ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिये मैं अति भाग्यसे । आया संतोंके पगमें ऐसे । तमी विश्वमें मुझे इससे । खामी है किसकी ॥ ७३ ॥ जीवन कृतार्थ हुवा है आज— अजी ! मेरे स्वामी नाथ । मुझे जोड दिये संत । हुवा सबमें कृतार्थ । इससे आज ॥ ७४ ॥ आपके साथ रहकर । फूटे मुझमें सुखांकुर । तथा ग्रंथका हठ पूरा । हुवा आज ॥ ७५ ॥ अजी ! अब कनकसे अखिल । ढाल सकेंगे यह भूमंडल । चिंता रत्नोंसे सप्त-कुलाचल । कर सकेंगे निर्माण ॥ ७६ ॥ अजी ! जो सागर सात । उनमें भरना अमृत । होगी तारोंसे तारानाथ । रचना सहज ॥ ७७ ॥ तथा कल्पतरुका आराम । लगाना नहीं विषम । किंतु है गीतार्थ मर्म । न होगा स्पष्ट ॥ ७८ ॥ एक मैं ऐसा सर्व-मूक । बोल करके देशी भाषा । आंखोंसे ही ले सके लोक । ऐसा करता हूं ॥ ७९ ॥ इतना बड़ा ग्रंथ सागर । उतार ले जाना पैलतीर । फड़काना यश-ध्वज फिर । वहां पहुंचनेका ॥ १७८० ॥ गीतार्थका बनाकर भवन । कलशका मेरू गिरि महान । उसमें मैं गुरुलिंग पूजन । करता हूं यह ॥ ८१ ॥ गीता है जो निष्कपट माता । उसे भूल शिशु भटकता । उसका यह मिलन होता । आपके पुण्यसे ॥ ८२ ॥ आप संतोंने जो कुछ दिया । वही सब मैं बोलता भया । यह वैसे अल्प कहा जाय । कहता ज्ञानदेव ॥ ८३ ॥ क्या बोलूं मैं अब बोल । पा लिया मैंने सब जन्म-फल । ग्रंथ-सिद्धिका यह जो निर्मल । देखा समारोह ॥ ८४ ॥ ८६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग