भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 919, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 919

अथवा वह बीचमें । गिरा फैला है व्यर्थमें । या वैसे ही उपेक्षामें । दिया छोड़ ॥ ४२ ॥ या मैंने जैसे कथन किया । हृदयमें वैसे रोपन भया । मुझसे कह तू धनंजया । पूछता हूं मैं ॥ ४३ ॥ था जो स्व-अज्ञान जनित । मोहमें हो चित्त भ्रमित । कर्माकर्म-मोहकी बात । रही क्या अब ॥ ४४ ॥ यह सब भला मैं क्यों पूछता । यह मैं करता या न करता । यह अपने हाथमें मानता । क्या तू अब भी ॥ ४५ ॥ स्वानंदैक्य इसमें पार्थ । गलेगा मान कर द्वैत । भावमें लाता लक्ष्मीनाथ । प्रश्न करके ॥ ४६ ॥

अर्जुनका समरसैक्यसे द्वैतमें अवतरण— पूर्ण-ब्रह्म हुवा है पार्थ । अगला कार्य साधनार्थ । नहीं होने देता श्रीकांत । मर्यादा भंग ॥ ४७ ॥ स्वयं वैसे जो करता । सर्वज्ञ क्या नहीं जानता । किंतु श्रीकृष्ण है पूछता । सकारण ही ॥ ४८ ॥ ऐसे करके वह प्रश्न । लुप्त-प्राय अर्जुनपन । पूर्णत्वसे लाके कथन । कराता है अब ॥ ४९ ॥ जैसे क्षीराब्धि तटपर । नभमें बैठा रश्मिकर । अभिन्न हो भिन्न होकर । दीखता पूर्णचंद्र ॥ १५५० ॥ वैसे ब्रह्म मैं यह भूलता । ब्रह्मसे विश्व ही भरता । यह भी भूल सहज होता । स्वयं ब्रह्मत्व ॥ ५१ ॥ भूलता स्मरता ऐसे ब्रह्मत्व । देह दुख सीमापे मान तत्व । अर्जुन मैं ऐसा नाम-रूपत्व । लेके खडा रहा ॥ ५२ ॥ फिर वह कंपित करतल । दबाकर कुछ रोमांच-मूल । अपने आपमें ही स्वेद जल । पचा करके ॥ ५३ ॥

८४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग