भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 941, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 941

कल्पतरुके हो चलते उपवन । गांव हो चैतन्य चिंतामणिके खान । सतत अमृत-सिंधु सम वचन । मिले परस्पर ॥ ९७ ॥ चंद्रमा हो यहां अलांछन । तथा मार्तंड हो ताप हीन । सदा प्रिय हो सभी सज्जन । सबसे आप्त ॥ ९८ ॥ अथवा पाये सभी सुख । पूर्ण होकर तीनो लोक । और भजे आदि पुरुष । अखंडित ॥ ९९ ॥ तथा है इस लोकमें जिसे । यह ग्रंथही जीवन उसे । पाये पूर्ण विजय इससे । दृष्ट अदृष्ट पर ॥ १८०० ॥ तब कहे श्रीगुरु महान । मिलेगा यह प्रसाद-दान । इससे सुखी मनही मन । हुवा ज्ञानदेव ॥ १ ॥

गीता श्लोक ७८ ओवी १८०१ ज्ञानेश्वरी संपूर्ण

८६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग