ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राण-क्षोभसे डुलता हुवा । अंग अंगसे संभाला हुवा । हल चल सब भूल हुवा । खडा सूना स्तंभसा ॥ ५४ ॥ नेत्र-युगलसे बहते । आनंदामृतसे झरते । आंसुओंको जो संभालते । अति कष्टसे ॥ ५५ ॥ विविध औत्सुक्यका भार । भरा था गलेमें आकर । उसको कुछ दबाकर । हृदयमें तब ॥ ५६ ॥ वाचाका द्रवना । प्राण संभालना । अक्रम श्वासन । सुचारुकर ॥ ५७ ॥ अर्जुन उवाच नष्टो मोहःस्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥ तेरा दर्शन सब कुछ देता है— अर्जुन कहता यह क्या देव । पूछता क्या रहा अब भी मोह । गया वह स-कुटुंब छोड ठाव । लेकर सब साथ ॥ ५८ ॥ पास आकरके दिनकर । पूछता आ आंखोंसे अंधार । दीखता क्या कहो किसी ओर । दीखेगा क्या वह ॥ ५९ ॥ ऐसा है तू श्रीकृष्ण । हमें देता दर्शन । क्या न देगा दर्शन । यही हमको ॥ १५६० ॥ फिर प्रेमसे माताके समान । कहता है बोध पूर्ण वचन । किसी उपायसे न होता ज्ञान । उस विषयमें ॥ ६१ ॥ और पूछता मोह है या नहीं । ऐसा यह पूछना रहा कहीं । कृतकृत्य हुवा मैं मुझमें ही । तेरे ही रूपसे ॥ ६२ ॥ अर्जुनने कहा मिटा है मोह तो देव कृपासे बोध भी हुवा । हुवा निःशंक मैं आज करूंगा जो कहा मुझे ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४८