ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीडितोंकी करुणाके कारण । वर्षा हुई शांत रसकी मान । तभी है यह गीतार्थ प्रथन । हुवा उससे ॥ ६१ ॥ मैं केवल निमित्त मात्र हूं— इतनेमें मैं आर्त चातक । स्वेच्छासे हुवा गुरु सम्मुख । बना यशका कारण एक । इस प्रकार ॥ ६२ ॥ ऐसे है गुरु परंपरागत । अपना समाधि-धन जो प्राप्त । दिया रचकर यह ग्रंथ । स्वामीने मुझे ॥ ६३ ॥ वैसे मैं हूं अपढ अशिक्षित । नहीं की स्वामी-सेवा अपेक्षित । कैसे हुवा रचनामें समर्थ । ऐसे ग्रंथके ॥ ६४ ॥ किंतु है सच ही श्रीगुरुनाथ । बनाके मुझे इसका निमित्त । ग्रंथ-रूपसे करते हैं हित । विश्वका चिरंतन ॥ ६५ ॥ फिर भी मैंने पुरोहित बन । किया हो कम अधिक कथन । मातृ-भावसे आप संत जन । सहन करें मुझे ॥ ६६ ॥ कैसे करना शब्दका वचन । या चढ़ते प्रमेयोंका व्याख्यान । नहीं मुझे इसका भी ज्ञान । अलंकार क्या है ? ॥ ६७ ॥ श्रीगुरुकी मैं कठपुतली । जैसे वे चलाते वैसे चली । मुझे आगे कर स्वयं ही बोली । गुरु-माता मेरी ॥ ६८ ॥ इसलिये मैं कोई गुण-दोष । विषयमें क्षमा बिना विशेष । आचार्य-संजात ग्रंथ अशेष । कहता हूं मैं ॥ ६९ ॥ यदि इसमें कोई न्यूनता रही तो इसका दायित्व आप पर है— तथा आप संत समाजमें । यदि न्यून रहा हो इसमें । वह मिटा नहीं तो स्नेहमें । रूठेंगे आपसे ॥ १७७० ॥ होने पर भी पारसका स्पर्श । न मिटिती लोहेकी हीन दशा । तब इसका किसका है दोष । कहें आप ही ॥ ७१ ॥ नालेको यही करना । गंगा में जाके डूबना । फिर भी गंगा न बना । दोषि किसका ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६६