ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरुत्व होता है यहां निम्न । करेगा ऐसा कोई कथन । प्रकाश देता है दीप बन । अग्नि ही श्रेष्ठ ॥ १६५० ॥ परमात्मासे शक्ति ले अर्जुन । हुवा है उससे भी बलवान । उपरोक्त स्तुति गौरव सुन । तुष्ट होता देव ॥ ५१ ॥ सभी गुणोंमें पुत्रसे हीन । होना चाहता आपका मन । यह इच्छा श्रीकृष्णकी मान । हुई सफल ॥ ५२ ॥ अथवा मानो ऐसे नृप । हुवा है पार्थ कृष्णकृपा । जिस ओर वह साक्षेप । जीत है वहीं ॥ ५३ ॥ वही विजयका निश्चित स्थान । इसमें संदेह नहीं है जान । वहां जो जय नहीं मिला मान । वह जय ही नहीं ॥ ५४ ॥ इसीलिये जहां श्री श्रीकांत । वहां है तुम्हारा पांडुसुत । वहां सदा विजय समस्त । अभ्युदय सारा ॥ ५५ ॥ यदि व्यासके वचन पर । विश्वास सच्चा है नृपवर । तब मेरे शब्द मानकर । चलना ध्रुव है ॥ ५६ ॥ जहां वह श्रीवल्लभ । जहां है भक्त-कदंब । वहां सुख और लाभ । होगा कल्याणका ॥ ५७ ॥ यदि होंगे ये बोल असत्य । न कहाऊंगा व्यासका शिष्य । गर्जन कर यह अवश्य । किया हाथ ऊपर ॥ ५८ ॥ एक श्लोकमें भारतका सार— एवं भारतका सब सार । एक श्लोकमें ला भरकर । देता है संजय नृपवर । धृतराष्ट्रके हाथमें ॥ ५९ ॥ जैसे वह्नि कितना न जानकर । उसे बातिके अग्रपे रखकर । लाते सूर्यकी अनुपस्थिति पर । सहाय्यार्थ ॥ १६६० ॥ वैसे शब्द ब्रह्म अनंत । हुवा सव्वा लक्ष भारत । भारतके जो शत-सात । गीता सर्वस्व ॥ ६१ ॥ ८५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग