ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 901, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह ज्ञेय जो यहां संपूर्ण । इसका ज्ञाता तू एक जान । सूर्य ऐसे सबका वर्णन । करना क्या फिर ॥ ३९ ॥ सुनके यह श्रीकृष्ण । बोलता है तू अर्जुन । है क्या हमारा वर्णन । यह अल्प ॥ १३४० ॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ अनन्य भक्तसे कहा गया हृदयका गूढ— एकाग्र कर संपूर्ण ध्यान । फिरसे यह बात तू सुन । मेरा वचन यह अर्जुन । जो अति निर्मल ॥ ४१ ॥ वाच्य है इसीलिये बोलना । या श्रव्य है इसीलिये सुनना । ऐसे नहीं तो तेरा अर्जुना । भला है भाग्य ॥ ४२ ॥ नहीं होती है कभी दृष्टि प्रेमार्द्र । पिल्लोंको कूर्माकी दृष्टि है प्रेमार्द्र । वैसे ही होता आकाश भी प्रेमार्द्र । चातकके लिये ॥ ४३ ॥ जहां जो व्यवहार नहीं होता । उसका फल भी तब मिलता । जब दैव अनुकूल हो जाता । उस समय ॥ ४४ ॥ वैसे जो द्वैतका आना जाना । रोकके ऐक्य-घरमें जाना । तथा वहांका सुख भोगना । जो है रहस्य ॥ ४५ ॥ तथा जो निरुपचार प्रेम । विषय होता है प्रियोत्तम । दूसरा नहीं होकर आत्म । जानना यह ॥ ४६ ॥ देखनेके लिये दर्पण । पोंछना स्वच्छ जो अर्जुन । अपने लिये होता जान । उसके लिये नहीं ॥ ४७ ॥ तेरे लिये अब मैं पार्थ । बोलता अपने ही साथ । मैं तू यह भेद यथार्थ । नहीं हममें ॥ ४८ ॥ गूढ जो सब गूढोंका फिरसे वाक्य उत्तम । हितार्थ कहता तेरे होगा तू सुन मप्रिय ॥ ६४ ॥ ८२९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग