भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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चकोरको कर निमित्त । त्रिभुवनको जो संतप्त । शांत करता कलावंत । चंद्रमा जैसे ॥ ८७ ॥ अथवा गौतमको बनाके साधन । मिटाते कलिकाल ज्वरका पीड़न । नीचे छोड़ दिया शंकरने महान । गंगा-प्रवाह ॥ ८८ ॥ वैसे गीताका यह पय । बनाके वत्स धनंजय । देती श्रीकृष्ण रूप गाय । विश्वको बहु ॥ ८९ ॥ श्रद्धासे यदि यहां डूबेंगे । आप तद्रूप बन जायेंगे । पाठसे यदि-जीभ करेंगे । गीली तो भी ॥ १६९० ॥ एक अंशसे यदि पारस । लोहको कर देता है स्पर्श । तो भी वह होता है सरस । सुवर्ण जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे पाठ रूपसे यह कटोरा । होंठोंको लगायेंगे ये श्लोक सारा । ब्रह्म-प्रेमसे होगा शरीर सारा । सतेज पुष्ट ॥ ९२ ॥ उस ओर करके यदि टेढ़ा मुख । लेंगे यदि थोड़ा श्रवण सुख । उससे भी मिलेगा वहां देख । होगी वही प्राप्ति ॥ ९३ ॥ इसका श्रवण पाठ और अर्थ । नहीं देता है मोक्षसे अन्य बात । नहीं न कहता है दाता समर्थ । किसीको जैसे ॥ ९४ ॥ पा लेनेमें यों संपूर्ण । पूर्ण है गीताका सेवन । अन्य शास्त्रोंका कारण । रहता है फिर ॥ ९५ ॥ कृष्णार्जुनकी खुली । गोष्ठी जो ऐसी निराली । व्यासने की करतल- । में आए ऐसी ॥ ९६ ॥ शिशुको ले बैठती लाड़से । माता भोजनके निमित्तसे । कौर बना देती है वह उसे । जैसे चाहता वह ॥ ९७ ॥ अथवा जो असीम पवन । करनेमें अपना आधीन । बनाते हैं पंरवासा साधन । शयाने जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे शब्दसे न हो लाभ । उसके बनाके अनुष्टुभ । सम हो स्त्री शूद्रकी प्रतिभा । कहा ऐसे ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६०