भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 969, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 969

अष्टमीके दिन उत्तरायणमें भीष्मने शरीर-त्याग किया। भीष्माचार्य इच्छा-मरणी थे। तभी वे अपना शरीर ऐसे टिका सके। भीष्मके ध्वज पर तालवृक्षका चिह्न रहता था। मृत्युके समय भीष्मकी आयु १८६ वर्षकी थी। गीता अ० १. श्लो० ८-कर्ण- कुंतिभोज राजाने जब पृथाको गोद लिया उसको अतिथि सत्कारका काम सौंप दिया था। पृथाने अर्थात् कुंतीने यह काम अत्यंत दक्षतासे किया। एक बार दुर्वासा ऋषि जब कुंतिभोजका अतिथि बने तब कुंतीकी सेवा शुश्रूषासे अत्यंत संतुष्ट होकर कालांतरसे कुंती पर आनेवाले संकटका विचार कर उसे दुर्वासा-ऋषिने एक वशीकरण मंत्र दिया और कहा "इस मंत्रसे तू जिसे बुलायेगी वह देवता आकर तुझे पुत्र देगा !" दुर्वासा ऋषी गये । आगे कुंतीको मंत्र शक्तिकी प्रतीति देखनेकी जिज्ञासा हुई। उसने विधिवत् मंत्रका जाप करके सूर्यको बुलाया और प्रत्यक्ष सूर्यको सम्मुख पाकर चकित हो गयी। सूर्यसे कुंतीको कवच-कुंडलयुक्त पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वही कर्ण है। कुंतीने लोक-लज्जाके भयसे कर्णको एक पेटीमें डाल करके अश्व-नदीमें छोडा दिया। यह पेटि बहते बहते यमुना नदीमें आयी और धृतराष्ट्रका सारथी अधिरथने देखी। वह पेटिका लेकर अधिरथ घर आया और उसने वह अपनी पत्नी राधाको दी। यह बालक देखते ही राधाका वात्सल्य फूट पडा। उसके स्तन आर्द्र हो गये। उसने कर्णको छातीसे लगा लिया। इस प्रकार कर्ण राधाकी गोदमें बढकर राधेय कहलाया। किंतु इसकी तेजस्विता देखकर स्वयं राधाने इसको वसुषेण कहा था। द्रोणाचार्य इसका शस्त्र-गुरु है। कृष्णने इसको वेद शास्त्रज्ञ कहा है। जब कर्ण और दुर्योधनका परिचय हुवा तब कौरव-पांडव विरोधका बीज पड चुका था। दुर्योधनने " यह अर्जुनको भी भारी जायेगा !" ऐसा मानकर इससे मैत्री की। यद्यपि कर्णने द्रोणसे शस्त्राभ्यास किया द्रोणने इसको ब्रह्मास्त्र नहीं सिखाया। इसी एक कारणसे अर्जुन इससे श्रेष्ठ था। स्वभावसे यह उद्धत और अपनी बडाई कहनेवाला था। कई बार इसने द्रोणसे ब्रह्मास्त्र सिखानेको कहा किंतु द्रोणाचार्यने टाल दिया। मन ही मन यह अर्जुनसे द्वेष करता था, अर्जुनसे बढ कर वीर होनेकी अभिलाषा करता था इसलिये यह ब्रह्मास्त्र प्राप्तिके लिये परशुरामके पास गया। परशुराम क्षत्रियोंको विद्या-दान नहीं करते थे केवल ब्राह्मणोंको ही धनुर्विद्या सिखाते थे । इसलिये कर्णने परशुरामसे असत्य कहा। गुरु-वंचनासे ही इसकी ब्रह्मास्त्र-साधना प्रारंभ हुई। परशुरामने इसको शिष्यके रूपमें स्वीकार किया। कर्ण परशुरामके पास रहने लगा। परशुरामने इसे सप्रयोग ब्रह्मास्त्र सिखाया। एक दिन व्रतोपवाससे श्रांत परशुराम कर्णकी गोदमें सिर रख कर सो गया। उसी समय किसी कृमिने कर्णकी जांघ काट खाई। "गुरुदेव जग जायेंगे !" इस विचारसे कर्ण सारी वेदनाको सहते हुए स्थिर आसनसे बैठे रहे किंतु कर्णके बहनेवाले रक्तसे परशुराम जग गये। इस घटनासे परशुरामको कर्णके ब्राह्मण होनेमें संदेह हुवा। परशुरामने कर्णसे प्रश्न किया और कर्णने सभी सच्ची बात कह सुनाई। परशुराम इससे संतुष्ट तो हुए किंतु गुरुसे असत्य कहनेके उपलक्ष्यमें संमान योद्धासे युद्ध करते समय तथा वध होते समय इस अस्त्रकी स्फूर्ति न होनेका शाप मिला। ३३ परिशिष्ट १-