भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

कल्पतरुके हो चलते उपवन । गांव हो चैतन्य चिंतामणिके खान । सतत अमृत-सिंधु सम वचन । मिले परस्पर ॥ ९७ ॥ चंद्रमा हो यहां अलांछन । तथा मार्तंड हो ताप हीन । सदा प्रिय हो सभी सज्जन । सबसे आप्त ॥ ९८ ॥ अथवा पाये सभी सुख । पूर्ण होकर तीनो लोक । और भजे आदि पुरुष । अखंडित ॥ ९९ ॥ तथा है इस लोकमें जिसे । यह ग्रंथही जीवन उसे । पाये पूर्ण विजय इससे । दृष्ट अदृष्ट पर ॥ १८०० ॥ तब कहे श्रीगुरु महान । मिलेगा यह प्रसाद-दान । इससे सुखी मनही मन । हुवा ज्ञानदेव ॥ १ ॥

गीता श्लोक ७८ ओवी १८०१ ज्ञानेश्वरी संपूर्ण

८६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

—:श्रीगुरुका प्रसाद-दान ग्रंथ लेखनका स्थान काल:— ऐसे यह कलियुगमें । है महाराष्ट्रमंडलमें । गोदावरीके किनारेमें । दक्षिणका जो ॥ १ ॥ या त्रिभुवनैक पवित्र । अनादि पंचक्रोश क्षेत्र । जगका जहां जीव-सूत्र । है महालया ॥ २ ॥ वहां यदुवंश विलास । जो सकलकलानिवास । न्यायसे पोसता क्षितीश । श्रीरामचंद्र ॥ ३ ॥ वहां महेशान्वय संभूत । है जो श्रीनिवृत्तनाथ सुत । गाया ज्ञानदेव ये गीत । देशीका भूषण ॥ ४ ॥ एवं श्रीभारतकी गोदमें । प्रसिद्ध भीष्मनाम पर्वमें । श्रीकृष्णार्जुनने वैभवमें । गोष्टि जो की है ॥ ५ ॥ उपनिषदका है सार । सब शास्त्रोंका मातृ-घर । परम-हंस सरोवर । करते सेवन ॥ ६ ॥ उस गीताका यह कलश । संपूर्ण हुवा है अष्टादश । कहता श्रीनिवृत्तिका दास । ज्ञान देव ॥ ७ ॥ पुनः पुनः आगे भी इससे । इस ग्रंथ पुष्प-संपत्तिसे । सर्वभूत सर्वतोमुखसे । होना है संपूर्ण ॥ ८ ॥ श्रीशक बारह शत बारा । टीका बोला यह ज्ञानेश्वर । सच्चिदानंद बाबा सादर । हुवा लिपिक ॥ ९ ॥ ॐ ज्ञानेश्वरी ५७१

महाराष्ट्रके दूसरे एक महान संत श्री एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी ग्रंथका संशोधन करके इस ग्रंथके विषयमें निम्न अभिप्राय लिख रखा है । श्रीशक पंद्रह सौ छ उत्तर । आया तारण नाम संवत्सर । एका जनार्दनने अत्यादर । की ज्ञानेश्वरी प्रति शुद्ध ॥ १ ॥ पहले ही था ग्रंथ अति शुद्ध । पाठांतरसे था शुद्ध अबद्ध । शोधित कर वह एवं बिध । शुद्ध सिद्ध प्रति ज्ञानेश्वरी ॥ २ ॥ नमो ज्ञानेश्वर निष्कलंक । पढके उनके गीता टीका । ज्ञानी होंगे जो ग्रंथार्थि लोक । भाविक अत्यंत ॥ ३ ॥ बहुकाल पर्वणी गोमटी । भाद्रपदकी कपिला षष्ठी । प्रतिष्ठानमें है गोदा तटी । लेखन संपूर्ण ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर - स्तुति - सुमन सत - नामदेव ज्ञानराज मेरी योगियोंकी माय । उनसे प्रकट हुवा निगमकाय ॥ १ ॥ गीता अलंकार नाम ज्ञानेश्वरी । प्रकट गई है ब्रह्मानंदलहरी ॥ २ ॥ अध्यात्म - विद्याका दिखाया है रूप । उजला दिया है चैतन्य - महादीप ॥ ३ ॥ देशी भाषाओंका किया है गौरव । छोड दी उसने भावार्णवमें नाव ॥ ४ ॥ श्रवण निमित्त बैठना आकर । स्वानंद पीठपे सुखसे निरंतर ॥ ५ ॥ नामा कहे श्रेष्ठ ग्रंथ ज्ञानेश्वरी । प्रतीत करो जी चितमें एक ओवी ॥ ६ ॥ ८७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

संत एकनाथ महाराज— कैवल्यका है पूतला । प्रकट हुवा है भूतला । चैतन्यकी जो चित्कला । ज्ञानदेव मेरा ॥ साधकके हैं मायबाप । दर्शनसे हरता पाप । सब भूतोंमें सुखरूप । ज्ञानदेव मेरा ॥ ज्ञानियोंका जो मुकुटमणि । चिंतनशीलौंका चिंतामणि । पूज्य स्थानमें जो महान ज्ञानी । ज्ञानदेव मेरा ॥ चलाकर दिखायी जड़ भित्ति । हरण की चांगदेवकी भ्रांति । मोक्ष-मार्गका है महान साथी । ज्ञानदेव मेरा ॥ भैसेके मुखसे वेद कहलाया । ब्रह्म वृंदका अभिमान मिटाया । शांतिका पुतला बन व्यक्त भया । ज्ञानदेव मेरा ॥ परब्रह्म साम्राज्यकी है दीपिका । कही तूने गीताकी भावार्थ दीपिका । पंढरीके विठ्ठलका तू प्राणसखा । ज्ञानदेव मेरा ॥ गुरुसेवाके लिये जान । शरण एका जनार्दन । त्रिभुवनका जीवन । ज्ञानदेव मेरा ॥ 'ज्ञानेश्वरी ८७२

परिशिष्ट पहला श्रीमद्भगवद्गीताके पहले अध्यायमें जिन महारथियोंके नाम आये हैं उनका अल्प-सा जीवन परिचय ।

इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (Text) उपलब्ध नहीं है (केवल कुछ बिंदु/स्कैनिंग के निशान हैं)। कृपया स्पष्ट अथवा सही पृष्ठ की छवि प्रदान करें।

परिशिष्ट पहला अ० १. श्लो० १-धृतराष्ट्र सत्यवतीकी आज्ञासे व्यास द्वारा उत्पन्न अंबिकाका पुत्र । गर्भाधानके समयमें व्यासका तेज सहन न होनेसे अंबिकाने आंखें मूंद लीं इसलिये यह जन्मांध रहा । भीष्मके निरीक्षणमें इसकी शिक्षा दीक्षा हुई । यह बुद्धिमान् होनेसे शास्त्र संपन्न था । गांधारीसे विवाह । गांधारीके अतिरिक्त सत्यव्रता, सत्यसेना, सुदेष्णा, संहिता, तैजःश्रवा, सुश्रवा, शम्वठा, तोया दशार्णा ये नामभी उनकी स्त्रियोंके रूपमें मिलते हैं । गांधारीके दुर्योधनादि सौ पुत्र तथा दुःशला नामकी एक पुत्री थी । जब कौरवोंने पांडवोंको छलना प्रारंभ किया तब यह बिना कुछ कहे स्वस्थ रहा । लाक्षागृहमें पांडवोंकी मृत्यु हुई यह जान कर इसने "दिखावटी" शोक पर्याप्त किया । तथा द्रौपदी स्वयंवरके बाद-आधा राज्य भी दिया । दुर्योधनके कपट द्यूतके लिये धृतराष्ट्रकी पूर्ण सम्मति थी । दुर्योधनने पांडवोंको जीता यह सुनकर इसने अत्यंत हर्ष प्रकट किया था। द्रौपदीकी मानखंडना करते समय इसने कौरवोंको परावृत्त नहीं किया । इस समय यह स्वस्थ रहा किंतु आगे द्रौपदीके कहनेसे इसने पांडवोंको कौरवोंके दासत्वसे मुक्त किया । पांडव-वनवास समाप्त होनेके बाद जब शिष्टाई होने लगी तब इसने युधिष्ठिरको "तू दुर्योधनसे युद्ध करके अपने तेरह वर्षकी तपस्याका नाश मत कर । यदि दुर्योधन राज्य नहीं देता है तो भिक्षान्न पर जीवन कर किंतु दुर्योधनसे युद्ध न कर !" ऐसा उपदेश दिया था । जब थोडे समय बाद भारत युद्ध प्रारंभ हुवा तब यह युद्ध नहीं देख सकता था । इसलिये युद्धकी वार्ता कहनेके लिये संजयकी नियुक्ति की गयी । युद्धमें जब भीष्म द्रोणादि वीर मारे गये, अन्य भी अनेक योद्धा पडे तब इसको कृष्णका वचन स्मरण हो आया "इस युद्धसे कुरुकुलका संपूर्ण विनाश हो आयगा ।" और इसने दुर्योधनको "पांडवोंको उनका योग्य दायभाग देनेको" कहा किंतु इसका कोई उपयोग नहीं हुवा । अंतमें संपूर्ण कुरु सैन्यमें अश्वत्थामा, कृप, तथा कृतवर्मा यही तीन महारथी रहे तब धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे अत्यंत विव्हल हुआ । भीमने ही इसके सर्वाधिक पुत्रोंको मारा था इसलिये यह भीमसे बड़ा ही द्वेष करता था । युद्धके बाद प्रेमालिंगनके बहाने यह भीमको दबा कर मारना चाहता था । किंतु यह कपट जानकर कृष्णने भीमके स्थान पर लोहेकी एक मूर्ति आगे की और इसने उस मूर्त्तिका चूर्णही बना दिया । जब इसको वस्तुस्थितिका ज्ञान हुवा तब बड़ा ही लज्जित हुवा । जब युधिष्ठिर हस्तिनापुरके सिंहासन पर बैठा इसने युधिष्ठिरको राजनीतिशास्त्रका उपदेश दिया । अंतमें यह वनवास के लिये गया और वहां तपाचरण करते समय ही वनमें लगी आगमें जल कर मर गया । धृतराष्ट्रकी मृत्युके समय उसका एक भी पुत्र जीवित नहीं था ।

गीता अ. १. श्लो० १-संजय गावल्गण सूतका पुत्र । धृतराष्ट्रका सारथी और सलाहकार । दुर्योधनने भीष्मादिकी बात नहीं मानी, द्रौपदीका अपमान किया तब इसने दुर्योधनकी निंदा की थी । व्यासने संजयको दिव्य दृष्टि देकर धृतराष्ट्रको युद्ध-वार्त्ता कहनेके लिये बिठाया । यह रणभूमि पर जाता था । इसको व्यासने श्रम रहित अथक कर्म करनेकी शक्ति दी थी । साथ ही साथ "रणमें तू सदैव अवध्य रहेगा " ऐसा वर दिया था । इसने एक बार धृष्टद्युम्न पर, जब उसने स्वस्थ बैठे हुए निहत्थे द्रोणका वध किया तब, आक्रमण भी किया था किंतु धृष्टद्युम्नने इसे भगा दिया । सात्यकीने भी इसको युद्धभूमिसे मार भगाया था । दुर्योधन इसके साथ धृतराष्ट्रको संदेश भेजता था । इस परसे ऐसा लगता है कि यह स्वयं युद्ध-भूमिपर "वार्ताहर" के रूपमें रहता था और सब बातों पर अपनी दृष्टि रखता था । कृष्णार्जुन संवाद रूप गीता इसीने धृतराष्ट्रको सुनायी है । युद्धके बाद धृतराष्ट्रके साथ यह युधिष्ठिरके पास भी रहा । अंतमें जब धृतराष्ट्र वनमें गया तब विदुरकी सम्मतिसे उसे छोड़कर वनमें गया । यह अपने साथीके वियोगसे नारदकी दी हुई जानकारीके बल बूते पर धृतराष्ट्रके पीछे पीछे उनके शोधमें भी गया था । गीता अ. १. श्लो० २-दुर्योधन धृतराष्ट्रसे उत्पन्न गांधारीके सौ पुत्रोंमें प्रथम पुत्र । उत्तम रथी, शस्त्रविद्या निपुण, उत्तम सारथी, दुर्योधन और भीम एक ही दिन पैदा हुए थे । इसके जन्मके समय बहुत ही असगुन हुए थे । इसके जन्म-कालमें जो अपशकुन हुए वह देखते हुए ब्राह्मणोंने धृतराष्ट्रसे कहा था "यह कुलक्षयका कारण बनेगा । इसलिये इसका त्याग करनेमें ही भला है । यदि कुलका हित चाहते हैं तो इसका त्याग करें । कुल और राज्यकी रक्षा करें ।" बचपनमें, हर बातमें पांडव श्रेष्ठ होते थे इससे दुर्योधन उनसे द्वेष करने लगा । इस द्वेषसे दुर्योधन पांडवोंका नाश करनेकी योजनायें बनाने लगा । दुर्योधन भीमको विष खिला कर, उसके साथ खूब जल केली करने लगा और भीमके थककर बेसुध होने पर उसको हाथ पैर बांधकर गंगा में फेंकके घर आया । इस घटनासे दुर्योधनको बड़ा हर्ष हुवा था किंतु भीम लौट आया और उसने सारी बात अपने भाइयोंसे कही । कौरव और पांडव दोनों द्रोणके पास शस्त्रविद्या सीखे । विद्याध्ययन पूर्ण हुवा । कुमारोंके रण कौशल्यसे सभी प्रसन्न हुए । द्रोणने द्रुपदको युद्धमें जीतकर लानेकी गुरु दक्षिणा मांगी । तब दुर्योधन अपने भाइयोंके साथ आगे गया और मार खा कर लौटा । फिर अर्जुन उसको जीत कर बंदी बनाकर लाया । दुर्योधन बलरामसे गदायुद्धकी कला सीखा । जब धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको युवराज पद देनेका निश्चय किया तब यह द्वेषसे बेभान हो गया और इसने पांडवोंको मारनेके लिये लाक्षागृहकी योजना बनाई किंतु विदुरकी पूर्व सूचनाके कारण पांडव इससे बच निकले । यहां भी दुर्योधन हारा और धृतराष्ट्रने पांडवोंको इंद्रप्रस्थमें ला रखा । काशीराजाकी लड़की भानुमती इसकी पत्नी थी । यह कलिंग देशका राजा चित्रांगदकी पुत्रीको स्वयंवरमें से उठाकर लाया था । पांडवोंने इंद्रप्रस्थमें राज्य करते हुए राजसूय यज्ञ किया । उस यज्ञमें यह कोषाध्यक्ष था । दुर्योधनने वहां अत्यधिक व्यय किया फिर भी धनकी कोई तंगी नहीं हुई । सारा खर्च करके भी ज्ञानेश्वरी २

कोश भरा ही रहा। साथ साथ पांडवोंकी व मयसभा देख कर, दुर्योधनको उस वैभव पर ईर्ष्या हुई । मय सभा में वहां के कृत्रिम कला कौशलको सच मान लेनेसे उसकी जो दुर्गति हुई और वह दुर्गत देख कर अन्य स्त्रियोंके साथ द्रौपदी भी हंसी इससे वह जलने लगा । वह हस्तिनापुर आया । उस समय धृतराष्ट्रने दुर्योधनको शीलका महत्व समझाया था। किंतु पिताका वह उपदेश उसे नहीं भाया। वह पांडवोंकी संपत्ति हरण करनेकी योजना बनाने लगा और उसमेंसे कपट द्यूतकी कल्पना सूझी । शकुनीमामा इस विद्यामें पारंगत था । इस द्यूतमें पांडव अपना सर्वस्व हार गये । दुर्योधनने भरी सभामें द्रौपदीका अपमान किया । इस समय दुर्योधनने भीष्मादिकी बात भी नहीं मानी । पांडवोंको बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास भुगतना पड़ा । पांडवोंके वनवास जानेके बाद दुर्योधनने अत्यंत सुंदरतासे राज्य किया जिससे लोकप्रियता मिले । वनवास कालमें यह पांडवोंके विषयमें गुप्तरूपसे सारी बातें जानता रहा । बार बार उनको तंग करनेका प्रयास किया, लज्जित करना चाहा किंतु स्वयं अपनी दुर्गत करली । एक बार पांडव जब द्वैतवनमें थे तब वहां जा कर अपने वैभवसे उनको लजानेके प्रयासमें चित्ररथ गंधर्वसे युद्ध करना पडा और उस युद्धमें बंदी हुवा । इस युद्धमें दुःशासन और कर्ण हारकर भाग गये । तब अर्जुनने इसकी रक्षा की । इसको बंधनसे मुक्त किया । तब इसको युधिष्ठिरके सम्मुख नतमस्तक हो कर वापिस लौटना पडा । तब दुर्योधनने अपमानसे अनशन करके शरीरत्याग करनेका भी प्रयास किया था किंतु कुछ दैत्योंके और कर्णके समझानेसे वह शांत हुवा । इसी समय भीष्मने उसको पांडवोंसे साम करनेका उपदेश दिया और दुर्योधनने उसका उपहास किया । इस अपमानको धोनेके लिये दुर्योधनने राजसूय यज्ञ करनेका भी विचार किया किंतु ब्राह्मणोंने कहा "अभी इसी कुलमें युधिष्ठिरने यह यज्ञ किया है इसलिये अब यह असंभव है।" तब इसने वैष्णव याग करके पांडवोंको निमंत्रित किया । यह निमंत्रण पाकर युधिष्ठिरने अत्यंत संतोष प्रकट करते हुए "वनवास और अज्ञातवास पूर्ण होनेके प्रथम घर लौटना अनुचित है" कहकर आमंत्रण ले जानेवालेका सम्मान कर लौटा दिया । इस वनवास और अज्ञातवासमें भी यह लगातार पांडवोंके नाशकी योजना बनाता रहा । उनको कष्ट देता रहा और हरबार उनसे पराजित होता रहा । वनवास और अज्ञातवास पूर्ण करके जब पांडव घर आये तब राज्यके लिये संधान होने लगा । कृष्ण भी संधान करनेके लिये दुर्योधनके पास गया । किंतु इसका कुछ उपयोग नहीं हुवा । दुर्योधनने कृष्णसे इस युद्धमें सहाय्यार्थ यादव सैन्य मांग लिया जिसका सेनानी कृतवर्मा था । श्री परशुराम, कृष्ण, कण्व, भीष्म, द्रोण कृपाचार्य, अश्वत्थामा, आदि लोगोंने दुर्योधनको इस युद्धसे परावृत्त करनेका प्रयत्न किया किंतु दुर्योधनने सबका उपहास किया । कृष्णके साथ उसने अत्यंत धिटाई करके कृष्णको बंदी बनानेका प्रयास करके अपनी दुर्गत करली । इस भांति यह युगांतक युद्ध प्रारंभ हुवा । इस युद्धमें कई बार दुर्योधनका पराभव होकर यह युद्धभूमि छोडकर भागा है । युद्धके अंतमें भी जब सभी सेनापति मारे गये तब यह घबडाकर द्वैपायन सरोवरमें छुपकर बैठ गया ! युधिष्ठिरके कठोर भाषणसे क्रोधावेशसे बाहर आये दुर्योधनके साथ तब भीमका गदायुद्ध हुवा । उस युद्धमें यह भीमसे मारा गया । ३ परिशिष्ट १

अ० १. श्लो० २-द्रोणाचार्य आंगिरस गोत्रीय भरद्वाज ऋषिका पुत्र । तपश्चर्यामें रत भरद्वाज ऋषि घृताची नामकी अप्सरासे मोहित होकर जो पुत्र हुवा वही द्रोण है। द्रोणके द्रोणाश्व, रुक्मरथ, भारद्वाज ऐसे भी नाम हैं। द्रोणाचार्यने अपने पिताके पास ऋग्वेशादिके साथ धनुर्वेदका अध्ययन भी किया था। भरद्वाज महान् विद्वान था। बृहस्पतिने इन्हे आग्नेयास्त्र दिया था । द्रुपदराजा द्रोणाचार्यका सहा- ध्यायी था। जब द्रोणाचार्य तपश्चर्या कर रहे थे द्रोणाचार्यको यह जानकारी मिली कि जमदग्नि पुत्र परशुराम ब्राह्मणोंको धन बांट रहे हैं। परशुरामके पास गये। परशुरामने सारा धन पहले ही बांट दिया था इसलिये द्रोणाचार्यको अपनी शस्त्र-विद्या दी। इसी समय द्रोणाचार्यको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति हुई। द्रोणाचार्य अस्त्र विद्या निपुण हो गये किंतु आर्थिक दुरवस्थासे मुक्ति नहीं मिली। आर्थिक दृष्टिसे ये अत्यंत विपन्नावस्था भोग रहे थे। तभी द्रव्यार्जनके लिये द्रुपदराजाके पास गये और द्रुपदराजाने इनको अपमानित किया। इससे अस्वस्थ द्रोणाचार्य हस्तिनापुर गये। भीष्माचार्य द्रोणाचार्यकी विद्वत्तासे संपूर्ण परिचित थे। कौरव पांडवोंको शिक्षार्थ उन्हीके पास भेजना चाहते थे किंतु वे ही चलकर यहां आये थे। तब भीष्माचार्यने बडे ही सन्मानसे द्रोणाचार्यका स्वागत करके उन्हे राज-पुत्रोंका गुरुस्थान दे दिया। इससे देशके भिन्न भिन्न नगरोंके विद्यार्थी उनके पास अस्त्रविद्या सीखने आने लगे। उस समयके अनेक राज-पुत्र द्रोणाचार्यके शिष्य रहे हैं। एक बार आचार्य अपने विद्यार्थियोके साथ नदी पर स्नान करने गये थे। एक बडे मगरने द्रोणाचार्यको पकड लिया। यह देख कर अर्जुनके बिना और सब विद्यार्थी डरके मारे भाग गये किंतु अर्जुनने मगरको मार कर गुरुको छुडा लिया तभी द्रोणाचार्यने अकेले अर्जुनको ब्रह्मास्त्रका सप्रयोग ज्ञान दिया। जब द्रोणाचार्यने देखा अपने सभी विद्यार्थी अस्त्र-विद्या पारंगत हो गये हैं आचार्यने द्रुपदराजको बंदी बना कर अपने सामने ला देने की गुरु-दक्षिणा मांगी तब अर्जुनने वह काम किया। जब द्रुपद बंदी बन कर उनके सामने लाया गया तब द्रोणाचार्यने उसका आधा राज उत्तर पांचाल अपने पास रख कर आधा राज उसको छोड दिया। पांडव जब बनवास और अज्ञातवास पूरा करके आये और अपना अधिकार मांगने लगे तब द्रोणाचार्यने दुर्योधनको बहुतेरा समझाया तब कर्णने इसे पांडव-पक्षपात मानकर द्रोणाचार्यको भला बुरा कहा इस समय, कर्ण-द्रोण-वाद तलवारसे निपटनेका प्रसंग आया था किंतु भीष्माचार्यने बीच बचाव किया। दुर्योधनने किसीकी नहीं मानी और युद्धकी नौबत आयी। जीवन भर जिसके साथ बिताया उसका आपत्कालमें साथ छोडना द्रोणाचार्यने उचित नहीं माना और युद्धमें दुर्योधनका साथ दिया। युद्धके दसवे दिन कौरव सेनापति भीष्मका पतन हुवा तब द्रोणाचार्य सेनापति बनाये गये। ज्ञानेश्वरी ४

पाँच दिन तक ये सेनापति रहे और पांडव सेनाके बड़े बड़े महारथी इसी कालमें मारे गये । उनमें अभिमन्यु और घटोत्कच मुख्य हैं । इन्होंने प्रतिज्ञापूर्वक अभिमन्यु वध किया । अभिमन्यु वधसे संतप्त अर्जुनने जयद्रथ-वधकी प्रतिज्ञा की और वह पूर्ण की । द्रोणाचार्यने जयद्रथकी रक्षाके लिये विशिष्ट व्यूह रचना की थी फिर भी अर्जुनने जयद्रथका वध किया इससे संतप्त होकर द्रोणाचार्यने रात्रीके समय भी युद्ध चालू रखा । वह युद्धका पंद्रहवा दिन था। दिन भर लडकर थके हुए वीरोंने बड़े आवेशसे रातको भी लडाई की । इसी युद्धमें घटोत्कच और भीमने त्राही मचा दी । रात दिन लडकर थके हुए वीरों पर जब निद्रा देवीने अपना जाल बिछाया भीमने इसका पूरा लाभ लिया । उसने इंद्र वर्माका अश्वत्थामा नामका हाथी मारा ! सारी पांडवी सेना "अश्वत्थामा मारा गया !" कह कर चीखने चिल्लाने लगी । यह सुन कर द्रोणाचार्य दुःखी हुए । आचार्यने निर्णयके लिये युधिष्ठिरसे पूछा । कृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरने "अश्वत्थामा मारा गया !" कहते हुए भी धीरेसे "हाथी !" कहा जो द्रोणाचार्य नहीं सुन सके । उन्होंने पुत्रशोकमें शस्त्रसंन्यास लिया । इसी समय भरद्वाज आदि पितरोंने " तू ब्राह्मण होकर भी युद्धमें शस्त्र उठानेका पाप किया !" कहते हुए शस्त्र छोड कर योगमार्गका आसरा लेनेको कहा और धृष्टद्युम्नने "यही ठीक समय !" जान कर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । ये मार्गशीर्ष वद्य द्वादशीको दोपहर मारे गये । मृत्यूके समय इनकी आयू ९५ वर्षके आस पास थी । कृष्णाजिन और कमंडलु इनका ध्वज चिन्ह था । इन्होंने द्रुपदराजा, विराट, द्रुपदपुत्र शंख, और वसुदानका वध किया है । गीता अ० १. श्लो. ३-द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्रुपदराजाका पुत्र ! अयोनिंसभव ! द्रोणाचार्यने अपने शिष्योंसे द्रुपदराजाको बंदी बना कर उसका आधा राज्य छीनकर छोड़ दिया था । परिणामस्वरूप द्रुपदराजा दुम पर पैर देकर छोडे हुए सांपकी भांति द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये पागल हो गया । द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये द्रुपदराजाने जो यज्ञ किया उस यज्ञसे धृष्टद्युम्न पैदा हुवा और द्रौपदी भी । द्रोणाचार्य ही इसके अस्त्र-गुरु थे । यह युद्धमें अत्यंत पराक्रमी था । वैसे ही चतुर भी । जब द्रौपदी स्वयंवरमें ब्राह्मणकी वेष-भूषामें आये पांडवोंने द्रौपदीको जीता तब सारी राज-सभा उद्विग्न हो गयी । "ब्राह्मणोंने क्षत्रिय-कन्या कैसे जीती ?" यह उद्विग्नता इतनी तीव्र थी कि उसी समय महा-युद्ध होनेकी नौबत आयी किंतु धृष्टद्युम्नने अत्यंत योग्यता पूर्वक पांडवोंका परिचय देकर प्रसंग निभा लिया । भारत युद्धमें आदिसे अंत तक यही सेनापति रहा । और अत्यंत कुशलतासे सेना-संचालन करता रहा । युद्धके अंतमें बचे हुए कुछ सेनानियोंमें यह भी एक था । युद्धके पंद्रहवे दिन दोपहरको भीमने अश्वत्थामा नामका एक हाथी मारा । और सारी पांडव सेनामें भीमने अश्वत्थामाको मारा "कोलाहल मच गया ।" द्रोणाचार्यने सोचा "मेरा पुत्र अश्वत्थामा मारा गया" और शोक-मग्न द्रोणाचार्यने शस्त्र रख दिया । "यही मौका" जान कर धृष्टद्युम्नने गुरु द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया ! यह देखकर सात्यकीने "असहाय स्थितिमें निःशस्त्र ५ परिशिष्ट १.

शत्रु पर वार किया" कह कर इसकी भर्त्सना की। परिणाम स्वरूप दोनोंमें युद्ध होनेकी स्थिति निर्माण हो गयी तब कृष्णने बीच बचाव करके दोनोंको शांत किया। युद्ध समाप्ति के बादकी रातको शिविरमें निद्रस्त धृष्टद्युम्नकी अश्वत्थामाने हत्या की। धृष्टद्युम्नके पाँच पुत्र थे। क्षत्रंजय, क्षत्रवर्मन्, क्षत्रधर्मन्, क्षत्रदेव, धृष्टकेतु, सबके सब भारत-युद्धमें द्रोणाचार्यसे मारे गये। इस प्रकार भारत-युद्धमें संपूर्ण पांचाल-वंश ही नष्ट हो गया। गीता अ० १, श्लो० ४-भीम पांडुराजा और कुंति पुत्र। द्वितीय पांडव। जब यह पैदा हुआ तब आकाशवाणी हुई कि "यह महाबली है।" बचपनमें ही यह इतना बली था कि एक बार माताके हाथसे छूट कर पत्थर पर गिर पड़ा तो पत्थरके टुकड़े टुकड़े हो गये ! पहले इसने अपने अन्य भाइयोंके साथ ही शर्यातीके शुक नामके पुत्रसे शस्त्र विद्या सीखी। सब पांडव तब अपने पिताके साथ हेमवत पर्वतके शतशृंग नामक अरण्यमें थे। जब पांडुकी मृत्यू हुई तब वहाँके ऋषियोंने कुंति माद्रीके साथ पांडवोंको हस्तिनापुर पहुंचाया। तबसे पांडव और कौरव साथ साथ पढ़ते बढते और खेलते रहते। भीम खेलमें सबको तंग करता था। इसके सामने कौरवोंकी एक भी नहीं चलती थी। हर बातमें अपनी हेठी होती देख कर ईर्ष्यासे दुर्योधनने कई बार इसको मार डालनेका षडयंत्र किया। एक बार जलक्रीडाके समय जहर देकर जल केलीमें थक कर सोये हुए-विषबाधासे बेसुध-भीमको हाथ पैर बांधकर नदीमें फेंक दिया। जहां इसको फेंका था वहां पानी अत्यंत गहरा था। नीचे अमृत कुंड थे। वासुकीकी सहायतासे पेट भर अमृत पीकर, भीम युद्धमें कभी न थकनेकी शक्तिके साथ वहांसे ऊपर आया। यह गदायुद्धमें निपुण था। अपनी शिक्षा दीक्षाकी परीक्षा देते देते एक बार भीम और दुर्योधन युद्ध-प्रवृत्त हुए तब द्रोणने उनको रोका। इससे धृतराष्ट्रने कौरव और पांडवोंको दूर रखनेका निश्चय किया। उस समय "वारणावतमें बड़ा मेला होगा !" ऐसी अफवा उठाकर, पांडवोंको वहां जानेको प्रवृत्त किया और दुर्योधनने वहां पांडवोंको कुंती माताके साथ लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेकी योजना बनाई। किंतु विदुरसे पहले ही इसकी और इस गृहसे बाहर जानेके गुप्त मार्गकी जानकारी मिलनेसे इस समय भी पांडव बच गये। स्वयं भीम ही घरमें आग लगा कर माता तथा भाइयोंको साथ लेकर गुप्त मार्गसे बाहर निकल आया। वहांसे जब ये गंगातीर पर आये वहां विदुरके लोगोंने इन्हे गंगा पार उतार दिया। वहां भीम अपनी माता तथा भाइयोंको उठा कर वनमें चला गया। तब कुंति और युधिष्ठिरको प्यासा देखकर उन्हे वहीं छोड़ कर यह पानी लाने गया। पानी ले आया तब सभी नींदमें सो गये थे। यह वहीं उनका रक्षण करने बैठ गया। पास ही हिडिंब नामका राक्षस रहता था। उसको मनुष्यकी गंध आने लगी। उसने अपना शिकार देखनेके लिये बहन हिडिंबाको भेज दिया। हिडिंबा भीमको देख कर मोहित हो गयी। वह अपना स्वीकार करके भाग जानेको कहने लगी। भीमने उसकी बात नहीं मानी। गयी हुई बहन इतनी देर होने पर भी क्यों नहीं आयी यह देखनेके लिये हिडिंब वहां आया। भीमसे उसकी बातचीत हुई, तू तू मैं मैं होकर, लडाई प्रारंभ हो गयी। इस द्वंद्व युद्धसे पांडव सब जग गये। भीमने हिडिंबका वध किया। हिडिंबाने कुंतीसे सारी बातें कहीं। वह अपनी माता और भाइयोंको साथ लेकर जाने लगा तो हिडिंबा भी उनके पीछे पीछे आने लगी। भीमने उसको भी मारनेकी बात कही, किंतु कुंति और युधिष्ठिरके कहनेसे उसका पाणिग्रहण किया। तब भीमने केवल ज्ञानेश्वरी ६

एक संतान होने तक उसके साथ रहनेका वचन दिया था। हिडिंबाने भी इसको मान लिया। इसी समय हिडिंबाको भीमसे घटोत्कच हुवा था। इस घटनाके बाद पांडव कुंतिके साथ एकचक्र नगरमें रहने गये। वहां भीमने बकासुरका वध किया। कुछ दिनमें पांडवोंको पता लगा कि द्रुपदराजाकी कन्या द्रौपदीका स्वयंवर है। पांडव उस स्वयंवरमें गये। अर्जुनने स्वयंवरमें द्रौपदीको जीत लिया। वहां अन्य राजाओंसे भीम और अर्जुनका युद्ध हुवा। फिर वे द्रौपदीके साथ घर आये। भीमने कहा "मां भिक्षा लाये हैं।" और कुंतीने कहा "पांचो बांटकर खावो!" फिर खूब चर्चा होनेके बाद द्रुपदराजाने द्रौपदीका अलग अलग दिन पांडवोंसे अलग अलग विवाह कर दिया। स्वयंवरमें कृष्ण भी था। उसने पांडवोंको पहचान कर बलरामसे कहा था। फिर कृष्ण और बलराम पांडवोंसे मिलने भी गये थे। इस घटनाके बाद पांडव द्रौपदीके साथ हस्तिनापुर आये। भीष्म धृतराष्ट्र आदि वृद्ध जनोंने खूब विचार विनिमय करके पांडवोंको आधा राज्य दिया। इसी समय युधिष्ठिरने राजसूय-यज्ञ किया। राजसूय-यज्ञके प्रारंभमें युधिष्ठिरने भीम और अर्जुनको कृष्णके साथ जरा- संघको मारनेके लिये भेज दिया। वहां ये तीनों ब्राह्मणवेषमें गये थे। वहां कृष्णने युद्ध भिक्षा मांगी। जरासंघने भीमको चुना। दस दिन तक भीम और जरासंघका द्वंद्व युद्ध हुवा। दस दिनके बाद जरासंघ थक गया। तब भीमने जरासंघको चीर कर फेंक दिया। उसके बाद भीमको अन्यान्य राजाओंको जीतनेके लिये पूर्व दिशामें भेज दिया। इस दिग्विजयमें भीमके साथ मद्रक राजा थे। भीमने पूर्वमें पांचाल, विदेह, गंडक, दशार्ण दक्षिणमें पुलिंद, कुमारका श्रेणिमंत, कोसलका बृहद्वल, अयोध्याका दीर्घयज्ञ, गोपालकक्षदेश, मल्ल, हिमालयकी तराईका जलोद्भव, भल्लाट, शुक्तिमान्-पर्वत, काशिराज, सुबाहु, सुपार्श्व, मत्स्यदेश, अभयदेश, आदि २१ राज्योंको जीता। इस यज्ञमें भीम पाकशालाकी व्यवस्था देखता था। जिस स्थान पर यज्ञ हुवा था वह मय-सभागार अत्यंत कुशलतासे बनाया गया था। उसकी कुशल कलास्मिकताके कारण बार बार दुर्योधनकी दुर्गत होती थी तब भीम उसको हंसता था। इसीके परिणाम स्वरूप कपट-द्यूत हुवा। इस द्यूतमें दुर्योधनने पांडवोंका सर्वस्व हरण किया था। युधिष्ठिर द्रौपदी भी हार गया। तब सभामें दुश्शासनने उसके बाल पकड़ें और भीमने प्रतिज्ञा की "यह तेरा हाथ शरीरसे अलग करके फेंक दूंगा और तेरा खून पीऊंगा!" इसी समय दुर्योधनने अपनी जंघा खुली करके दिखाते हुए द्रौपदीसे कहा "तू मेरी मांद पर बैठ जा !" तब भीमने कहा "वहां मेरी गदा बैठेगी।" पांडव वनवासमें गये । चौथे दिन जिस वनमें गये वहां एकचक्र नगरके बकासुरका भाई किर्मीर रहता था। उसकी और युधिष्ठिरकी कुछ बोलचाल हुई। इस बोलचालने युद्धका रूप ले लिया और भीमने उसका वध किया। एक दिन हवामें उड़ता आया हुवा एक सहस्रदल कमल, देखकर भीम द्रौपदीसे "तुझे ऐसे कमल ला दूंगा !" कहता हुवा गंधमादन पर्वत पर गया। वहां उसने रास्ते पर अपनी दुम फैलाकर बैठा हुवा एक वानर देखा। भीमने उस वानरको अपनी दुम हटानेको कहा किंतु वानर नहीं माना ! उसने कहा "तू यह दुम हटा दे फिर आगे जा !" वहां इसका मद उतरा। उसको ज्ञात हुवा कि यह हनुमानजी हैं। फिर हनुमानजीने अपना विराट् रूप दिखाया। भीमको आशीर्वाद दिया। और "अब तू युद्ध-भूमिमें सिंहनाद करेगा परिशिष्ट १

तब मेरी गर्जनसे मैं उसे गूंजाऊंगा!" कह कर आगे छोड़ दिया। वहींसे वह सौगंधिक वनमें गया। वहां सौगंधिक सरोवरमें सहस्रदल कमल थे। इन कमलोंकी रखवालीमें क्रोधवश नामके राक्षस थे। उन्होने भीमको एक भी कमल देनेसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कुबेरकी आज्ञा ले आनेको कहा। इसीमें कहासुनी होकर दोनोंमें द्वंद्वयुद्ध छिड़ गया और उसमें उन राक्षसोंको मार खाकर भाग जाना पड़ा। वे राक्षस कुबेरकी ओरसे रखे गये थे। उन्होंने कुबेरसे सब बात कही और कुबेरने उनको कमल लेनेकी आज्ञा दी। इसी बीच युधिष्ठिर घटोत्कचकी सहायतासे वहां आया। कुबेरने वहां उनका स्वागत किया। वे कुछ दिन वहां रहकर गंधमादन पर्वत पर जा कर अर्जुनकी प्रतीक्षा करने लगे। वहां भीमने जटासुरको मारा। तब द्रौपदीने भीमसे कहा "यहां का यह सुंदर प्रदेश तू निर्भय कर दे!" भीमने तुरंत कई क्रोधवश राक्षस मार दिये। कुबेरका एक मित्र राक्षस मणिमान्‌को मार दिया। पांडवोंने वहांसे मेरु-पर्वतका दर्शन किया और गंधमादन पर्वत पर आ कर रहने लगे। वहांसे पांडव द्वैतवनमें रहने गये। पांडव जब मृगयामें गये थे तब आकर जयद्रथ द्रौपदी और धौम्यको भगाकर ले गया। यह सुन कर भीम और अर्जुनने जयद्रथके सैन्यको हराकर उसको बांधकर धर्मराजके सम्मुख खड़ा किया। भीमने तब जयद्रथके सिर पर लाथ मारी। धर्मराज युधिष्ठिरने उसको क्षमाकरके छोड़ दिया। वनवासके बाद ये सब अपना वेष बदलकर विराटके घर रहे। तब भीम वहां रसोइया और मल्ल बनकर रहा। वहां इसका प्रसिद्ध नाम बल्लव था। वैसे यह जयेश भी कहलाता था। इसने तब विराटसे कहा था "मैं युधिष्ठिरके पास रसोया था।" विराट नगरमें जब एक दिन शंकरोत्सव हुवा तब वहां कुश्तियां हुईं। उन कुश्तियोंमें जीमूत नामका एक प्रसिद्ध मल्ल आया था। वह अत्यंत शक्तिमान था। कोई भी उसके साथ लड़ने के लिये तैयार नहीं थे। फिर भीमसे कहा गया। भीमको डर था कहीं कोई मुझे पहचानेगा। हां ना करते करते वह उठा। फिर उस कुश्तीमें भीमने जीमूतका वध किया। इन्हीं दिनोंमें विराट राजाका सेनापति और श्यालक कीचक द्रौपदी पर मोहित हुवा। वह द्रौपदीको तंग करने लगा। द्रौपदीने भीमसे कहा। भीमने कहा "प्यारसे बातें करके उसको दूसरी प्रहर रातको नृत्यशालामें भेज दे!" कीचक रातको वहां आया। भीम और कीचकका द्वंद्व-युद्ध हुवा। भीमने कीचकको मार डाला। दूसरे दिन प्रातःकालमें कीचकके बंधुओंने कीचकके साथ द्रौपदीको भी जला देनेकी सजा सुना दी। अब द्रौपदीको जलायेंगे इतनेमें भीम अपने मुख पर बाल बिछाकर हाथमें एक बड़ा वृक्ष उठाकर आ गया। द्रौपदीने अपनेको गंधर्व-पत्नी घोषित कर रखा था। "गंधर्व आया!" कह कर कीचक-बंधु भागने लगे किंतु भीमने उनको पकड़ कर मसल दिया ! युद्धके पहले भीमने एक बार कृष्णसे शांति-संधान करनेको कहा था। सुनकर कृष्णको आश्चर्य हुवा। तब भीमकी बात सुन कृष्ण चकित हो गया था। युद्ध प्रारंभ होते ही भीमने, दूसरे दिनमें भानुमान कलिंग, उसके चक्र रक्षक सत्य और सत्यदेव, भानुमानका पुत्र शक्रदेव केतुमान्, आदिका वध किया। चौथे दिनमें भीम और दुर्योधनका मुकाबला हुवा। भीमने दुर्योधनकी गजसेनाका धुव्वा उड़ाया। दुर्योधनकी आज्ञासे उसका सारा सैन्य भीम पर आक्रमण कर उठा तब भीमने उस सेनाका भी धुव्वा उड़ाया। तब भीष्म बीचमें आये और सात्यकीने भीष्मको रोका। दुर्योधन अपने सभी भाइयोंके साथ खड़ा है यह देखकर भीम उन पर आक्रमण ज्ञानेश्वरी ६

करने लगा । तब दुर्योधनके बाणसे वह बेहोश हुवा और उठते ही उसने सेनापति जरासंध, सुषेपेण, उग्र, वीरबाहू और उसका सारथी, भीमरथ और सुलोचन इन लोगोंका वध किया। युद्धके छठे दिनमें भीमने अत्यंत पराक्रम किया। जैसे किसी हथौडेसे मिट्टीके गोले तोडे जाते हैं वैसे भीमने शत्रु सैन्यको नष्ट किया है। आठवे दिन भीष्म क्रुद्ध हो कर इस पर टूट पडा। तब भीमने भीष्मके सारथीको मारा। भीष्मका रथ अस्ताव्यस्त होकर भाग खडा हुवा। फिर भीमने सुनामा, आदित्य, केतु, बहबासी, कुंढाधार, महोदर, अपराजित, विशालाक्ष इन धृतराष्ट्र पुत्रोंको मारा। इसी दिन मध्यान्हमें भीमने अनाधृष्टि, कुंडली, कांडमेदी, विराज, दीप्तलोचन, दीर्घबाहू, सुबाहु, मकरध्वज आदि कौरवोंका वध किया। नवमें दिन भगदत्त और श्रुतायुके गजदलका भीमने नाश किया। दसवे दिन भीम, भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा, अवंत्य, बंधु, जयद्रथ, विकर्ण, दुर्मर्षण, इन दस लोगोंसे लड कर भी पराजित नहीं हुवा। जब अर्जुन शिखंडीको आगे करके भीष्म पर आक्रमण करने जा रहा था तब भीमने इन सबको राहसे हटा दिया। ग्यारहवे दिन अभिमन्युने शल्यके सारथीको मारा और शल्यने जब अभिमन्युको गदायुद्धके लिये ललकारा तब अभिमन्युको हटा कर भीम शल्यसे गदायुद्ध करने लगा। इस युद्धमें शल्य मूच्छित हो गया। चौदहवे दिन जयद्रथ वध हुवा। अर्जुन उस युद्धमें उलझ गया था तब युधिष्ठिरने भीमको भी वहां जानेको कहा। युधिष्ठिरकी आज्ञासे जब भीम उस ओर जा रहा था तब दुःशल, चित्रसेन, कुंडभेदी, विविंशति, दुर्मुख, दुःसह, विकर्ण, शल, विंद, अनुविंद, सुमुख, दीर्घबाहु, सुदर्शन, वृंदारक, सुहस्त, सुषेण, दीर्घलोचन, अभय, रौद्रकर्म, सुवर्मन्, तथा दुविमोचन इतने लोगोंने एक साथ भीमपर आक्रमण कर दिया, किंतु भीमने इन सबको हटाकर इनके घेरेका अतिक्रमण कर दिया। स्वयं द्रोणाचार्य आगे आये। मानापमानका प्रश्न लेकर इन दोनोंमें कुछ बातचीत हुई। भीम भडक उठा। उसने द्रोणके रथको तोडकर फेंक दिया। द्रोण पादचारी बने। भीमने दुश्शासनको मार भगाया। द्रोण दूसरे रथमें आये। पादचारी भीमने वह रथ भी तोड कर फेंक दिया । उस दिन भीमने द्रोणके एकके बाद एक ऐसे आठ रथ तोड कर फेंक दिये । साथ ही साथ कुंडभेदी, शैद्रकर्मन्, अभय इन धृतराष्ट्र पुत्रोंका वध किया और अंतमें अर्जुनके पास पहुंच ही गया तब अर्जुनसे मिलनेका संकेत मानकर अपना प्रचंड शंखनाद किया। कर्ण तब भीम पर चढायी कर आया और भीमने कर्णके घोडे मार दिये। कर्ण वृषसेनके रथपर चढ़ कर आगे बढ़ आया तब भीमने कर्णको मूच्छित किया और सारथी रथको लेकर भाग गया। होश संभाल कर कर्ण पुनः भीम पर चढाई कर आया। इस बीचमें भीमने दुःशलका वध किया। दुर्मुखका वध किया और कर्णको पुनः रथ-हीन करके भगा दिया। कर्णकी यह पराजय देखकर दुर्मर्षण, दुर्मद, दुर्धरने, भीमपर आक्रमण किया और भीमके प्रहारोंसे मर भी गये। इसके बाद भी कर्ण भीम पर पुनः चढ़ाई कर आया। भीम कर्ण युद्ध हुवा। इस युद्धमें भी कर्णकी पराजय होती है यह देख कर, दुर्योधनने अपने बंधु शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र, चित्रायुध, दुष्ट, चित्रसेन, और विकर्णको भीम पर चढाई करनेको कहा और भीमने उन सबको वहीं मसल दिया। इनके साथ ही साथ चित्राक्ष, चित्रवर्मा तथा शरासनको भी मार गिराया। किंतु विकर्ण भीमका प्रियपात्र था इसलिये उसकी मृत्युपर भीमको शोक हुवा। इसके बाद भी भीम-कर्ण युद्ध हुवा। थोडी ही देरमें कर्णने इसके साथ लडना छोड दिया। इस दिन रातको ९ परिशिष्ट १. (३)

यहाँ दिए गए पृष्ठ का लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

भी युद्ध चलता रहा । रातको भानुमान कलिंगका पुत्र बापका बदला लेनेके लिये भीम पर चढाई कर आया किंतु भीमने उसको मुक्केसे ही मार डाला ! फिर जयत्सनके रथ पर चढ कर उसको उसीके रथमें एक झांपड मार कर ही खतम कर दिया । वैसे ही दुष्कर्णको मसल दिया । फिर बाल्हीकोंसे भीमका युद्ध हुवा । उसमें बाल्हीकके पुत्रको मूर्च्छित किया । किंतु बाल्हीकोंसे यह आहत भी हुवा और उससे जरा संभालते ही इसने दृढरथ, नागदत्त, विरजा, और सुहस्तका वध किया । तब स्वयं दुर्योधन इस पर आक्रमण करके पराजित होकर हठ गया । फिर कर्णसे युद्ध हुवा । इस युद्धमें दोनों पादचारी हुए । भीम तब नकुलके रथ पर चढा । युद्धका पंद्रहवा दिन । द्रोणाचार्य कहर बरपा रहे थे । तब कृष्णने भीमको कुछ संदेसा दिया । भीम इंद्रवर्माका हाथी अश्वत्थामाको गदासे मारकर द्रोणके आस पास जा कर "अश्वत्थामा मर गया !"-अश्वत्थामा मर गया !' ऐसे चीखते चिल्लाने उछलते लगा । यह सुनकर द्रोणने शस्त्र नीचे रखे और धृष्टद्युम्नने "यही समय" मानकर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । द्रोणाचार्यकी मृत्युसे अर्जुनको बडा दुःख हुवा । वह आत्महत्याका विचार भी करने लगा । भीमने तब उसको डांट फटकारकर परावृत्त किया । सोलवे दिन इसने क्षेमधूर्ति और उसके हाथीको मारा । फिर अश्वत्थामा और भीमका युद्ध हुवा । उसमें दोनों आहत हो गये और साथियोनें रथ पीछे हटाया । सत्रहवे दिन कौरव सेनाका भुर्ता बन गया । अपनी सेना तहस नहस होते देखकर दुर्योधन सेनाको प्रोत्साहित करते हुए स्वयं भीम पर चढाई कर गया किंतु पराजित हुवा । भीमने इसकी गजसेनाका विध्वंस कर डाला । फिर कर्ण इसपर चढाई कर आया । कर्ण भी पराजित हो कर रणभूमि छोडना चाहता था कि दुर्योधनने अपने भाइयोंको भीमपर चढाई करनेको ललकारा । एक साथ श्रुतश्रवा, दुर्धर, क्रोध, विवित्सु, विकट, सम, निसंगी, कवची, पाशी, नंद, उपनंद, दुष्प्र, धर्ष, सुबाहु, वातवेग, सुवर्चस, धनुर्ग्रह, शाल, और सह भीमपर चढाई कर आये । भीमने विवित्सु, विकट, सह, क्रोध, नंद, उपनंदका वध किया । इतनेमें कर्ण पुनः तैयार हो कर आया । तब भीमने एक बाणसे कर्णको आर पार छेद दिया और उसका रथ चूर चूर कर फेक दिया । फिर इसने दुर्योधनकी सेनाका संहार करना प्रारंभ कर दिया । तब शकुनी भीम पर चढाई कर आया । भीमने शकुनीको रथसे भूमि पर पटककर घसीट दिया और दुर्योधन उसको अपने रथ पर डाल कर ले गया । युद्ध चलही रहा था । भीमकी भीषणता क्षण क्षण बढती जा रही थी तब दुःशासन उस पर चढाई कर आया । भीमने उसके घोडे मारे, सारथी मारा, रथ तोड दिया, फिर उसको पकड कर भूमिपर पटक दिया । उसका दाहिना हाथ जिससे उसने द्रौपदीके बाल खींचे थे शरीरसे उखाड कर फेंक दिया । उसका हृदय फाड कर उसका खून पिया और खूनसे सने हाथोंको उछालता हुवा द्रौपदीकी वेणी बांधने चला गया । इसी समय भीमने अलंखु, कवचिन, खड्गिन्, दंडधार, धनुर्धर, निसंगी, वातवेगू, सुवार्चा आदि धृतराष्ट्र पुत्रोंका वध किया । अठारहवे दिन इसने कृतवर्मा और शल्यसे युद्ध किया । शल्यने इसको गदायुद्धमें मूर्च्छित किया । इस मूर्च्छांसे सचेत होते ही भीमने पुनः कौरव-सेनाका संहार-कार्य प्रारंभ कर दिया । इस युद्धमें भीमने कौरवोंकी गजसेनाके साथ ही साथ दुर्मर्षण, श्रुतांत, जैत्र, भूरिबल, रवि, जयत्सेन, सुजात, दुर्विषह, दुर्विमोचन, दुष्प्रधर्ष, तथा श्रुत- श्रवाका वध किया । इसके बाद सुदर्शनका वध किया । फिर प्रत्यक्ष दुर्योधन और भीमका अंतिम गदायुद्ध हुवा उसमें कृष्णकी सूचनासे भीमने दुर्योधनकी जांघ पर गदा-प्रहार करके उसका वध किया । इस पर बलरामने इसको अधर्म-युद्ध कहा और कृष्णने भीमकी प्रतिज्ञाका स्मरण दिला ज्ञानेश्वरी १०

कर उसका समाधान किया। अंतमें अश्वत्थामासे लडकर उसका मणि ले आया इस प्रकार भारत युद्धका अंत हुवा। महाभारतके बाद सिंहासनारोहणके समय युधिष्ठिरने भीमको युवराजाभिषेक किया। युद्धके बाद सभी पांडव धृतराष्ट्र और गांधारीसे प्रेमसे रहे किंतु भीम ही अकेला उनको जली कटी सुनाता रहा। अंतमें इसकी बातोंसे तंग आकर धृतराष्ट्र गांधारीके साथ वनमें गया। आगे अनेक वर्ष राज्य करनेके बाद पांडव शस्त्र-संन्यास करके उत्तर दिशामें स्वर्गारोहण करने गये। तब राहमें जब भीमका पतन हुवा भीमने युधिष्ठिरसे पूछा "मैं क्यों गिरा ?" युधिष्ठिरने कहा अपनेको बलवान मानता था। शक्तिका अभिमान करता था तथा तू बडा पेटू था इसलिये तेरा पतन हुवा। इस समय भीमकी एक सौ सात सालकी आयु थी। इसकी तीन पत्नियां थी। हिडिंबा, द्रौपदी, तीसरी काशीराजाकी कन्या जलंधरा। इनके हिडिंबासे घटोत्कच, द्रौपदीसे श्रुतसोम और जलंधरासे सर्वत्रात ऐसे तीन पुत्र थे। धृतराष्ट्रके सभी सौ पुत्रोंको इसीने मारा था। इसका शंख पौंड्र था। गीता अ० १. श्लो० ४-अर्जुन— कुंती पुत्र। तृतीय पांडव। यह फाल्गुन मासमें उत्तराफाल्गुनी सह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें पैदा हुवा था इसलिये इसको फाल्गुन भी कहते हैं। इसका जन्म हिमालयके शतशृंग पर्वत पर हुवा था। यह द्रोणाचार्यका पट्टशिष्य था। यह अत्यंत दक्ष था। एक दिन रातको जब यह भोजन करने बैठा था तब दीप बुझ गया। अंधारमें यह खाता रहा। अंधारमें जरा भी चूक होनेके पहले भोजन होनेसे यह सोचने लगा कि अभ्यासके बलसे जैसे अंधारमें भी न चूकते भोजन हुवा ऐसे अन्य बातें भी हो सकती हैं और इसने अंधारमें ही लक्ष्यवेधी अभ्यास किया। धनुर्विद्यामें यह अत्यंत कुशल था। एक बार द्रोणाचार्यने सबकी परीक्षा लेनेके लिये एक कृत्रिम पक्षी एक पेड पर बिठा कर पूछा "वहां क्या दीखता हे !" केवल अर्जुनने ही कहा था "केवल पक्षीकी गर्दन दीखती है!" इतना यह एकाग्र रहता था। एक बार अर्जुनने पांच बाण मार करके मगरके मुखसे द्रोणको मुक्त किया था। इसकी धनुर्विद्या कुशलता पर द्रोणने "ब्रह्मशिर" नामका उत्तम अस्त्र दिया था। एक बार परीक्षा समारोहमें अर्जुनने एकसा दीखने वाले पांच बाण छोडकर, हिलते सींगमें बीस बाण भर कर, अपना चातुर्य दिखाया था और सबसे प्रशस्ति पायी थी। शस्त्र-विद्या समाप्त होने पर गुरु दक्षिणाके रूपमें गुरु द्रोणने द्रुपदराजाको सजीव पकड लानेको कहा तब केवल अर्जुन ही यह काम कर सका, और किसीसे यह नहीं हुवा। अपनी छोटीसी आयुमें ही अर्जुनने सौवीराधिपति दत्तमित्रको जीत लिया था जिसे पांडु भी नहीं जीत सका था। विपुलको भी इसने जीता। पांडवोंका कीर्ति-सौरभ सर्वत्र फैलनेमें अर्जुनके पराक्रमका खूब ही हाथ रहा है। लाक्षागृहसे पार होनेके बाद राहमें अंगारपर्ण गंधर्व अपनी स्त्रियों सह जल-क्रीडा कर रहा था। उसने पांडवों को रोका इसी बात पर अर्जुन और अंगारपर्णका युद्ध हुवा। उसमें अर्जुन जीत गया। अल्पायुमें ही अर्जुनकी शस्त्र-कुशलता देख कर उसने अर्जुनको सूक्ष्मपदार्थ दर्शक चाक्षुषीविद्या सिखायी। साथ साथ अर्जुनसे अग्निशस्त्र-विद्या सीखली। इसीके कहनेसे पांडवोंने धौम्य ऋषिको पुरोहित बना लिया था। इस घटनाके बाद, अर्जुन द्रौपदी स्वयंवरमें द्रुपदराजाके घर गया। वहां पर द्रौपदी-स्वयंवरका प्रण जीत कर इसने द्रौपदीको जीत लिया। द्रौपदी स्वयंवरमें ११ परिशिष्ट १-

अनेक क्षत्रिय राजा आये थे किंतु मत्स्य भेदकी बाजी जीतनेका साहस करनेवाला कोई विरला ही था। इस घटनाके बाद धृतराष्ट्रने विदुरको भेजकर पांडवोंको हस्तिनापुर बुल लिया। एक बार वहां एक ब्राह्मणकी यज्ञीय सामग्री चोरी गयी। वह अर्जुनके पास आकर रोने लगा। अर्जुन उस ब्राह्मणको आश्वस्त करके शस्त्र लानेके लिये शस्त्रागारमें गया। वहां युधिष्ठिर और द्रौपदी एकांतमें थे। इसलिये नियमानुसार अर्जुनको एक वर्ष तीर्थयात्राके लिये जाना पडा। तब युधिष्ठिरने कहा था "तू मुझसे छोटा है। छोटोंका बडोंके एकांतमें जाना दोष नहीं है। और तू स्वधर्म पालनके लिये गया था।" किंतु अर्जुनने युधिष्ठिरको समझा बुझाकर तीर्थयात्राके लिये उसकी आज्ञा ली। इस तीर्थाटनमें उसने कौरव नामक नागकी उलूपी नामक कन्यासे गांधर्व- विवाह किया। फिर वह उत्तरमें हिमालयकी और गया। वहांसे बिंदुतीर्थ, पूर्वकी ओर मुडकर उत्पालिनी नदी, अपरनंदा, महानदी, गया आदि तीर्थ-स्थानोंको देखकर अंग वंग कलिंगका भ्रमण कर मणिपुर गया। मणिपुरका राजा चित्रवाहन था। उसकी लडकी थी चित्रांगदा। अर्जुनने चित्रांगदाकी मंगनी की। राजाने लडकीका लडका ननिहाल ही रहेगा इस शर्तपर चित्रांगदाका पाणिग्रहण कर दिया। वह मणिपुरमें तीन वर्ष रहा। इस अवधिमें चित्रांगदाको अर्जुनसे एक लडका हुआ। उसका नाम बभ्रुवाहन। यहांसे वह गोकर्ण गया। यहांसे प्रभास क्षेत्रमें जानेके बाद इसने कृष्णकी सहायतासे उसकी बहन सुभद्राको भगा ले जानेका निश्चय किया। इसके लिये युधिष्ठिरकी सम्मति भी ली और रैवतक पर्वत पर जा कर देव-दर्शन करके घर लौटनेवाली सुभद्राको अपने रथमें चढाकर यह हस्तिनापुरकी ओर भागा। कृष्णने अर्जुनका समर्थन करके बलरामका क्रोध शांत किया। बलरामने अर्जुनको द्वारका बुला कर बडे वैभव और समारोहके साथ उससे सुभद्राका विवाह कर दिया। कभी श्वेतकी राजाने शतसंवत्सरादि यागमें सतत हवि डालनेसे अग्नीको मांद्य आया। वह ब्रह्माके पास गया। ब्रह्माने उसको खांडववन खानेको कहा। किंतु जब जब अग्नि खांडववन खाने जाता तब तब इन्द्र प्रचंड वर्षा करके अग्निको परास्त कर देता। अग्नि तब अर्जुनके पास जा कर खांडवनका दान मांगने लगा। अर्जुनने कहा "हममें युद्ध सामाग्रिकी न्यूनता है वह हमें दीजिये, मैं आपको खांडववन देता हूं"। अग्निने कपिध्वजयुक्त दिव्य रथ, जिसे चार श्वेत अश्व जुडे हुए थे, गांडीव धनुष्य, तथा अक्ष्यथ तूणीरके साथ युद्ध सामग्री दी और अर्जुनने खांडववन । अग्निने खांडववनका ग्रास लिया। इन्द्रने पर्जन्य वर्षा की। कृष्णार्जुनने इन्द्रकी एक भी नहीं चलने दी पंद्रह दिन तक अग्नि खांडववन चाटता रहा। तब उसका मांद्य गया। उसमेंसे केवल तक्षक पुत्र अश्वसेन, मायासुर, महर्षी मंदपालके चार पुत्र जरितारि, सारिसृक्त, द्रोण तथा स्तंभ मित्र और सांगंक पक्षी इतने बचकर निकले। अग्नीने ठीक तीन सप्ताह इस वनका आहार किया। दनुपुत्र मय खांडववनसे बाहर निकला और कृष्ण उसका संहार करेगा इतनेमें वह अर्जुनको शरण गया। अर्जुनने उसकी रक्षा की। तब अर्जुनसे कृतज्ञ मयासुरने राजसूय यज्ञमें मय-सभा बांध दी। इस मय-सभाके लिये आवश्यक सामान वृषपर्वाके भांडारमें था। मयने वहींसे इसको पाया। साथ ही साथ इसने उसी कोषागारसे गदा लाकर भीमको दी थी। अर्जुनको वरुणका देवदत्त नामका शंख इसीने इसी कोषागारसे दिया था। युधिष्ठिरने जब राजसूय यज्ञ किया था तब अर्जुनने अपने दिग्विजयमें प्रथम कुलिंद, आनर्त, कालकूट, तथा सुमंडल जीतकर सुमंडल राजाको साथ लेकर शाकलद्वीप, प्रतिविंध्य इन पर आक्रमण करके इन्हें जीत लिया। तब शाकलद्वीपके सभी राजाओंको इसने जीता था। इनके साथ अर्जुनने ज्ञानेश्वरी १२

An exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:

प्राग्ज्योतिष देशको जीत लिया । वहां भगदत्तसे अर्जुनका आठ दिन तक घोर युद्ध हुवा था । भगदत्त भौमासुरका पुत्र था । भगदत्त चीन किरात आदि देशोंका आश्रय-स्थान था । जब भगदत्तने हार मान कर, कर देना स्वीकार किया तब अर्जुनने कुबेरकी आलकावती पर आक्रमण किया । कुबरसे कर लिया । उसके बाद उलूक देशका राजा बृहंत, सेनाबिंदु, मोदापुर, सुदामन, उत्तर-उलुक आदि राजाओंसे करभार लेकर, सेनाबिंदुके देवप्रस्थ नगरमें जा कर वहांसे पौरव विश्वागश्वापर हमला करके उनको जीता । इसके बाद उत्सवसंकेत 'गणों' को जीता । काश्मीरको जीता तथा दस मांडलिकोंके साथ लोहितको जीता । फिर अभिसारी, उरगा नगरी, आदि जीतकर सिंहपूर नगर उध्वस्त किया । सुह्य, चोल आदिको जीतकर इसने बाह्लीक पर आक्रमण करके कांबोजको भी जीत लिया । इन सबमें ऋजिक देशमें भयंकर युद्ध हुवा । अंतमें अनेक देशोंको जीतकर, उन देशोंको मांडलिक बनाकर जब यह मानस-सरोवरकी ओर आगे बढा वहां इसने ऋजिकोंके बनाये हुए नेहर देख लिये । वहांसे यह गंधर्वोपर आक्रमण करके आगे बढा और वहांसे तित्तिरकल्भाष, मंडूक, नामके उत्तम अश्वोंको लेकर हरिवर्षकी ओर आगे बढा । वहाँ इसको ऋषियोंने रोका क्यों कि आगे सभी अदृश्य है । अर्जुन भी आगे न जाकर वहां तक सबसे युधिष्ठिरकी सत्ता मनवाकर इंद्रप्रस्थकी ओर लौट आया । युधिष्ठिरके राजसूयके बाद बढी हुई दुर्योधनकी ईर्ष्याग्निमें जब पांडवोंका सर्वस्व स्वाहा हुवा और कपट द्यूतमें सभी हारकर पांडव बनवास गये तब अर्जुन पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिके लिये इंद्रकीलपर्वत पर जाकर पशुपति नाथकी तपस्या करने लगा । उस समय शंकरने किरात रूपमें आकर अर्जुनकी परीक्षा ली । अर्जुन उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुवा और पशुपति-नाथने इसको विश्व-संहारक पाशुपतास्त्रका " रहस्य-पूर्ण ज्ञान " दिया जो पृथ्वी पर और कोई नहीं जानता था । इसके बाद अर्जुन इंद्रके आमंत्रण पर उसीके भेजे गये विमानसे इंद्रलोक गया । इंद्रने अर्जुनका सन्मान करके उसको अपने अर्धासन पर स्थान दिया । वहां पर भी अर्जुनने अनेक विद्याओंका अध्ययन किया । अर्जुन वहां करीब पांच वर्ष तक रहा । वहां वह वाद्यवादन तथा नृत्यकला सीखा । चित्ररथ गंधर्व जो पहले अंगारपर्ण नामसे विख्यात था यहां अर्जुनके काम आया । उसीने अर्जुनको गांधर्ववेद सिखाया । एक बार उर्वशीने अर्जुनसे प्रेम याचना की और अर्जुनने उसका अस्वीकार किया इस पर उर्वशीने उसको षंढ होनेका शाप दिया । पांडवोंके अज्ञातवासमें अर्जुनको इसका उपयोग हुवा जब वह बृहन्नलाके रूपमें विराट राजाके पास रहा । अर्जुनका यह देवलोक वास समाप्त होते होते अज्ञातवासका काल आया । तब इसीने द्रौपदीको कंधेपर लेकर विराट नगरी जानेका काम किया । अर्जुन अज्ञातवासमें बृहन्नला नामसे षंढ-वेषमें द्रौपदी की "परिचारिका थी" कह कर उत्तराको नृत्यकला सिखानेका काम करता था । आगे विराटादि सभी लोग जब दक्षिण गोग्रहणमें उलझे हुवे थे तब दुर्योधनादिने उत्तर गोग्रहण किया । राजधानीमें तब केवल भूमिंजय-उत्तरकुमार-था । बृहन्नला सारथ्य करेगी यह सुन कर यह युद्ध पर चला ! किंतु शत्रुको देखते ही भूमिंजय रथ परसे कूद कर भागने लगा । बृहन्नलाने उसको समझा बुझा कर स्वयं युद्ध करनेका निश्चय किया । शमी वृक्ष परसे अपने आयुध उतार कर उसको अपना वास्तविक परिचय दिया और कौरवोंसे अकेला—बिना सारथीके-युद्ध करके गायोंको छुडा ले आया । इस युद्धमें कर्ण था । अर्जुनके सामनेसे कर्ण जी लेकर भाग निकला । इसी समय कर्णके सामने उसका भाई मारा गया !! १५ परिशिष्ट १-

विराटने तब पांडवोंका सम्मान किया। अर्जुनने उत्तराको अभिमन्युके लिये स्वीकार किया। भारत युद्धकी तैयारी होने लगी। कृष्णकी सहायता मांगनेके लिये दोनों ओरसे दुर्योधन और अर्जुन कृष्णके पास गये । कृष्ण तब सोये हुए थे। दुर्योधन उनके सिरहाने बैठा और अर्जुन पैरोंके पास । जब कृष्ण उठे तब कृष्णने दोनोंको देखा। अर्जुन दुर्योधनसे छोटा था इसलिये मांगनेका उसका अधिकार पहला था। कृष्णने यादवोंकी नारायणी सेना और स्वयं निःशस्त्र कृष्ण, ऐसे दो भागोंमें विभाजित करके पूछा किसको कौन चाहिए। अर्जुनने निःशस्त्र कृष्णकी मांग की और दुर्योधन तीन अक्षोहिणीकी विशाल नारायणी सेना प्राप्त करनेके उत्साहसे घर गया। भारत युद्धके प्रथम, अर्जुनको युद्धके अनिष्ट परिणामकी कल्पनासे विषाद हुआ। इस मोहमय विषादसे जब अर्जुन कर्तव्य विमुख होने लगा तब कृष्णने जो उपदेश दिया उसीको आज भगवद्गीता कहते हैं। भीष्मार्जुन युद्धसे ही महाभारत युद्धका श्रीगणेश हुआ। युद्धके तीसरे दिन ऐसा लगा कि भीष्म पांडवी सेनाका नामोनिशानही मिटा देंगे। तब कृष्णने अपनी प्रतिज्ञा भंग करके हाथमें चक्र उठा लिया। उस समय अर्जुनने भी अपने युद्ध कौशल्यसे सबको चमत्कृत किया। इसी तीसरे दिनके अंतिम प्रहरमें अर्जुनने कौरवी सेनाकी धज्जियां उड़ा दीं। नौवे दिनमें सबसे प्रथम अर्जुन और द्रोणका युद्ध हुआ। भीष्मसे भी गहरी झड़प हो गयी। संध्या समय युद्ध शांत हुआ। भीष्म पितामहके सम्मुख किसीकी कुछ भी नहीं चलती थी। वे इच्छा मृत्युके स्वामी थे। तब कृष्णकी सलाहसे भीष्मसे ही उनकी मृत्युकी चर्चा की गयी। भीष्मने स्वयं अपनी पराजय अथवा मृत्युकी व्यवस्था कही और दसवे दिन शिखंडीको आगे करके अर्जुन भीष्मकी ओर बढा। शिखंडीका अभ्रद्र ध्वज, उसका वह स्त्री-सुलभ हावभावका पौरुष ! यह सब देखकर भीष्मने उस पर शस्त्र न उठानेके अपने नियमका पालन किया और अर्जुनने शिखंडीकी ढाल सामने करके कौरव-सैन्यकी धज्जियां उड़ायीं। उस दिन कौरव वीरोंने अर्जुनको रोकनेकी पराकाष्ठा की। अर्जुनने भीष्म पर शर-संधान करके उन पर हजारों तीर छोड़ कर, उनको गिरा दिया। हजारों बाणोंका शरीरमें घुस जानेसे भीष्म वीरोचित शरशैया पर पडे। तब उनका सिर लटकने लगा। भीष्मने सिरहाना मांगा। दुर्योधनादिने नरम नरम सिरहाने ला दिये किंतु अर्जुनने भूमिमें तीन बाण मारकर उस पर भीष्मका सिर टिका दिया। तब भीष्मने पानी मांगा। दुर्योधनादिक पीनेके लिये स्वर्ण-कलशमें शीतल सुगंध जल ले आये। भीष्मने वह अस्वीकार करके अर्जुनकी ओर देखा और अर्जुनने पृथ्वीमें बाण मारकर पृथ्वीके अंदर जो दिव्य जल था उसका झरना बहा दिया; भीष्म उस पानीसे तृप्त हुए। इसके बाद अर्जुनने 'मारेंगे या मरेंगे' इस प्रतिज्ञासे लड़ने आये हुए त्रिगर्तोंके सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु, तथा सत्यकर्माको युद्ध-भूमिमें परलोक दिखाया। वैसे ही प्रस्थलाधिपति सुशर्माको मारा। मयलोक, मद्रदेश आदिके सबीरोंको मारा। हाथी पर बैठकर लडनेवाले महा-पराक्रमी भगदत्तको मारा। मरते समय अभिमन्यूको जयद्रथने लाथ मारी थी, अभिमन्युको इसकी वेदना थी। इसलिये अर्जुनने सूर्यास्तके अंदर जयद्रथका सिर उड़ानेकी प्रतिज्ञा करके प्रतिज्ञाके अनुसार जयद्रथका सिर उड़ाया। भारत-युद्धमें दुर्योधन दुःशासन कर्ण आदि कई बार अर्जुनके सामनेसे भाग गये हैं। इसने अंबष्ट, श्रुतायुस् तथा अश्रुतायुस्का वध किया। अंतमें कर्णार्जुन युद्धका समय आया ही। अर्जुनने कर्णको मूर्च्छित किया। कर्णका सर्पास्त्र, बीचमें ही तोड डाला। जब युद्ध जोरों पर था, दोनों ओरसे घमासान चल रहा था तब कर्णका रथ-चक्र भूमिमें धंस गया। वह ऊपर उठाही नहीं। कर्ण जब उसे उठानेके लिये नीचे उतरा तब अर्जुनने ज्ञानेश्वरी १४