ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 917, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्या कहूं मैं तुझे अब अर्जुन । संतोंको देता जो गीता भोजन । देता हूं मैं उसको सिंहासन । मेरे अंतःकरणका ॥ २३ ॥ अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥ मेरा तेरा यह जो मिलन । जिससे बढ़ा यह कथन । खिला मोक्ष-धर्मका जीवन । जिस स्थानपे ॥ २४ ॥ यह जो सकालार्थ प्रद । हम दोनोंका है संवाद । नहीं करके पद-भेद । करना आवर्तन ॥ २५ ॥ उस ज्ञानाग्निमें जो है प्रदीप्त । मूल अविद्या-आहुति दे पार्थ । किया है मुझको संतोषित । परमात्मा मैं ॥ २६ ॥ करने गीतार्थ विवेचन । ज्ञानियोंमें जो है बुद्धिमान । प्राप्त होते हैं कर पठन । ब्रह्म-रूप यह ॥ २७ ॥ गीता पाठकको भी ऐसे । फल अर्थज्ञको है जैसे । गीता-मातामें भेद ऐसे । न है छोटे बडेका ॥ २८ ॥ श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ तथा सभी मार्गमें निंदा । छोड़कर आस्था में शुद्ध । गीता श्रवणमें ही श्रद्धा । रखता है जो ॥ २९ ॥ करेंगे जब उनके कान । गीताके अक्षरोंका श्रवण । करेंगे दुरित पलायन । उसी समय ॥ १५३० ॥ वनमें होते ही अग्निका प्रवेश । वहां करते जो पशु-पक्षी वास । छोड दौड़ते हैं दिशाएं दस । मिलती जहां राह ॥ ३१ ॥ यह जो धर्म-संवाद अभ्यासेंगे जहां कहीं । मानता पूजते हैं वे मुझको ज्ञान-यज्ञसे ॥ ७० ॥ सुनेगा यह जो कोई श्रद्धासे द्वेष छोडके । पायेगा कर्म-पूतोंकी मुक्त हो वह सद्गती ॥ ७१ ॥ ८४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग