भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे भक्तोंको जो गीतासे । परिचय कराता ऐसे । देह-पातपे है मुझसे । मिलता वह ॥ १३ ॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ उसे मैं अपना हृदय-सिंहासन देता हूं— अथवा ले शरीरका भूषण । लेकर रहता है भिन्न जान । तब भी मेरा यह जीव प्राण । जान तू पार्थ ॥ १४ ॥ ज्ञानी कर्मठ तापस । जो है ये मेरे मानस । इनमें वह विशेष । प्रिय है मेरा ॥ १५ ॥ भूतल पर ऐसे संपूर्ण । अन्य कोई नहीं है अर्जुन । गीता कहता जो भक्त-जन- । मेलेमें मेरे ॥ १६ ॥ धरके मुझ ईश्वरका लोभ । गीता कहता है जो हो अक्षय । वह भूषण होता है सुलभ । संत-समाजका ॥ १७ ॥ नव-पल्लवोंसा रोमांचित । तथा मंदानिलसा कंपित । आमोद-जलसा हो द्रवित । पुष्य-नयन जैसे ॥ १८ ॥ कोकिल कल-रव वत । सगद्गद करके बात । मद्भक्तोग्रानमें वसंत । करता प्रवेश ॥ १९ ॥ सफल जन्म माने जैसे चकोर । वैसे उदित होता शशि अंबर । या नव-मेघ आते सुन पुकार । मयूरके जैसे ॥ १५२० ॥ वैसे सज्जनोंके मेलेमें जाकर । गीता पद रत्नोंका बरखा कर । मेरे स्वरूप प्राप्तिकी हेतु भर । रख अपनेमें ॥ २१ ॥ तब उससे मेरा कोई प्रिय । नहीं दीखता मुझे धनंजय । मेरे भक्तोंके सारे समुदाय । मध्यमें और ॥ २२ ॥ कोई मेरा नहीं पार्थ उससे बढके प्रिय । वैसे ही न कभी होगा जगमें उससे प्रिय ॥ ६९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४४