुन, उत्तमौजा, उत्तर, काशिक, काश्य, कुंतिभोज, कैकेय-पांचबंधु-क्षत्रदेव, क्षत्रधर्मन्, घटोत्कच, चंद्रसेन, चित्रायुध, चेकितान, जयंत, अमितौजस, सत्यजित, द्रुपद, द्रौपदीके पांच पुत्र, धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, नील, पांचाल, पांड्य, पुरुजित, भोज, मदिराश्व, युधामन्यु, वसुदान, वार्षक्षेमी, विराट, व्याघ्रदत्त, शंख, शिखंडिन्, श्रेणिमत्, सत्यजित्, सात्यकी, सुकुमार, सूर्यवर्च, सेनबिंदु, आदि प्रधान अधीरथी महारथी थे । इसमें विराट और द्रुपद वृद्ध थे । ये दो वृद्ध-द्रुपद और विराट-तथा धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, शिखंडिन्, सहदेव, और सात्यकी ये सात पांडव सेनाके सेनापति थे । इन सेनापतियोंके आधीन एक एक अक्षौहिणी सेना थी।

और कौरवोंमें, अलंबुष, अनुविंद, अकंडुल, अश्वत्थामन्, उग्रायुध, कर्ण, कृतवर्मा, कृप, जयद्रथ, जरासंध, त्रिगर्त, दंडधर, दुर्योधन, दुश्शासन, द्रोण, नील, पौरव, बाह्लीक, बृहद्वल, भगदत्त, भीष्म, भूरिश्रवा, लक्ष्मण, विंद, वृषक, शकुनि, शल्य, सत्यश्रवस, सुदक्षिण, दुर्योधनकी ज्ञानेश्वरी ३४

ओरसे लड़नेवाले अतिथिमहारथी थे। इनमें भीष्म, द्रोण, और कृप ये तीन आचार्य सबसे अधिक वृद्ध थे। इनके अक्षौहिणी पति कृप, द्रोण, शल्य, जयद्रथ, सुदक्षिण, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, शकुनि, बाह्लीक, ऐसे ग्यारह थे। युद्धके समय युधिष्ठिरने भीष्म द्रोण आदिसे आशीर्वाद लिये। इस युद्धके कौरवोंके प्रथम सेनापति भीष्म थे, भीष्मके बाद द्रोण, द्रोणके बाद कर्ण, कर्णके बाद शल्य, फिर स्वयं दुर्योधन !! दुर्योधनने द्रोणसे "युधिष्ठिरको सजीव बंदी बना देनेका" वर मांगा। द्रोणने "अर्जुनकी अनुपस्थितिमें" ऐसे करनेका वचन दिया। युधिष्ठिरको पुनः द्यूतका निमंत्रण देकर दुर्योधन पुनः वनवासका शर्त रखना चाहता था। यह सुनते ही अर्जुनने "द्रोणकी यह प्रतिज्ञा निष्फल करूंगा !" ऐसी प्रतिज्ञा की। युद्धमें द्रोणने युधिष्ठिरको विरथ भी किया किंतु युधिष्ठिर द्रोणके हाथ नहीं आया। आगे युधिष्ठिरके "अश्वत्थामा हतः" ऐसे असत्य-वचन कहनेसे द्रोणका वध हुआ। सेनापति बनते ही कर्णने इसको अत्यंत त्रस्त किया। इससे यह बडा उद्विग्न हुआ। किंतु, अर्जुनने कर्ण-वधकी प्रतिज्ञा करने पर यह शांत हुआ। अर्जुनने बिना विलंब कर्ण-वध किया भी। कर्णका प्रेत देखकर गांधारीने कहा है "इसके भयसे युधिष्ठिरको नींद नहीं आती थी !!" युद्धकी समाप्ति के बाद रातको अश्वत्थामाने जो महान् हत्याकांड किया इससे यह अत्यंत दुःखी हुआ। तथा सभी कौरवोंकी अंतिम-क्रिया करते समय, जब इसको मालूम हुआ कि कर्ण इसका बडा भाई था तब अत्यंत दुःखी हुआ। उसी समय दुःखावेगमें यह अपना राज्यादि सब कुछ छोड़कर चले जानेको तैयार हो गया था किंतु दूसरे भाइयोंके समझा बुझानेपर शांत हुआ। भारत-युद्धमें जो विनाश हुआ इससे यह अत्यंत दुःखी हुआ था। तब इसको मार्कंडेय ऋषिने प्रयाग-यात्राका उपदेश दिया। कृष्णने इसका राज्याभिषेक किया। भीम युवराज बना। अर्जुन सेनापति बना। राज्या- भिषेकके तुरंत बाद यह प्रयागराज जाकर आया। भीष्मने इसको राजनीतिका उपदेश दिया। बृहस्पतिसे इसे आध्यात्मिक ज्ञान मिला। बंधुवधके प्रायश्चित्तके रूपमें इसने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञमें व्यास आचार्य बने थे। बकदाल्भ्य ब्रह्मा थे। वामदेव, याज्ञवल्क्य, पैल, आदि सोलह ऋषि ऋत्विज थे। इस यज्ञके बाद, धृतराष्ट्र वनवासके लिये चला गया। जाते समय धृतराष्ट्रने इसको धर्मोपदेश दिया। विदुरके निर्वाणके समय यह उसके पास था। अंतमें यह परीक्षितिको राज्याभिषेक करके स्वर्गारोहणके लिये चल दिया। रास्तेमें प्रथम द्रौपदी, फिर सहदेव, नकुल, अर्जुन, भीम इसके सामने गिरे। अंतमें यह जब स्वर्गद्वारमें पहुंचा तब इसके साथ एक कुत्ता था। इसने स्वर्ग-द्वारमें पहुंचनेके बाद "साथके कुत्तेको छोड़कर स्वर्गमें प्रवेश पाना अस्वीकार किया !" तब कुत्तेके साथ यह स्वर्गमें गया। इसका धनुष्य महेंद्र। शंख अनंत विजय। नक्षत्रोंसह अर्धचंद्र इसका स्वर्ण-ध्वज। इसके ध्वजपर नंद उपनंद नामके दो यंत्रचालित मृदंग थे। यह अपनी आयुके सोलहवे सालमें सर्व-प्रथम हस्तिनापुर आया। वहां तेरह साल रहा। इसके बाद छः महीने जतुगृह,-लाक्षागृह-छ महीने एकचक्रपुर, एक वर्ष द्रुपदगृह, पांच वर्ष युवराजके रूपमें दुर्योधनके साथ, तेवीस वर्ष इंद्रप्रस्थका राज्य, तेरह वर्ष वनवास अज्ञातवास, तथा युद्धके बाद इसने छत्तीस वर्ष राज्य किया। ३५ परिशिष्ट १

गीता अ० १. श्लो० १६-नकुल- पांच पांडवोंमें चौथा, माद्रीका पुत्र । नकुल और सहदेव जुड़वा भाई थे । इसका जन्म शतशृंग पर्वत पर हुआ । इसकी शिक्षा दीक्षा कृप और द्रोणाचार्यके पास हुई । इसकी दो पत्नियां थीं । एक द्रौपदी और दूसरी शिशुपालकी कन्या रेणुमति । राजसूय यज्ञमें इसने पश्चिम दिशाका विजय किया था । इसने रोहितक पर्वतपर मत्तकयूरोंसे युद्ध करके उनको जीत लिया । इसके बाद मरुभूमि, बहुधान्यक; शैरीषक; तथा महेश्य ये देश जीत लिये । आक्रोश नामके राजऋषीको पराजित किया । आगे चल कर इसने दशार्ण, शिबि, त्रिगर्त, अंबष्ठ, मालव, कर्पट, मध्यकेक्य आदि राज्योंको जीता । फिर, पुष्कर बनजातियां, उत्सवसंकेतगण, सिंधुतीरके ग्रामगण, सरस्वती तीरके मत्स्याहारी, शूद्र, आभीर, पंचनद, अमर पर्वत, दिव्यकटपूर, द्वारपाल, रामठ, राहूगण, मद्रदेशके शाकल गण, यादव आदिसे अपनी सत्ता स्वीकार कराली ! फिर समुद्र किनारेकी पह्लव, बर्बर, यवन, शक आदि जातियों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर एक हजार ऊंटो पर इन देशोंसे अनेक प्रकारकी संपत्ति लेकर इंद्रप्रस्थमें आया । जब यह विराटनगरमें अज्ञातवासमें था तब इसका गुप्तनाम "जयत्सेन" था तथा व्यवहारके लिये वामग्रंथिक कहलाता था । यह अश्व-विद्यामें कुशल था । घोड़ोंकी बीमारी अच्छी करना, उनकी बुरी आदतें बदलना, उनको अपने काबूमें लाना इन सब बातोंमें यह अत्यंत कुशल था । विराटने इसको अपनी अश्वशालाका प्रमुख बनाया था। जब कृष्ण संधानके लिये कौरवोंके पास जाने लगा तब इसने "संधान होकर युद्ध टलेगा इसकी संभावना मानकर वैसा प्रयत्न करना चाहिए" ऐसा अपना मत दिया था । युद्ध प्रारंभ होनेके बाद, नकुलने दुर्योधनसे युद्ध किया । युद्धमें दुर्योधनके दाहिने जाकर इसने उस पर सैकड़ों बाण छोड़े । दुर्योधनने इसका असह्य अपमान मानकर नकुलके दाहिने जानेका प्रयास किया । किंतु नकुलने ऐसे होने नहीं दिया । इतना ही नहीं दुर्योधनसे "खडा रहो वहां !" "कहाँ जाता है !" कहते हुए उसका उपहास किया । किंतु कर्णके सामने इसकी एक भी नहीं चली । कुंतीको दिया गया वचन स्मरणकर कर्णने इसे जाने दिया । नहीं तो कर्ण इसे मार सकता था । कर्णसे पराजित हो कर, यह युद्धभूमि छोड चला गया । युधिष्ठिरके अश्वमेधमें भी यह दक्षिण दिग्विजयके लिये गया था । अंतमें स्वर्गारोहणके समय, उत्तरमें हिमालयके बाद, बालुका सागरमें चलते समय थक कर यह मर गया । नकुलके पतन पर अर्जुनने युधिष्ठिरसे पूछा "नकुल बीचमें क्यों पड़ा ?" युधिष्ठिरने तब कहा था "इसे अपने सौंदर्यका अभिमान था। अपनी मृत्युके समय इसकी आयु १०५ वर्ष थी । इसको द्रौपदीसे शतानीक और रेणुमतीसे निरमित्र ऐसे दो पुत्र थे । इसका शंख सुघोष । गीता अ० १. श्लो० १६-सहदेव- अंतिम पांडव । माद्रीके जुड़वे बच्चोंमें छोटा । इसका जन्म भी शतश्रृंग पर्वत पर हुआ था । द्रोणसे यह शस्त्रविद्या सीखा। इसकी चार पत्नियां थीं। द्रौपदी, यादवकन्या विजया, भानुकी लडकी भानुमती, तथा जरासंधकी पुत्री । -ज्ञानेश्वरी १९

द्रौपदी स्वयंवरके समय जो लड़ाई हुई उस समय इसने दुःशासनको पराजित किया था । राजसूय-यज्ञके समय यह दक्षिण-विजयके लिये निकला था । इसने प्रथम मत्स्यराजको जीता । करूषदेशके दंतवक्रको जीत कर उससे उससे राजस्व ले लिया । उसके बाद पश्चिम मल्ल, सुमित्रराज, चोरदेश, निषादभूमि, श्रेणिगिरि, गोश्रृंग, और श्रेणिमान राजाओंको पराजित करके उनसे राजस्व ले लिया । कुंतिभोजने सहदेवका स्वागत करके युधिष्ठिरकी सत्ता माननेकी घोषणा की क्यों कि उसके मनमें पांडवोंके प्रति प्रेम था । चर्मण्वतीके तीर पर जंभकासुरके पुत्रसे घोर युद्ध करके उसको पराजित किया । यहांसे सहदेवको अगणित संपत्ति मिली । वहांसे नर्मदाके किनारे अवंतिकापति विंद अनुविंदोंसे लड़कर उनको पराजित किया । उनसे राजस्व लेकर भोजकट और भीष्मकोंसे युद्ध करके उनको जीता । आगे कोशल, वेण्यातीर, कांतारमें घुसकर कांतारक, प्राक्कोसल, नारकेय, हेरंबक आदि राजाओंको युद्धमें जीतकर उन सबसे बड़ा राजस्व ले लिया । दक्षिणमें आगे बढ़ते बढ़ते यह, मारुध, रम्यग्राम, नाचीन, अनधुंक, वनाधिप, पुलिंद, पांड्य आदि राजाओंको जीतता जीतता यह किष्किंधाकी गुफा तक आया था । वहां मैद और द्विविद नामके वानर राजाओंसे इनको सात दिन तक युद्ध करना पड़ा । अंतमें वानर राजाओंने सहदेवको राजस्व देकर युधिष्ठिरके यज्ञमें सहायक होना स्वीकार किया । इस युद्धमें जब नील सहदेवकी सेना जला देने लगा तब इसको अपने पराभवका ज्ञान हुआ । सहदेवने तब अग्नि-स्तवनसे उस अग्निको शांत किया और नीलने युधिष्ठिरको राजस्व देना स्वीकार किया । आगे सहदेवने त्रैपुरको स्वाधीन किया । पौरवेश्वरको जीता । फिर सुराष्ट्रक कौशिकाचार्य आहूति, रुक्मिन, भीष्मक, आदि राजाओंसे राजस्व लेकर शूर्पारक, तालकट, दंडक, म्लेंच्छ, निषाद, पुरुषाय, कर्णप्रावरण, कालमुख, कोलगिरि, सुरभिपट्टण, ताम्रद्वीप, आदि १५-२० देशोंको जीतकर यह इंद्रप्रस्थ आया । इसने दूतके रूपमें घटोत्कचको लंका भेजकर साम द्वारा विभीषणसे भी युधिष्ठिरके राजसूयके लिये राजस्व-धन प्राप्त किया था । द्यूतमें हारकर वनवास जाते समय कौरवोंकी ओरसे उपहास किया जानेपर धृतराष्ट्रके सम्मुख इसने शकुनीके वधकी प्रतिज्ञा की थी । यह भी अज्ञातवासमें तंतिपालके नामसे विराटकी अश्वशालामें काम करता था । द्रोणाचार्य पर आक्रमण करते समय यह कर्णसे पराजित हुआ । इसने अपनी प्रतिज्ञानुसार शकुनीका वध किया । स्वर्गारोहणके समय इसकी आयु १०५ की थी । इसके दो पुत्र थे । द्रौपदीसे श्रुतसेन । विजयासे सुहोत्र । यह उत्तम रथी था । सभी प्रकारकी शस्त्र-विद्यामें दक्ष था । खङ्ग-युद्धमें विशेष दक्ष था । इसके ध्वजपर हंसका चिन्ह था । इसके धनुष्यका नाम अश्विन । शंख मणिपुष्पक । ॐ १७ परिशिष्ट १ -

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परिशिष्ट दूसरा गीताके चौथे अध्यायमें कर्म-योगकी परंपरा बताते समय कुछ राजाओंका नाम आया है। इस परिशिष्टमें उनका कुछ जीवन परिचय है।

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परिशिष्ट दूसरा पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय । मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ गीता अ० ४. श्लो० १- विवस्वत—गीतामें सूर्यके लिये विवस्वत शब्द आया है । ऋग्वेदमें इसको अश्विनी तथा यमका पिता कहा गया है । कहीं कहीं सभी देव विवस्वतके संतान होनेकी बात भी कही गयी है । इसके विषयमें कहा गया है "यह आयु बढाता है ।" "यह आरोग्य देता है !" "यही विश्व निर्माण करनेवाला है !" "यह देवोंका पुरोहित है !" ऋग्वेदके अनेक वर्णन सूर्य बिंबका वर्णन करनेवाले हैं । किंतु यहां विशेष रूपमें, मानवोचित वर्णन ही दिये गये हैं । ऋग्वेदमें कहा गया है "इसके कारण जगत जीता है !" अग्निको विवस्वतका दूत कहा गया है । आदित्य, सूर्य, विवस्वत्, पूषन्, अर्यमन्, आदि सूर्यके ही भिन्न भिन्न रूप माने गये हैं। देव भी सूर्योदयके समय इसकी प्रार्थना करके कहते हैं "हम निष्पाप हैं यह सभी देवोंसे कहो !" इसकी तीन पत्नियां हैं । त्वष्टाकी पुत्री संज्ञा रैवतकी पुत्री राज्ञी और प्रभा । कहीं कहीं इनकी पत्नियोंके नाममें द्यौ, राज्ञी, पृथ्वी, निक्षुभा ऐसे नाम भी आते हैं । विवस्वत्से संज्ञाको तीन पुत्र हुए । (१) श्रुति सवस्ः सावर्णिमनु (२) श्रुतिकर्मन्ः शनि (३) तपती-यमुना । मत्स्यपुराणमें अश्विनी कुमार और विष्णुको सूर्यका पुत्र माना गया है और प्रभासे प्रभात, राज्ञीसे रेवत ये विवस्वत्के पुत्र हैं । इनमें यम और यमी-यमुना, तथा अश्विनी कुमार जुड़वे बच्चे हैं । और एक मत ऐसा है कि विवस्वतकी पत्नी संज्ञा-द्यौः उसकी छाया निक्षुभा पृथ्वी और इनकी संतति जल और धान्य-वनस्पति-है । गरमीके दिनोंमें सूर्य पानी खींच लेता है और वर्षाके रूपमें वह पृथ्वी पर बरसाता है इस लिये वह जगत्पिता है । यह ब्राह्मण ग्रंथोंका कहना है । वह इतना अधिक तेजस्वी था कि जिससे विश्व जलने लगा तब इसके तेजसे विष्णुने सुदर्शनचक्र, शंकरने अपना त्रिशूल, अष्टवसु देव (१) ध्रुव (२) घोर (३) सोम (४) आप (५) नल (६) अनिल (७) प्रत्यूष (८) प्रभास, कार्तिकेयकी शक्ति, कुबेरकी पालकी आदिका निर्माण किया गया । तब कहीं इसका तेज कुछ सहने योग्य हुआ । .४१ परिशिष्ट २ (4)

इसके १४०० किरणे हैं। चंद्र नक्षत्र आदि इसीसे बने हैं। मनु—सावर्ण मनु अथवा वैवस्वत मनु। विवस्वतका पुत्र। ऋग्वेदमें दो बार इसका वर्णन आया है। यह अत्यंत उदार था। इसने जो दक्षिणा दी उसकी अत्यंत प्रशंसा की गयी है। यह विवस्वतकी पत्नी संज्ञाका पुत्र है। इसको वैवस्वतमत्त मनु भी कहा गया है। इसको मानव-जातिका पिता माना गया है। पुराणोंमें जितने वंश कहे गये हैं उन सब वंशोंका मूल पुरुष यह है। इसे "पहला यज्ञकर्ता" कहा गया है। यदु, तुर्वसु वंशके राजाओंने इसको अनेक उपहार दिये थे। वैवस्वत मनु राजा था। प्रलयके समय मत्स्यने मनुका संरक्षण किया था, मत्स्य-पुराणमें विस्तार पूर्वक इसका तथा इसके तपका सुंदर वर्णन किया गया है। अलग अलग पुराणोंमें इसके अलग अलग नाम मिलते हैं। भागवतमें इसको द्रविड़ाधिपति कहा गया है। यज्ञ-कर्मसे इसका वैभव बढ़ता गया। वसिष्ठको इसने ब्रह्मविद्या सिखाई, इससे वसिष्ठ ब्रह्मनिष्ठ बना। यह धर्म-नियमोंका प्रवर्तक था। इसी मनुको भारतीय धर्म-शास्त्रका मूलपुरुष माना जाता है। "बड़े बड़े ऋषियोंने इसके पास आकर धर्म-संबंधी अपने प्रश्न पूछे। अपनी समस्याएं इसके सामने रखीं। इसने उन सबका उत्तर दिया और उन उन ऋषियोंने अपने शिष्य प्रशिष्योंको यह विद्या दी," ऐसा उल्लेख मिलता है। मेक्समुलर जैसे आधुनिक विद्वान भी यह मानते हैं "मूल मानव-धर्म सूत्रोंके आधारसे आजकी मनुस्मृति लिखी गयी है।" वैवस्वत मनु अपने समयका अत्यंत विद्वान राजा था। विद्वानोंकी ऐसी मान्यता है कि संभव है जब मनुस्मृतिकी रचना हुई होगी तब वैवस्वत मनुके नाम पर पर्याप्त साहित्य उपलब्ध रहा होगा। वैदिक विद्वानोंकी यह भी मान्यता है कि उपलब्ध मनुस्मृतिको देख कर लगता है कि वह बुद्धोत्तर रचना है। आद्य शंकराचार्यने मनुस्मृतिको मान्यता दी है। ई० स० ५७१ में लिखे गये एक शिलालेखमें "मनुस्मृतिके आदेशानुसार शासन करने वाले एक राजा" का उल्लेख है। ई० स ५०० से भी पहले जो श्री शबर स्वामी हो गये उन्होंने उपलब्ध मनुस्मृतिका उल्लेख किया है। वैसे ही ई० स० दूसरी सदीके कुछ लेखकोंने मनुके विचारोंको ग्राह्य माना है! इससे ऐसे लगता है "मनुके प्राचीन धर्मशास्त्रमें, समय समय पर कुछ वृद्धि होती गयी है ! संभव है कि तीसरी सदीसे पूर्व ही इसमें ऐसी वृद्धि होना प्रारंभ हुवा हो !!" सामान्यतः विद्वानोंकी ऐसी राय है कि "ई० स० पू० १००-४०० से ई० स० २०० तक यह स्मृति बनी होगी।" इक्ष्वाकु—वैवस्वत मनुके दस पुत्रोंमें एक। सबसे ज्येष्ठ पुत्र। एक राजकुलका प्रथम पुरुष। मनुने इक्ष्वाकुको दंडनीति सिखाई। "दंडसे प्रजा पालन करना किंतु अकारण दंडका प्रयोग नहीं करना!" यह इस नीतिका सार है। इक्ष्वाकु वंशका कुलगुरु वसिष्ठ। इक्ष्वाकु अयोध्याका पहला राजा। इक्ष्वाकु वंशमें इक्ष्वाकुसे कुरुयुद्धके समय राज्य करनेवाले बृहद्वल तक ८८ पीढियां हो चुकी थीं। कुछका मत ९१ है। इस कुलमें दिलीप, रघु, सगर, भगीरथ हरिश्चंद्र, राम आदि अनेक महापुरुष हो गये हैं। इसलिये सभी पुराणोंमें इस वंशके विषयमें कुछ न कुछ जानकारी मिलती है। ॐ ज्ञानेश्वरी ४२

परिशिष्ट तीसरा गीताके दसवे अध्यायमें भगवानने अपने ७५ विभूतियां कहीं हैं । उनमेंसे कुछ समझमें नहीं आनसे छोड दी हैं । जिसके विषयमें जो जानकारी मिली वह यहां दी है ।