ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 908, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्त और भगवानका सामरस्य— नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको । वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥ ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक । देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥ हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक । द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥ दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया । द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥ तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर । बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥ सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता । उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥ वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन । किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥ गीता वेदका भी मूल-सूत्र है— ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र । श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥ वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता । तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥ अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास । सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥ इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित । अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥ स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता । उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६