भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 914

ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान । करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥ उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल । गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥ सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार । व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥ दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको । वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥ हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं । उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥ रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण । उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥ इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति । किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥ जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति । इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥ जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता । उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥ तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात । उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥ वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान । किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥ अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण । किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥ सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर । किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४२