भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पंखेरू फूटा हुवा पर । न उड़ता नभमें स्थिर । गगनाक्रमी जो सत्वर । गरुडमी वहीँ ॥ १२ ॥ राजहंसका चलना । पृथ्वीपे उत्तम माना । तो क्या औरोंका चलना । मानना क्या वर्ज ॥ १३ ॥ अजी ! अपनेमें लेकर आकाश । जल भरलेता बहुत कलश । कुल्लेमें होता है अल्पसा आकाश । आता न उतना पानी ? ॥ १४ ॥ मशालका आकार विशेष । देता वह बहुत प्रकाश । बाति भी अपना-सा तेजस । देती है न ? ॥ १५ ॥ अजी ! समुद्रका विस्तार है जैसा । उसमें आकाश आभास वैसा । छोटेसे डबरेमें पड़ता वैसा । बिंब भी छोटा ॥ १६ ॥ जैसे व्यासादिककी महामती । इस ग्रंथको बखानने आती । हमने भी मानके यही युक्ति । कही अपनी भी ॥ १७ ॥ सागरमें जहां जलचर । संचरते हैं पर्वताकार । वहां जानता हूं मैं शफर । तरना जानता ॥ १८ ॥ पास ही रहकर अरुण । करता है सूर्यका दर्शन । तब भूतलकी चींटी जान । न देखता क्या सूर्य ॥ १९ ॥ इसीलिये हम हैं प्राकृत । देशी आकारमें लाते गीता । यह करना है अनुचित । कैसे भला ॥ १७२० ॥ बाप जहां आगे चलता । पुत्र ही वही अनुगमता । पुत्र वहां न पहुंचता । नहीं कोई कारण ॥ २१ ॥ वैसे व्यासका कर अनुकार । भाष्यकारोंसे राह पूछ कर । अयोग्य वहां न पहुंचकर । जाऊंगा कहां मैं ॥ २२ ॥ श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा— तथा पृथ्वी है जिसकी क्षमा । न ऊबती स्थावर जंगमा । जिसके अमृतसे चंद्रमा । देता विश्वको शांति ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६२

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