ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबनाया गया नाना विध पक्वान्न । उसमें मिलाया कालकूट मान । अथवा छल भरी मैत्री अर्जुन । रहती है जैसे ॥ ३ ॥ वैसे तप भक्ति मेधा । उसकी जान प्रबुद्धा । करता जो मेरी निंदा । तथा मद्भक्तोंकी ॥ ४ ॥ इसी कारण तू पांडुकुमार । भक्त तपी मेधावी होनेपर । गीता उसको त्याज्य मान कर । न कह तू बाबा ॥ ५ ॥ क्या कहूं यदि वह निंदक । योग्य है सृष्टिकर्ता सरीखा । गीता-ग्रंथ यह सकौतुक । न दे उसको ॥ ६ ॥ तभी है तपका धनुर्धर । पत्थरका बाडा बना कर । रचा गुरु-भक्तिका सुंदर । प्रासाद जिसने ॥ ७ ॥ वैसे ही श्रवणेच्छा द्वार । खुला रखना चारों प्रहर । फिर रचा कलश सुंदर । अनिंदा रत्नका ॥ ८ ॥ य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥ मेरे भक्तोंसे जो यह गीता कहेगा वह मद्रूप होगा— देख ऐसा भक्तालय सुंदर । प्रतिष्ठा कर वहां गीतेश्वर । तुलेगा तू मेरे समान फिर । इस विश्वमें निश्चित ॥ ९ ॥ क्यों कि जो एकाक्षरपनमें । तीन मात्राओंके उदरमें । फंसाथा वहां गर्भ-वासमें । यह प्रणव ॥ १५१० ॥ यह वेद-बीज जो ओंकार । गीता विस्तारसे फैलकर । या गायत्री फल-फूलकर । आयी है श्लोकोंमें ॥ ११ ॥ यह जो मंत्र-रहस्य गीता । मेरे भक्तोंसे जो है कहता । अनन्य शिशुको जैसे माता । देती है जीव ॥ १२ ॥ कहेगा गूढ जो श्रेष्ठ मेरे भक्त-गणों सह । उसी परम भक्ती से मिलेगा मुझमें वह ॥ ६८ ॥ ८४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-गोम