भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जिसके अंगका अंश भर । तेज लेकर ही जो भास्कर । करता है विपत्तियां दूर । अंधारकी ॥ २४ ॥ समुद्रको जिसका तोय । तोयको जिसका माधुर्य । माधुर्यमें जो है सौंदर्य । उससे ही ॥ २५ ॥ पवनको जिसका बल । जिससे आकाश विशाल । तथा ज्ञान भी उज्ज्वल । उससे सार्वभौम ॥ २६ ॥ जिससे हैं वेद सुभाष । सुख है जिससे सोल्हास । रहने दे जो है रूपस । विश्व उससेही ॥ २७ ॥ सर्वोपकारी वह समर्थ । सद्गुरु है श्रीनिवृत्तिनाथ । बैठ कर मुझमें ही स्थित । है निरंतर ॥ २८ ॥ उसी श्रीगुरुसे है गीता-ज्ञान । मिला मुझे किसी श्रम बिन । करना देशीमें वह कथन । इसमें क्या आश्चर्य ॥ २९ ॥ श्रीगुरूके नामसे मृत्तिका- । मूर्ति रख वनमें विद्याका । टेव कर डंका श्रेष्ठताका । बताया भिल्लने ॥ १७३० ॥ जो चंदनसे वेष्टित । होते चंदनसे सुगंधित । वसिष्ठकी काठी प्रकाशित । हुई सूर्यसी स्पर्धासे ॥ ३१ ॥ और मैं हूं यहां चित्त संपन्न । कृपा-दृष्टिसे होता पदासीन । ऐसा श्रीगुरु है सामर्थ्यवान । सिरपे मेरे ॥ ३२ ॥ सहज ही है जो स्वच्छ दृष्टि । उसे मिलती सूर्यकी पुष्टि । वह न देखता ऐसी गोष्टि । क्या है विश्वमें ॥ ३३ ॥ इसीलिये है मेरे नित्य-नूतन । श्वासोच्छ्वास करते काव्य कथन । गुरुकृपासे सभी संभव जान । कहता ज्ञानदेव ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें— लाया मैं इसी कारण । गीतार्थ देशीमें जान । किया है इसका जन- । दृष्टिका विषय ॥ ३५ ॥ ८६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग-