ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु देशी बोलमें रंगकर । जान लेंगे गीता-पद मधुर । न होगा मूल न जानकर । एक पक्षीय ॥ ३६ ॥ और कहेंगे यदि मूल गा कर । बनेगा वह मूलका अलंकार । वैसे आएगा देशीमें भी सुंदर । गीतार्थ पूर्ण ॥ ३७ ॥ चार्वांगी पर न चढे भूषण । फिर भी वह शोभती जान । सुंदर तनुका बना भूषण । वह अति योग्य ॥ ३८ ॥ या मोतियोंकी ऐसी जाति । सुवर्णमें भी लाती कांति । या अपने रूपमें अति । सजते आप ॥ ३९ ॥ या मोतिया वसंतागमनका । खुला हो या गूंथा हुवा हो उसका । एकसा परिमल होता जिसका । उसी प्रकार ॥ १७४० ॥ मूल सहित भी जो है सजता । उसके बिना भी जो है शोभा लाता । रचा मैंने ऐसा लाभद गाथा । ओवी छंदमें ॥ ४१ ॥ इसमें अबाल सुबोध । ओवीके छंदमें प्रबंध । ब्रह्म-रसमें हैं सुस्वाद । गूंथे हैं अक्षर ॥ ४२ ॥ कभी चंदनका तरुवर । सुगंधके लिये फूलकर । फलने तक लगाके देर । बैठना पड़ता क्या ॥ ४३ ॥ यह प्रबंध जो सुनता । तत्क्षण समाधिमें जाता । कान व्यसन ही लगाता । व्याख्यान सुननेका ॥ ४४ ॥ तथा पाठ करनेसे नित्य । आता है पाठकमें पांडित्य । अनुभवनेसे है लालित्य । भूलेगा अमृत ॥ ४५ ॥ कवित्व हुवा ऐसे यह सरल । विश्रांति स्थान हुवा सुख-महल । श्रवण मननसे ध्यान निर्मल । जीतेगा यह ॥ ४६ ॥ स्वानंद भोग यह बढिया । देगा किसीको भी हो सदया । पोषित होंगी सभी इंद्रियां । सुनने केवल ॥ ४७ ॥ चंद्रामृत करके स्वाधीन । भोगता चकोर बुद्धिमान । किंतु पाते हैं चंद्र किरण । सभी लोग ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६४