भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यह है वह आत्मज्ञान । मेरा गुह्यसे गुह्य धन । तुझसे कैसे मैं वंचन । करूं सखासे ॥ २६ ॥ इस कारणसे है अर्जुन । दिया अपना गुप्त निधान । तुझसे होकर सकरुण । हमने यहां ॥ २७ ॥ ममतासे भूलकर पार्थ । माता बोलती अ-यथार्थ । तुझसे भी हम इस अर्थ । बोलते हैं सदा ॥ २८ ॥ जैसे आकाशको भी छानना । तथा अमृतको भी छीलना । अथवा दियासे कराना । दिव्य जैसे ॥ २९ ॥ जिसका शरीर है प्रकाशन । करता पातालका अणु जान । उस सूर्यकी आंखोंमें अंजन । लगाना कैसे ॥ १३३० ॥ ऐसे मैं सर्वज्ञ अर्जुन । विचारसे कर मंथन । सबसे यह भला जान । कहा तुझसे ॥ ३१ ॥ तू ही अब इस पर । कर अपना निर्धार । निर्धारके बाद फिर । कर जो योग्य ॥ ३२ ॥ यह सुनकर धनंजय । स्वस्थ हो रहा उस समय । तब कहे देव हो सदय । भला तू अवंचक ॥ ३३ ॥ भोजनमें बैठा क्षुधित । कहकर हुवा मैं तृप्त । होता आप क्षुधा पीडित । तथा मिथ्याचारी ॥ ३४ ॥ वैसे मिला सर्वज्ञ श्रीगुरु । करानेमें जो आत्म-निर्धार । नहीं पूछता मान आभार । मनमें उसके ॥ ३५ ॥ तब तो अपनेको ही फंसाता । तथा अपनी ही वंचना करता और अपने आप है दूर जाता । सत्य-स्वरूपसे ॥ ३६ ॥ तेरे मौनमें जो है अर्जुन । भेद जानता है मेरा मन । सुनना है फिर वह ज्ञान । अल्पमें एक बार ॥ ३७ ॥ कहता तब वह धनुर्धर । जानता देव तू मेरा अंतर । ऐसे कौन है जानेगा दूसरा । मेरा हृदय ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२८