भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे अध्यात्म शास्त्रमें निपुण । अंतरंगके अधिकारी जान । किंतु वाक्चातुर्यसे सभी जन । पाएंगे सुख ॥ ४९ ॥ वैसे श्रीनिवृत्तिनाथका । महान गौरव है नीका । ग्रंथ नहीं यह उनका । कृपा-गौरव ॥ १७५० ॥ इस ज्ञानकी आदि परंपरा— क्षीरसागरका परिसर । माता शक्तिका कर्ण कुहर । बोला त्रिपुरारी श्रीशंकर । न जाने कब ॥ ५१ ॥ क्षीर कलोलमें रत । मकरोदरमें गुप्त । था यह उसके हाथ । आया सहज ॥ ५२ ॥ वह श्रीमत्स्येंद्र सप्त-शृंगपर । भग्न तन चौरंगीसे मिलकर । कृपासे किया उसको सशरीर । पूर्णांग पूर्ण ॥ ५३ ॥ फिर अखंड समाधि भोगना । उनको होनेसे यह वासना । दिया श्रीगोरक्षनाथको दान । वह मुद्रा ॥ ५४ ॥ उन्होंने योगाब्जिनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक्य वीर । उस पदमें वह सर्वेश्वर । किया अभिषेक ॥ ५५ ॥ फिर वह जो शांभव । अद्वयानंद वैभव । प्राप्त किया स-प्रभव । 'श्रीगहनीनाथने ॥ ५६ ॥ फिर वह कलिकाल ग्रस्त । भूतमात्रका करने हित । आज्ञा दी जो निवृत्तिनाथ । इस भांति ॥ ५७ ॥ यह जो आदि गुरु शंकर । से चला शिष्य-परंपरा । बोध लाभ आया है संसार । हम तक जो ॥ ५८ ॥ वह सब लेकर तू संपूर्ण । कलिसे ग्रस्त जीवोंका जीवन । संकटसे करने विमोचन । सहाय कर तू सत्वर ॥ ५९ ॥ पहले ही वह अति कृपालु । फिर है श्रीगुरु आज्ञाका बोल । मिला जैसे सहज वर्षाकाल । मेघोंको नित ॥ १७६० ॥ ८६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग (94)