ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैंने जिस जिसकी आशा । की कर आपका भरोसा । वह पूर्ण किया बहुतसा । सुखसे आपने ॥ ८५ ॥ यह अनुपम ग्रंथरत्न है— मुझसे इस ग्रंथका महान् । बना लिया नव-सृष्टि निर्माण । देखके हंसते मन ही मन । विश्वामित्रको हम ॥ ८६ ॥ देख कर भी त्रिशंकुका दोष । विधाताको ओछा बनाके खास । बनाई सृष्टि होती है जो नाश । वैसी नहीं है यह ॥ ८७ ॥ शंभुने कर उपमन्युका लोभ । उसको दिया है क्षीराब्धिका लाभ । किंतु वह भी रहा है विषगर्भ । नहीं उपमायोग्य ॥ ८८ ॥ अंधकारका जो निशाचर । निगलता जब चराचर । तारता भी है यदि भास्कर । देकर ताप ॥ ८९ ॥ संतप्त जगतके कारण । चंद्र देता शीतल किरण । उससे भी यह न समान । चंद्र है कलंकित ॥ १७९० ॥ आप संतोंने जो मुझपर । ग्रंथ-रूप किया उपकार । मैं कहता हूं कर विचार । विश्वमें अनुपम ॥ ९१ ॥ यह जो आपके कारण । सिद्ध हुवा है धर्म-कीर्तन । यहां रहा सेवकपन । मेरा केवल ॥ ९२ ॥ सेवाका मूल्य-रूप प्रसाद-दान— मुझको दे अब विश्वात्मक देव । इस वाग्यज्ञ यज्ञसे तुष्ट हो सदैव । संतुष्ट होकर दें यह वैभव । पसाय दानका ॥ ९३ ॥ मिटे इससे खलोंकी खलता । उनमें बढे सत्कर्म-प्रियता । प्राणियोंमें परस्पर मित्रता । हो जीव भावकी ॥ ९४ ॥ मिटे दुरितका तिमिर । विश्व देखे स्वधर्म-भास्कर । जो जो चाहे सो पावे वर । प्राणिमात्र ॥ ९५ ॥ बरसत रहे सकल मंगल । बने सदा ईश-निष्ठोंके मंडल । अनवरत जीव यह सकल । पाये भूमंडलके ॥ ९६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६८