ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे यदि स्वातीका नीर । न बनाता मोति सुंदर । तो सुंदर शरीर पर । शोभता कैसे ॥ १७०० ॥ नाद यदि वाद्यमें न आता । तब है कैसे गोचर होता । फूल यदि गंध नहीं देता । तो परिमल कैसे ॥ १ ॥ मधुर नहीं होता यदि अन्न । चखती है क्या फिर रसना । तथा दर्पण बिन नयन । नयन देखे कैसे ॥ २ ॥ दृष्टा जो श्रीगुरुमूर्ति । नहीं आते दृश्य-पंक्ति । तब कैसे हैं उपास्ति । पाते उनको ॥ ३ ॥ वैसे वस्तु जो असंख्यात । उनको संख्या शत सात । न करते वह प्रस्तुत । जान सकते कौन ॥ ४ ॥ मेघ सिंधुका पानी लेता । तो भी विश्व मेघ देखता । असीम हाथमें न आता । इसीलिये ॥ ५ ॥ तथा वाचामें जो नहीं आता । वह सुंदर श्लोक बनाता । सुखसे कान भोग सकता । ऐसे होता क्या ? ॥ ६ ॥ इसी लिये व्यासका है महान । हुवा विश्वमें उपकार मान । आकार दे श्रीकृष्ण कथन । किया ग्रंथ ॥ ७ ॥ कविकी नम्रता— और वही है जो मैं अब । व्यासके देख पद सब । लाया श्रवण पथमें शुभ । देश भाषाके ॥ ८ ॥ व्यासादिकोंके उन्मेख । होते जहां है साशंक । वहां पे मैं एक रंक । बोलता बहु ॥ ९ ॥ किंतु गीतेश्वर है भोला । ले व्यासोक्ति सुमनमाला । फिर भी मेरे दूर्वादला । ना नहीं कहता ॥ १७१० ॥ जैसे क्षीर-सिंधुके तट पर । पानी पीने आते हैं गज ढेर । किंतु रोकता क्या सिंधु घुरघुर । तू न आ कहके ॥ ११ ॥ ८६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग