ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतूने बहुत पुण्य किया । उससे आज धनंजया । सुननेमें सुपात्र भया । गीता-तत्व ॥ १४८० ॥ इस शास्त्रके धनुर्धर । संप्रदायको ओढ़कर । आचर तू शास्त्रानुसार । भली भांति ॥ ८१ ॥ नहीं तो अमृत-मंथन । वैसे होगा जान अर्जुन । यदि होगा अनुष्ठान । संप्रदाय छोड़ ॥ ८२ ॥ गाय मिली है भली भाग्यसे । किंतु दुहना आता है उसे । नहीं तो दूध मिलेगा कैसे । मिलकर भी व्यर्थ ॥ ८३ ॥ वैसे गुरु होकर प्रसन्न । शिष्यको देता है विद्या-दान । संप्रदाय-युक्त अनुष्ठान । करनेसे फलती है ॥ ८४ ॥ इसीलिये यहां धनंजय । गीता शास्त्रका जो संप्रदाय । कहता सुन इस समय । आदरसे तू ॥ ८५ ॥ इदं ते नातपस्याय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ यह इससे नहीं कहना चाहिये— तुझे मिला यह जो पार्था । इसमें रखनेसे आस्था । तपोहीनको जो सर्वथा । कहना नहीं ॥ ८६ ॥ या तापस भी हुवा अर्जुन । किंतु है गुरु-भक्तिसे हीन । उनको वैसे ही दूर मान । जैसे अंत्यजको वेद ॥ ८७ ॥ अथवा पुरोडासु जैसा । मृगको नहीं देते वैसा । न दो गीता वैसे तापसा । गुरु-भक्तिहीन ॥ ८८ ॥ तथा तनसे जो है तपता । गुरु-देवको भी है भजता । किंतु जो सुनना न चाहता । उसको न कहना ॥ ८९ ॥ न है जिसे तपोभक्ति उसे न कह तू यह । ईर्षा जो करता मेरी न चाहता सुने इसे ॥ ६७ ॥ ८४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग