ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्हीं जो सात शतोंका । इत्यर्थ शेष श्लोकका । व्यास-शिष्य संजयका । पूर्णोद्गार ॥ ६२ ॥ इसी एक श्लोक पर । पूर्ण विरक्त होकर । सब इच्छाओंका सार । पायेगा निश्चित ॥ ६३ ॥ गीता महिमा वर्णन- ऐसे ये श्लोक शत-सात । गीता पद उठाते हैं नित । ये शब्द क्या परामृत । कहें आकाशका ॥ ६४ ॥ या आत्मराजाकी गीता सभा । इसे उठाते हैं ये श्लोक स्तंभ । अनुभवती ऐसी प्रतिभा । यहां मेरी ॥ ६५ ॥ अथवा यह गीता सप्तशती । जो मंत्र प्रतिपाद्य भगवती । मोह-महिषासुरसे दे मुक्ति । आनंदती है ॥ ६६ ॥ इसीलिये काया वाचा मन । करता जो इसका सेवन । उसे दे स्वानंद सिंहासन । करती सम्राट ॥ ६७ ॥ अथवा अविद्याका अंधार । जीतने सूर्यसे बाजी मार । ऐसे श्लोक गीता कहकर । प्रकट किये देवने ॥ ६८ ॥ या श्लोकाक्षर द्राक्षालता । फैल मांडव बनी गीता । संसार पथिक वे जो शांत । विश्रांति ले यहां ॥ ६९ ॥ या भाग्यवंत संत-अलि-कुल । बनाकर श्लोक-रूप कमल । श्रीकृष्ण तडागमें खिली बेल । गीता-कमलकी ॥ १६७० ॥ अथवा श्लोक नहीं ये जान । लगता गीताका महिमान । बखानते हैं बंदी जन । अखंड जैसे ॥ ७१ ॥ या श्लोकोंका किला बनाकर । सप्त-शत करके सुंदर । सर्वांगम आये गीता पुर । बसानेको यहां ॥ ७२ ॥ या निजकांता आत्मासे । मिलने आयी प्रीतिसे । बाहु पसारके ऐसे । श्लोक रूप ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५८