भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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या गीता कमलका भृंग । या गीता सागर तरंग । या हैं श्रीहरिके तुरंग । गीता रथके ॥ ७४ ॥ या श्लोक सर्व तीर्थ समूह । मिले हैं गीता-गंगा प्रवाह । अर्जुन सिंहस्थ पर्व यह । आया है मान ॥ ७५ ॥ या नहीं यह श्लोक श्रेणी । किंतु अचिंत्य चिंतामणि । या निर्विकल्पमें लागणी । कल्पतरुकी ॥ ७६ ॥ सात शत श्लोक हैं जो ऐसे । बढे चढे हैं एक एकसे । किसका वर्णन करें कैसे । चुनाव करके ॥ ७७ ॥ दीप पहला क्या पिछला । छोटा या रवि मोटा भला । भेद गहरा या उथला । क्या अमृत सिंधुमें ॥ ७८ ॥ या बछिया और बछौना । कामधेनुमें भेद नाना । व्यर्थकी है गोष्ठी करना । न करने जैसी ॥ ७९ ॥ आदि है अथवा अंत । गीता श्लोककी है बात । जैसे पुष्प पारिजात । नया या पुराना ॥ १६८० ॥ इसमें नहीं न्यून अधिक । समान इसके सभी श्लोक । तथा न वाच्य वाचक । भेद भी इसमें ॥ ८१ ॥ इस शास्त्रमें है एक । श्रीकृष्ण वाच्य वाचक । जानते हैं सभी लोक । प्रसिद्ध यह ॥ ८२ ॥ इसका अर्थदान और पठन । फल-प्राप्तिमें एकही समान । वैसे वाच्य वाचकमें अभिन्न । भाव साधना यह ॥ ८३ ॥ इसीलिये मुझे इस समय । कहना नहीं है कोई विषय । मानो सब गीता है वाङ्मय । मूर्ति प्रभुकी ॥ ८४ ॥ शास्त्र-पठनमें अर्थ-फल । देकर जाते हैं ये सकल । ऐसे नहीं यह केवल । पर-ब्रह्मही है ॥ ८५ ॥ जगतपे करुणाकर । महानंद सुगम कर । अर्जुनको निमित्त कर । किया प्रकट ॥ ८६ ॥ ८५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

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