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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

उलझा था मैं अर्जुनपनसे । मुक्त हुवा हूं समरैक्यसे । अब कहना पूछना जो ऐसे । नहीं रहा कुछ ॥ ६३ ॥ अब मैं तेरे ही प्रसादसे । प्राप्त जो इस आत्मबोधसे । मोहको सब मूल रूपसे । भूल गया हूं ॥ ६४ ॥ तेरे बिना भिन्न कुछ न होनेसे संदेह भी नहीं रहा— अब करना या नहीं करना । रहता यह कैसे द्वैत-स्थान । वह न रहा तेरे बिन भिन्न । कहीं भी यहां ॥ ६५ ॥ इस विषयमें मुझमें कहीं । संदेहका नाम तक भी नहीं । त्रिशुद्धि-पूर्वक कर्म है नहीं । वह मैं हुवा आज ॥ ६६ ॥ तुझसे पाकर स्व-स्वरूप । कर्तव्य मिटा है पूर्ण रूप । अब रहा है आज्ञाके रूप । करना सारा ॥ ६७ ॥ क्यों कि जो दृश्य दृश्यको नाशता । तथा जो द्वैत द्वैतको ग्रासता । एक ही एक सर्वत्र बसता । सर्वकाल ॥ ६८ ॥ जिस संबंधसे बंधुत्व मिटता । जिसके लोभसे लोभही टूटता । मिलनेसे जो सब ही मिल जाता । अपनेमें आप ॥ ६९ ॥ वह जो गुरु-लिंग तू मेरा । एकत्वको जो पोसता है सारा । उसके लिये कहते हैं पूरा । अद्वय बोध ॥ १५७० ॥ स्वयं आप ही हो कर ब्रह्म । दूर कर कृत्याकृत्य कर्म । फिर करना जो निःसीम । सेवा जिसकी ॥ ७१ ॥ सिंधुसे गंगा मिलने गयी । मिलते ही समुद्र हो गयी । वैसे भक्तोंको सेवा हो गयी । जिस पदकी आज ॥ ७२ ॥ वह तू मेरा निरुपचार । श्रीकृष्ण सेव्य जगदीश्वर । मानता ब्रह्मत्व उपकार । ऐसा है तो ॥ ७३ ॥ हम दोनोंमें जो आड़ । था जो भेदका किवाड़ । दूर कर दिया गोड़ । सेवाके रूपमें ॥ ७४ ॥ (93) ८४९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोश

तब अब होती जो आज्ञा । सकल देवाधिदेवराज्ञा । मान करूंगा हेतु अनुज्ञा । किसी भी बातकी ॥ ७५ ॥ सुन अर्जुनके यह बोल । नाचता देव सुखसे भूल । कहता फला विश्वका फल । अर्जुन रूपसे ॥ ७६ ॥ खिला हुवा पूर्ण सुधाकर । देख अपना यह कुमार । सीमा भूलके क्षीर सागर । बढ़ता जैसे ॥ ७७ ॥ ऐसे संवादकी वेदी पर । दोनोंका भावैक्य देखकर । आया महदानंदसे भर । संजय हृदय ॥ ७८ ॥ ऐसे हृदयानंदातिशयसे । कहता संजय धृतराष्ट्रसे । बादरायणकी कृपासे कैसे । उद्धार हुए हम ॥ ७९ ॥ अजी आज आपने जो अवधारा । नहीं चर्म-चक्षुभी जो संसारा किंतु ज्ञान दृष्टिके हैं व्यवहार । जानलिये जो ॥ १५८० ॥ रथमें लगते हैं जो घोडे । उन्हें लेने हमें रख छोडे । किंतु आज हुवा खडे खडे । ज्ञानबोध ॥ ८१ ॥ तथा युद्धका जो निर्वाण । होता है अत्यंत दारुण । दोनोंकी हार होगी समान । अपनी ही ॥ ८२ ॥ व्यासकी ऐसी कृपा महान । जहां युद्धसा कष्ट दारुण । वहां ब्रह्मानंद निरावरण । देते हैं सहज ॥ ८३ ॥ संजय कहता है यहां ऐसे । राजा कुछ भी न हुवा जैसे । तटस्थ रहा पाषाण जैसे । न द्रवता चांदनीमें ॥ ८४ ॥ संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ संजयने कहा जो कृष्णार्जुनका ऐसा हुवा संवाद अद्भुत । सुना मैने बडोंसे जो खिलाता रोमरोमको ॥ ७४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५०

देख यह स्थिति राजाकी । वाणी मूक बनी संजयकी । फिर भी अनुभूति ले सुखकी । पगलायीसी ॥ ८५ ॥ भूलके हर्षावेगसे । कहता था जो राजासे । अयोग्य यह इसे । जान कर भी यह ॥ ८६ ॥ फिर कहता है कुरुनंदन । ऐसे तेरे बंधु-पुत्र अर्जुन । बोला तब सुन यह श्रीकृष्ण । कहता अति मधुर ॥ ८७ ॥ कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका वर्णन— पूर्व-पश्चिम सागर । देखनेमें भिन्न पर । संपूर्ण एक है नीर । उसी भांति ॥ ८८ ॥ श्रीकृष्ण अर्जुन हैं ऐसे । भिन्न हैं केवल तनसे । किंतु हैं संवादमें जैसे । सदा अभिन्न ॥ ८९ ॥ स्वच्छ होते हैं जो दर्पणसे । आते ही दोनों सम्मुख जैसे । देखते हैं परस्पर ऐसे । आपसमें आप ॥ १५९० ॥ वैसे श्रीकृष्णमें पांडुसुत । देखता है अपने सहित । वैसे ही अर्जुनमें अनंत । देखता अपनेको ॥ ९१ ॥ भक्तके लिये देव जो अवकाश । देखता था भक्त वही अवकाश । अब दोनोंमें एक ही अवकाश । देखता है पार्थ ॥ ९२ ॥ और कुछ भी नहीं । अपने बिन कहीं । यह मानके वहीं । रहे वे दोनों ॥ ९३ ॥ यदि द्वेत ही अब न रहा । तब प्रश्नोत्तर कहां रहा । अथवा यदि द्वैत भी रहा । कहां संवाद सुख ॥ ९४ ॥ बोलते थे ऐसा दूजापनसे । निगला द्वैतका संवाद ऐसे । वह बोलना मैंने सुना ऐसे । दोनोंका कहा ॥ ९५ ॥ स्वच्छ कर दो दर्पण । सम्मुख रखे हैं जान । उसमें देखता कौन । कहे कैसे ॥ ९६ ॥ ८५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'

अथवा दीपके सम्मुख । रखके दीप और एक । कौन किसका प्रयोजक । कहे कौन ॥ ९७ ॥ अथवा अर्कके सम्मुख अर्क । उदय हुवा मानो और एक । कौन कहें उसमें प्रकाशक । तथा प्रकाश्य कौन ॥ ९८ ॥ करनेमें इसका निश्चय । कुंठित हो जाता है निश्चय । दोनों हुए हैं इस समय । संवाद रूप ॥ ९९ ॥ मिलते दो ओघ जिस स्थान । उनको कर देनेमें भिन्न । रख दिया बीचमें लवण । क्षणमें होगा जैसे ॥ १६०० ॥ कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका लय होना— वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन । संवादते हैं मन ही मन । उसे सोचनेमें मेरा मन । हुवा है वैसे ॥ १ ॥ ऐसे संजय कहता नहीं । सात्विक भाव इतनेमें ही । ले जाते स्मृति न जाने कहीं । संजयपनकी ॥ २ ॥ रोमांचित हुवा बदन । वैसे ही संकुचित तन । स्वेद स्तंभको है कंपन । रोकता एक ॥ ३ ॥ अद्वय-आनंदके स्पर्शसे । रसमय हुई दृष्टि जैसे । प्रेमका सोता ही बना जैसे । नहीं ये अश्रु ॥ ४ ॥ न जाने उसमें क्या नहीं समाता था । अथवा गलेमें कहां क्या अटका था । किंतु सिसकीसे वाणी-मार्ग रुका था । न उमडते शब्द ॥ ५ ॥ अथवा अष्ट सात्विक भाव । बनाते थे संजयको ठाव । तब हुवा संजय चौराहा । संवाद सुखका ॥ ६ ॥ उस सुखकी ऐसी जाति । अपने आप होती शांति । आयी है फिर देह-स्मृति । संजयकी तब ॥ ७ ॥ स्थिर होकर वह आनंद । कहता है जो उपनिषद् । नहीं जानते व्यास-प्रसाद- । से सुना मैंने ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५२

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥ वह एकांतकी गोष्ठि । ब्रह्मत्वकी पडी मिठी । मैं तू पनकी जो दृष्टि । मिट गयी पूरी ॥ ९ ॥ योग जो ये संपूर्ण । आते हैं जिस स्थान । सुलभ वे वचन । किये व्यासदेवने ॥ १६१० ॥ दिखाकर अर्जुनका कारण । बता करके अपनेको भिन्न । अपने दिये बोल वचन । आप ही देव ॥ ११ ॥ वहां हैं मेरे ये श्रोत्र । सुननेमें हुए पात्र । क्या कहें यह स्वतंत्र । सामर्थ्य गुरूका ॥ १२ ॥ राजन् संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ बोलनेमें हुवा वह विस्मित । जिससे हो गया है देह विस्मृत । रत्नमें हो रत्नसे प्रकाशित । छिपता है जैसे ॥ १३ ॥ हिमालयके जो सरोवर । होते चंद्रोदयमें काश्मीर । सूर्योदयमें पिघल कर । बहते जैसे ॥ १४ ॥ वैसे होते ही शरीरका स्मरण । संजय करता संवाद धारण । यही होता देह विस्मृतिके कारण । दूसरी बार ॥ १५ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ योग-गुह्य महाश्रेष्ठ कृपासे व्यासदेवकी । सुना प्रत्यक्ष जो मैने कहा योगेश कृष्णने ॥ ७५ ॥ जो कृष्णार्जुन संवाद राजन् अद्भुत पावन । सोचके मनमें भारी हर्षता मैं पुनः पुनः ॥ ७६ ॥ स्मरके वह जो रूप हरिका अति अद्भुत । राजन् विस्मित होके मैं नचता हूं पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ ८५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

फिर खडा हो कहता नृप । श्रीहरिका देख विश्व-रूप । देख कर ऐसे बैठा कैसे चुप । किस प्रकार ॥ १६ ॥ न देख कर जो दीखता । न होकर जो है रहता । न स्मरकर भी स्मरता । उसे टालता कैसे ॥ १७ ॥ देख कर यह चमत्कार । बैठनेमें भी नहीं विस्तार । मुझ सह वह महापूर । ले जाता बहाके ॥ १८ ॥ ऐसा है श्रीकृष्णार्जुन । संवाद संगम स्थान । कर देता तिल-दान । अहंताका मैं ॥ १९ ॥ उमड असंवृत्त आनंद । अलौकिक सिसक सद्गद । करता श्रीकृष्ण कृष्ण शब्द । अपने आप ॥ १६२० ॥ धृतराष्ट्रकी जडता दर्शन— ये जो अष्ट-सात्विक भाव । न जाने कौरवका गांव । तब कल्पना हो संभव । कैसे राजाको ॥ २१ ॥ उस सुख-लाभकर अनुभव । अपनेमें लाकर स्थिर भाव । पचालिये अष्ट सात्विक-भाव । संजयने अपनेमें ॥ २२ ॥ इतनेमें है राजा कहता । युद्धमें कब क्या होता जाता । यह सब कहने निमित्त । रखा तुझे व्यासने ॥ २३ ॥ वह छोड़ कर तू यह ऐसे । बिठाया गया किस उद्देश्यसे । सब भूलकर क्या ऐसे वैसे । बोलता अप्रासंगिक ॥ २४ ॥ वनका जब प्रासादमें आता । दस दिशा सब सूना मानता । या उदयसे पिशाच जानता । रात हुई अब ॥ २५ ॥ जिसका जो गौरव न जानता । उसको विपरीत ही लगता । तभी है अप्रासंगिक कहता । इसमें क्या अचंबा ॥ २६ ॥ फिर कहता कह प्रस्तुत । लडाई चली है जो सांप्रत । उसमें किसकी हार जीत । होती यह कह तू ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५४

वैसे कहता अपना मन । सहज विचार कर क्षण । पराक्रममें है दुर्योधन । अधिक हमारा ॥ २८ ॥ यह छोड़ करभी कहां । सैन्य रहा है ड्योढ़ा जहां । विजय निश्चय है वहां । सहज प्राप्त ॥ २९ ॥ हमको अब लगता ऐसे । किंतु तेरा ज्योतिष है कैसे । कह संजय जैसे है वैसे । मुझसे तेरी बात ॥ १६३० ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥ गीताकी फलश्रुति— प्रश्न सुन यह संजय कहता । किसका क्या होगा यह न जानता । जहां आयुष्य वहां जीवन होता । जानता यह ॥ ३१ ॥ चंद्र जहां चंद्रिका । शंभु जहां अंबिका । संत्र जहां विवेका । होता ही है ॥ ३२ ॥ नृपति जहां सैनिक । सौजन्य जहां संपर्क । अग्निमें जैसे दाहक । शक्ति है होती ॥ ३३ ॥ दया जहां वहां धर्म । वहां सुखायाम । सुखमें पुरुषोत्तम । रहता वैसे ॥ ३४ ॥ वसंत जहां वहां वन । वन जहां वहां सुमन । सुमन सह है गूंजन । सदा भ्रमरोंका ॥ ३५ ॥ गुरु जहां वहां ज्ञान । ज्ञानसे आत्म-दर्शन । दर्शनमें समाधान । होता नित्य ॥ ३६ ॥ जहां भाग्य वहां विलास । विलासमें रहा उल्हास । जहां सूर्य वहां प्रकाश । होता सहज ॥ ३७ ॥ योगेश्वर जहां कृष्ण जहां पार्थ धनुर्धर । वहां मैं देखता नित्य धर्म श्री जय वैभव ॥ ७८ ॥ ८५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-नोब

वैसे सकल पुरुषार्थ । होते हैं स्वामी सह नाथ । जहां रहता है श्रीनाथ । वहां है श्री ॥ ३८ ॥ जहां अपने पति सहित । जगन्माता रहती है नित । अणिमादि सिद्धि दास्य-रत । रहती हैं वहां ॥ ३९ ॥ स-शरीर कृष्ण विजय-रूप । रहता सदा जिसके समीप । उसीके साथ जय है आप । चलेगा सदैव ॥ १६४० ॥ विजय नामसे पार्थ विख्यात । विजय स्वरूप श्रीकृष्ण नाथ । श्रिया सह विजय है निश्चित । उसी स्थान ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम- जिस देशका है वह घास । उसमें माता पिताका है वास । कल्पतरुको भी स-उल्हास । जीतेगा वह ॥ ४२ ॥ उस देशका सब पाषाण । क्यों न हो चिंतामणि संपूर्ण । उस भूमिमें है क्या कारण । न आये चैतन्य ॥ ४३ ॥ उस देशके जो नदी प्रवाह । बहें न क्यों लें अमृत अथाह । अचरण नहीं है राजन् यह । विचार कर देख ॥ ४४ ॥ जिसके सहज शब्द । बनते हैं जहां वेद । सदेह सच्चिदानंद । क्यों न कहें उन्हें ॥ ४५ ॥ अर्जुनका भाग्य- स्वर्गापवर्ग दोनों मान । पद हैं उसके आधीन । माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण । पिता जिनके साथ ॥ ४६ ॥ जिसका कहना सदा लोभ । उस लक्ष्मीका जो वल्लभ । सर्व सिद्धि सह है स्वयंभु । खडा है जहां ॥ ४७ ॥ बनता है समुद्रसे मेघ । उपयोगमें उससे चांग । वैसे पार्थको आया सुयोग । इस समय ॥ ४८ ॥ कनकत्व दीक्षाका जो गुरु । परिस लोहसे श्रेष्ठ तर । किंतु है चलाता व्यवहार । वही जगका ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५६

गुरुत्व होता है यहां निम्न । करेगा ऐसा कोई कथन । प्रकाश देता है दीप बन । अग्नि ही श्रेष्ठ ॥ १६५० ॥ परमात्मासे शक्ति ले अर्जुन । हुवा है उससे भी बलवान । उपरोक्त स्तुति गौरव सुन । तुष्ट होता देव ॥ ५१ ॥ सभी गुणोंमें पुत्रसे हीन । होना चाहता आपका मन । यह इच्छा श्रीकृष्णकी मान । हुई सफल ॥ ५२ ॥ अथवा मानो ऐसे नृप । हुवा है पार्थ कृष्णकृपा । जिस ओर वह साक्षेप । जीत है वहीं ॥ ५३ ॥ वही विजयका निश्चित स्थान । इसमें संदेह नहीं है जान । वहां जो जय नहीं मिला मान । वह जय ही नहीं ॥ ५४ ॥ इसीलिये जहां श्री श्रीकांत । वहां है तुम्हारा पांडुसुत । वहां सदा विजय समस्त । अभ्युदय सारा ॥ ५५ ॥ यदि व्यासके वचन पर । विश्वास सच्चा है नृपवर । तब मेरे शब्द मानकर । चलना ध्रुव है ॥ ५६ ॥ जहां वह श्रीवल्लभ । जहां है भक्त-कदंब । वहां सुख और लाभ । होगा कल्याणका ॥ ५७ ॥ यदि होंगे ये बोल असत्य । न कहाऊंगा व्यासका शिष्य । गर्जन कर यह अवश्य । किया हाथ ऊपर ॥ ५८ ॥ एक श्लोकमें भारतका सार— एवं भारतका सब सार । एक श्लोकमें ला भरकर । देता है संजय नृपवर । धृतराष्ट्रके हाथमें ॥ ५९ ॥ जैसे वह्नि कितना न जानकर । उसे बातिके अग्रपे रखकर । लाते सूर्यकी अनुपस्थिति पर । सहाय्यार्थ ॥ १६६० ॥ वैसे शब्द ब्रह्म अनंत । हुवा सव्वा लक्ष भारत । भारतके जो शत-सात । गीता सर्वस्व ॥ ६१ ॥ ८५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

उन्हीं जो सात शतोंका । इत्यर्थ शेष श्लोकका । व्यास-शिष्य संजयका । पूर्णोद्गार ॥ ६२ ॥ इसी एक श्लोक पर । पूर्ण विरक्त होकर । सब इच्छाओंका सार । पायेगा निश्चित ॥ ६३ ॥ गीता महिमा वर्णन- ऐसे ये श्लोक शत-सात । गीता पद उठाते हैं नित । ये शब्द क्या परामृत । कहें आकाशका ॥ ६४ ॥ या आत्मराजाकी गीता सभा । इसे उठाते हैं ये श्लोक स्तंभ । अनुभवती ऐसी प्रतिभा । यहां मेरी ॥ ६५ ॥ अथवा यह गीता सप्तशती । जो मंत्र प्रतिपाद्य भगवती । मोह-महिषासुरसे दे मुक्ति । आनंदती है ॥ ६६ ॥ इसीलिये काया वाचा मन । करता जो इसका सेवन । उसे दे स्वानंद सिंहासन । करती सम्राट ॥ ६७ ॥ अथवा अविद्याका अंधार । जीतने सूर्यसे बाजी मार । ऐसे श्लोक गीता कहकर । प्रकट किये देवने ॥ ६८ ॥ या श्लोकाक्षर द्राक्षालता । फैल मांडव बनी गीता । संसार पथिक वे जो शांत । विश्रांति ले यहां ॥ ६९ ॥ या भाग्यवंत संत-अलि-कुल । बनाकर श्लोक-रूप कमल । श्रीकृष्ण तडागमें खिली बेल । गीता-कमलकी ॥ १६७० ॥ अथवा श्लोक नहीं ये जान । लगता गीताका महिमान । बखानते हैं बंदी जन । अखंड जैसे ॥ ७१ ॥ या श्लोकोंका किला बनाकर । सप्त-शत करके सुंदर । सर्वांगम आये गीता पुर । बसानेको यहां ॥ ७२ ॥ या निजकांता आत्मासे । मिलने आयी प्रीतिसे । बाहु पसारके ऐसे । श्लोक रूप ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५८

या गीता कमलका भृंग । या गीता सागर तरंग । या हैं श्रीहरिके तुरंग । गीता रथके ॥ ७४ ॥ या श्लोक सर्व तीर्थ समूह । मिले हैं गीता-गंगा प्रवाह । अर्जुन सिंहस्थ पर्व यह । आया है मान ॥ ७५ ॥ या नहीं यह श्लोक श्रेणी । किंतु अचिंत्य चिंतामणि । या निर्विकल्पमें लागणी । कल्पतरुकी ॥ ७६ ॥ सात शत श्लोक हैं जो ऐसे । बढे चढे हैं एक एकसे । किसका वर्णन करें कैसे । चुनाव करके ॥ ७७ ॥ दीप पहला क्या पिछला । छोटा या रवि मोटा भला । भेद गहरा या उथला । क्या अमृत सिंधुमें ॥ ७८ ॥ या बछिया और बछौना । कामधेनुमें भेद नाना । व्यर्थकी है गोष्ठी करना । न करने जैसी ॥ ७९ ॥ आदि है अथवा अंत । गीता श्लोककी है बात । जैसे पुष्प पारिजात । नया या पुराना ॥ १६८० ॥ इसमें नहीं न्यून अधिक । समान इसके सभी श्लोक । तथा न वाच्य वाचक । भेद भी इसमें ॥ ८१ ॥ इस शास्त्रमें है एक । श्रीकृष्ण वाच्य वाचक । जानते हैं सभी लोक । प्रसिद्ध यह ॥ ८२ ॥ इसका अर्थदान और पठन । फल-प्राप्तिमें एकही समान । वैसे वाच्य वाचकमें अभिन्न । भाव साधना यह ॥ ८३ ॥ इसीलिये मुझे इस समय । कहना नहीं है कोई विषय । मानो सब गीता है वाङ्मय । मूर्ति प्रभुकी ॥ ८४ ॥ शास्त्र-पठनमें अर्थ-फल । देकर जाते हैं ये सकल । ऐसे नहीं यह केवल । पर-ब्रह्मही है ॥ ८५ ॥ जगतपे करुणाकर । महानंद सुगम कर । अर्जुनको निमित्त कर । किया प्रकट ॥ ८६ ॥ ८५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

चकोरको कर निमित्त । त्रिभुवनको जो संतप्त । शांत करता कलावंत । चंद्रमा जैसे ॥ ८७ ॥ अथवा गौतमको बनाके साधन । मिटाते कलिकाल ज्वरका पीड़न । नीचे छोड़ दिया शंकरने महान । गंगा-प्रवाह ॥ ८८ ॥ वैसे गीताका यह पय । बनाके वत्स धनंजय । देती श्रीकृष्ण रूप गाय । विश्वको बहु ॥ ८९ ॥ श्रद्धासे यदि यहां डूबेंगे । आप तद्रूप बन जायेंगे । पाठसे यदि-जीभ करेंगे । गीली तो भी ॥ १६९० ॥ एक अंशसे यदि पारस । लोहको कर देता है स्पर्श । तो भी वह होता है सरस । सुवर्ण जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे पाठ रूपसे यह कटोरा । होंठोंको लगायेंगे ये श्लोक सारा । ब्रह्म-प्रेमसे होगा शरीर सारा । सतेज पुष्ट ॥ ९२ ॥ उस ओर करके यदि टेढ़ा मुख । लेंगे यदि थोड़ा श्रवण सुख । उससे भी मिलेगा वहां देख । होगी वही प्राप्ति ॥ ९३ ॥ इसका श्रवण पाठ और अर्थ । नहीं देता है मोक्षसे अन्य बात । नहीं न कहता है दाता समर्थ । किसीको जैसे ॥ ९४ ॥ पा लेनेमें यों संपूर्ण । पूर्ण है गीताका सेवन । अन्य शास्त्रोंका कारण । रहता है फिर ॥ ९५ ॥ कृष्णार्जुनकी खुली । गोष्ठी जो ऐसी निराली । व्यासने की करतल- । में आए ऐसी ॥ ९६ ॥ शिशुको ले बैठती लाड़से । माता भोजनके निमित्तसे । कौर बना देती है वह उसे । जैसे चाहता वह ॥ ९७ ॥ अथवा जो असीम पवन । करनेमें अपना आधीन । बनाते हैं पंरवासा साधन । शयाने जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे शब्दसे न हो लाभ । उसके बनाके अनुष्टुभ । सम हो स्त्री शूद्रकी प्रतिभा । कहा ऐसे ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६०

जैसे यदि स्वातीका नीर । न बनाता मोति सुंदर । तो सुंदर शरीर पर । शोभता कैसे ॥ १७०० ॥ नाद यदि वाद्यमें न आता । तब है कैसे गोचर होता । फूल यदि गंध नहीं देता । तो परिमल कैसे ॥ १ ॥ मधुर नहीं होता यदि अन्न । चखती है क्या फिर रसना । तथा दर्पण बिन नयन । नयन देखे कैसे ॥ २ ॥ दृष्टा जो श्रीगुरुमूर्ति । नहीं आते दृश्य-पंक्ति । तब कैसे हैं उपास्ति । पाते उनको ॥ ३ ॥ वैसे वस्तु जो असंख्यात । उनको संख्या शत सात । न करते वह प्रस्तुत । जान सकते कौन ॥ ४ ॥ मेघ सिंधुका पानी लेता । तो भी विश्व मेघ देखता । असीम हाथमें न आता । इसीलिये ॥ ५ ॥ तथा वाचामें जो नहीं आता । वह सुंदर श्लोक बनाता । सुखसे कान भोग सकता । ऐसे होता क्या ? ॥ ६ ॥ इसी लिये व्यासका है महान । हुवा विश्वमें उपकार मान । आकार दे श्रीकृष्ण कथन । किया ग्रंथ ॥ ७ ॥ कविकी नम्रता— और वही है जो मैं अब । व्यासके देख पद सब । लाया श्रवण पथमें शुभ । देश भाषाके ॥ ८ ॥ व्यासादिकोंके उन्मेख । होते जहां है साशंक । वहां पे मैं एक रंक । बोलता बहु ॥ ९ ॥ किंतु गीतेश्वर है भोला । ले व्यासोक्ति सुमनमाला । फिर भी मेरे दूर्वादला । ना नहीं कहता ॥ १७१० ॥ जैसे क्षीर-सिंधुके तट पर । पानी पीने आते हैं गज ढेर । किंतु रोकता क्या सिंधु घुरघुर । तू न आ कहके ॥ ११ ॥ ८६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

पंखेरू फूटा हुवा पर । न उड़ता नभमें स्थिर । गगनाक्रमी जो सत्वर । गरुडमी वहीँ ॥ १२ ॥ राजहंसका चलना । पृथ्वीपे उत्तम माना । तो क्या औरोंका चलना । मानना क्या वर्ज ॥ १३ ॥ अजी ! अपनेमें लेकर आकाश । जल भरलेता बहुत कलश । कुल्लेमें होता है अल्पसा आकाश । आता न उतना पानी ? ॥ १४ ॥ मशालका आकार विशेष । देता वह बहुत प्रकाश । बाति भी अपना-सा तेजस । देती है न ? ॥ १५ ॥ अजी ! समुद्रका विस्तार है जैसा । उसमें आकाश आभास वैसा । छोटेसे डबरेमें पड़ता वैसा । बिंब भी छोटा ॥ १६ ॥ जैसे व्यासादिककी महामती । इस ग्रंथको बखानने आती । हमने भी मानके यही युक्ति । कही अपनी भी ॥ १७ ॥ सागरमें जहां जलचर । संचरते हैं पर्वताकार । वहां जानता हूं मैं शफर । तरना जानता ॥ १८ ॥ पास ही रहकर अरुण । करता है सूर्यका दर्शन । तब भूतलकी चींटी जान । न देखता क्या सूर्य ॥ १९ ॥ इसीलिये हम हैं प्राकृत । देशी आकारमें लाते गीता । यह करना है अनुचित । कैसे भला ॥ १७२० ॥ बाप जहां आगे चलता । पुत्र ही वही अनुगमता । पुत्र वहां न पहुंचता । नहीं कोई कारण ॥ २१ ॥ वैसे व्यासका कर अनुकार । भाष्यकारोंसे राह पूछ कर । अयोग्य वहां न पहुंचकर । जाऊंगा कहां मैं ॥ २२ ॥ श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा— तथा पृथ्वी है जिसकी क्षमा । न ऊबती स्थावर जंगमा । जिसके अमृतसे चंद्रमा । देता विश्वको शांति ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६२

जिसके अंगका अंश भर । तेज लेकर ही जो भास्कर । करता है विपत्तियां दूर । अंधारकी ॥ २४ ॥ समुद्रको जिसका तोय । तोयको जिसका माधुर्य । माधुर्यमें जो है सौंदर्य । उससे ही ॥ २५ ॥ पवनको जिसका बल । जिससे आकाश विशाल । तथा ज्ञान भी उज्ज्वल । उससे सार्वभौम ॥ २६ ॥ जिससे हैं वेद सुभाष । सुख है जिससे सोल्हास । रहने दे जो है रूपस । विश्व उससेही ॥ २७ ॥ सर्वोपकारी वह समर्थ । सद्गुरु है श्रीनिवृत्तिनाथ । बैठ कर मुझमें ही स्थित । है निरंतर ॥ २८ ॥ उसी श्रीगुरुसे है गीता-ज्ञान । मिला मुझे किसी श्रम बिन । करना देशीमें वह कथन । इसमें क्या आश्चर्य ॥ २९ ॥ श्रीगुरूके नामसे मृत्तिका- । मूर्ति रख वनमें विद्याका । टेव कर डंका श्रेष्ठताका । बताया भिल्लने ॥ १७३० ॥ जो चंदनसे वेष्टित । होते चंदनसे सुगंधित । वसिष्ठकी काठी प्रकाशित । हुई सूर्यसी स्पर्धासे ॥ ३१ ॥ और मैं हूं यहां चित्त संपन्न । कृपा-दृष्टिसे होता पदासीन । ऐसा श्रीगुरु है सामर्थ्यवान । सिरपे मेरे ॥ ३२ ॥ सहज ही है जो स्वच्छ दृष्टि । उसे मिलती सूर्यकी पुष्टि । वह न देखता ऐसी गोष्टि । क्या है विश्वमें ॥ ३३ ॥ इसीलिये है मेरे नित्य-नूतन । श्वासोच्छ्वास करते काव्य कथन । गुरुकृपासे सभी संभव जान । कहता ज्ञानदेव ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें— लाया मैं इसी कारण । गीतार्थ देशीमें जान । किया है इसका जन- । दृष्टिका विषय ॥ ३५ ॥ ८६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग-

किंतु देशी बोलमें रंगकर । जान लेंगे गीता-पद मधुर । न होगा मूल न जानकर । एक पक्षीय ॥ ३६ ॥ और कहेंगे यदि मूल गा कर । बनेगा वह मूलका अलंकार । वैसे आएगा देशीमें भी सुंदर । गीतार्थ पूर्ण ॥ ३७ ॥ चार्वांगी पर न चढे भूषण । फिर भी वह शोभती जान । सुंदर तनुका बना भूषण । वह अति योग्य ॥ ३८ ॥ या मोतियोंकी ऐसी जाति । सुवर्णमें भी लाती कांति । या अपने रूपमें अति । सजते आप ॥ ३९ ॥ या मोतिया वसंतागमनका । खुला हो या गूंथा हुवा हो उसका । एकसा परिमल होता जिसका । उसी प्रकार ॥ १७४० ॥ मूल सहित भी जो है सजता । उसके बिना भी जो है शोभा लाता । रचा मैंने ऐसा लाभद गाथा । ओवी छंदमें ॥ ४१ ॥ इसमें अबाल सुबोध । ओवीके छंदमें प्रबंध । ब्रह्म-रसमें हैं सुस्वाद । गूंथे हैं अक्षर ॥ ४२ ॥ कभी चंदनका तरुवर । सुगंधके लिये फूलकर । फलने तक लगाके देर । बैठना पड़ता क्या ॥ ४३ ॥ यह प्रबंध जो सुनता । तत्क्षण समाधिमें जाता । कान व्यसन ही लगाता । व्याख्यान सुननेका ॥ ४४ ॥ तथा पाठ करनेसे नित्य । आता है पाठकमें पांडित्य । अनुभवनेसे है लालित्य । भूलेगा अमृत ॥ ४५ ॥ कवित्व हुवा ऐसे यह सरल । विश्रांति स्थान हुवा सुख-महल । श्रवण मननसे ध्यान निर्मल । जीतेगा यह ॥ ४६ ॥ स्वानंद भोग यह बढिया । देगा किसीको भी हो सदया । पोषित होंगी सभी इंद्रियां । सुनने केवल ॥ ४७ ॥ चंद्रामृत करके स्वाधीन । भोगता चकोर बुद्धिमान । किंतु पाते हैं चंद्र किरण । सभी लोग ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६४

वैसे अध्यात्म शास्त्रमें निपुण । अंतरंगके अधिकारी जान । किंतु वाक्चातुर्यसे सभी जन । पाएंगे सुख ॥ ४९ ॥ वैसे श्रीनिवृत्तिनाथका । महान गौरव है नीका । ग्रंथ नहीं यह उनका । कृपा-गौरव ॥ १७५० ॥ इस ज्ञानकी आदि परंपरा— क्षीरसागरका परिसर । माता शक्तिका कर्ण कुहर । बोला त्रिपुरारी श्रीशंकर । न जाने कब ॥ ५१ ॥ क्षीर कलोलमें रत । मकरोदरमें गुप्त । था यह उसके हाथ । आया सहज ॥ ५२ ॥ वह श्रीमत्स्येंद्र सप्त-शृंगपर । भग्न तन चौरंगीसे मिलकर । कृपासे किया उसको सशरीर । पूर्णांग पूर्ण ॥ ५३ ॥ फिर अखंड समाधि भोगना । उनको होनेसे यह वासना । दिया श्रीगोरक्षनाथको दान । वह मुद्रा ॥ ५४ ॥ उन्होंने योगाब्जिनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक्य वीर । उस पदमें वह सर्वेश्वर । किया अभिषेक ॥ ५५ ॥ फिर वह जो शांभव । अद्वयानंद वैभव । प्राप्त किया स-प्रभव । 'श्रीगहनीनाथने ॥ ५६ ॥ फिर वह कलिकाल ग्रस्त । भूतमात्रका करने हित । आज्ञा दी जो निवृत्तिनाथ । इस भांति ॥ ५७ ॥ यह जो आदि गुरु शंकर । से चला शिष्य-परंपरा । बोध लाभ आया है संसार । हम तक जो ॥ ५८ ॥ वह सब लेकर तू संपूर्ण । कलिसे ग्रस्त जीवोंका जीवन । संकटसे करने विमोचन । सहाय कर तू सत्वर ॥ ५९ ॥ पहले ही वह अति कृपालु । फिर है श्रीगुरु आज्ञाका बोल । मिला जैसे सहज वर्षाकाल । मेघोंको नित ॥ १७६० ॥ ८६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग (94)

पीडितोंकी करुणाके कारण । वर्षा हुई शांत रसकी मान । तभी है यह गीतार्थ प्रथन । हुवा उससे ॥ ६१ ॥ मैं केवल निमित्त मात्र हूं— इतनेमें मैं आर्त चातक । स्वेच्छासे हुवा गुरु सम्मुख । बना यशका कारण एक । इस प्रकार ॥ ६२ ॥ ऐसे है गुरु परंपरागत । अपना समाधि-धन जो प्राप्त । दिया रचकर यह ग्रंथ । स्वामीने मुझे ॥ ६३ ॥ वैसे मैं हूं अपढ अशिक्षित । नहीं की स्वामी-सेवा अपेक्षित । कैसे हुवा रचनामें समर्थ । ऐसे ग्रंथके ॥ ६४ ॥ किंतु है सच ही श्रीगुरुनाथ । बनाके मुझे इसका निमित्त । ग्रंथ-रूपसे करते हैं हित । विश्वका चिरंतन ॥ ६५ ॥ फिर भी मैंने पुरोहित बन । किया हो कम अधिक कथन । मातृ-भावसे आप संत जन । सहन करें मुझे ॥ ६६ ॥ कैसे करना शब्दका वचन । या चढ़ते प्रमेयोंका व्याख्यान । नहीं मुझे इसका भी ज्ञान । अलंकार क्या है ? ॥ ६७ ॥ श्रीगुरुकी मैं कठपुतली । जैसे वे चलाते वैसे चली । मुझे आगे कर स्वयं ही बोली । गुरु-माता मेरी ॥ ६८ ॥ इसलिये मैं कोई गुण-दोष । विषयमें क्षमा बिना विशेष । आचार्य-संजात ग्रंथ अशेष । कहता हूं मैं ॥ ६९ ॥ यदि इसमें कोई न्यूनता रही तो इसका दायित्व आप पर है— तथा आप संत समाजमें । यदि न्यून रहा हो इसमें । वह मिटा नहीं तो स्नेहमें । रूठेंगे आपसे ॥ १७७० ॥ होने पर भी पारसका स्पर्श । न मिटिती लोहेकी हीन दशा । तब इसका किसका है दोष । कहें आप ही ॥ ७१ ॥ नालेको यही करना । गंगा में जाके डूबना । फिर भी गंगा न बना । दोषि किसका ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६६

इसलिये मैं अति भाग्यसे । आया संतोंके पगमें ऐसे । तमी विश्वमें मुझे इससे । खामी है किसकी ॥ ७३ ॥ जीवन कृतार्थ हुवा है आज— अजी ! मेरे स्वामी नाथ । मुझे जोड दिये संत । हुवा सबमें कृतार्थ । इससे आज ॥ ७४ ॥ आपके साथ रहकर । फूटे मुझमें सुखांकुर । तथा ग्रंथका हठ पूरा । हुवा आज ॥ ७५ ॥ अजी ! अब कनकसे अखिल । ढाल सकेंगे यह भूमंडल । चिंता रत्नोंसे सप्त-कुलाचल । कर सकेंगे निर्माण ॥ ७६ ॥ अजी ! जो सागर सात । उनमें भरना अमृत । होगी तारोंसे तारानाथ । रचना सहज ॥ ७७ ॥ तथा कल्पतरुका आराम । लगाना नहीं विषम । किंतु है गीतार्थ मर्म । न होगा स्पष्ट ॥ ७८ ॥ एक मैं ऐसा सर्व-मूक । बोल करके देशी भाषा । आंखोंसे ही ले सके लोक । ऐसा करता हूं ॥ ७९ ॥ इतना बड़ा ग्रंथ सागर । उतार ले जाना पैलतीर । फड़काना यश-ध्वज फिर । वहां पहुंचनेका ॥ १७८० ॥ गीतार्थका बनाकर भवन । कलशका मेरू गिरि महान । उसमें मैं गुरुलिंग पूजन । करता हूं यह ॥ ८१ ॥ गीता है जो निष्कपट माता । उसे भूल शिशु भटकता । उसका यह मिलन होता । आपके पुण्यसे ॥ ८२ ॥ आप संतोंने जो कुछ दिया । वही सब मैं बोलता भया । यह वैसे अल्प कहा जाय । कहता ज्ञानदेव ॥ ८३ ॥ क्या बोलूं मैं अब बोल । पा लिया मैंने सब जन्म-फल । ग्रंथ-सिद्धिका यह जो निर्मल । देखा समारोह ॥ ८४ ॥ ८६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

मैंने जिस जिसकी आशा । की कर आपका भरोसा । वह पूर्ण किया बहुतसा । सुखसे आपने ॥ ८५ ॥ यह अनुपम ग्रंथरत्न है— मुझसे इस ग्रंथका महान् । बना लिया नव-सृष्टि निर्माण । देखके हंसते मन ही मन । विश्वामित्रको हम ॥ ८६ ॥ देख कर भी त्रिशंकुका दोष । विधाताको ओछा बनाके खास । बनाई सृष्टि होती है जो नाश । वैसी नहीं है यह ॥ ८७ ॥ शंभुने कर उपमन्युका लोभ । उसको दिया है क्षीराब्धिका लाभ । किंतु वह भी रहा है विषगर्भ । नहीं उपमायोग्य ॥ ८८ ॥ अंधकारका जो निशाचर । निगलता जब चराचर । तारता भी है यदि भास्कर । देकर ताप ॥ ८९ ॥ संतप्त जगतके कारण । चंद्र देता शीतल किरण । उससे भी यह न समान । चंद्र है कलंकित ॥ १७९० ॥ आप संतोंने जो मुझपर । ग्रंथ-रूप किया उपकार । मैं कहता हूं कर विचार । विश्वमें अनुपम ॥ ९१ ॥ यह जो आपके कारण । सिद्ध हुवा है धर्म-कीर्तन । यहां रहा सेवकपन । मेरा केवल ॥ ९२ ॥ सेवाका मूल्य-रूप प्रसाद-दान— मुझको दे अब विश्वात्मक देव । इस वाग्यज्ञ यज्ञसे तुष्ट हो सदैव । संतुष्ट होकर दें यह वैभव । पसाय दानका ॥ ९३ ॥ मिटे इससे खलोंकी खलता । उनमें बढे सत्कर्म-प्रियता । प्राणियोंमें परस्पर मित्रता । हो जीव भावकी ॥ ९४ ॥ मिटे दुरितका तिमिर । विश्व देखे स्वधर्म-भास्कर । जो जो चाहे सो पावे वर । प्राणिमात्र ॥ ९५ ॥ बरसत रहे सकल मंगल । बने सदा ईश-निष्ठोंके मंडल । अनवरत जीव यह सकल । पाये भूमंडलके ॥ ९६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६८