भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसीलिये यह हृदयका गुह्य । कहता मैं जीवसे ही धनंजय । अनन्यगति भक्तसे कैसे सह्य । रखना यह गूढ ॥ ४९ ॥ जलको सर्वस्व देता अपना । नून नहीं रहता तब भिन्न । तथा देनेमें सर्वस्व अं न । लजाता भी नहीं ॥ १३५० ॥ वैसे तू मुझमें अपना । न रखता द्वैत अर्जुन । तब तुझसे है छिपाना । रहा क्या गूढ ॥ ५१ ॥ इसीलिये गूढ जो संपूर्ण । खुलता है जिससे अर्जुन । यह शुद्ध गोप्य जो वचन । सुन तू अब ॥ ५२ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥ तब तू बाह्य और अंतर । अपने अन्य सभी व्यापार । मुझ व्यापकके धनुर्धर । कर विषय ॥ ५३ ॥ सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे मुझमें लीन हो— अथवा सर्वांगसे जैसे । वायु मिला है आकाशसे । सब कर्ममें तू भी वैसे । मुझसे मिल ॥ ५४ ॥ मानो तू अपना मन । कर मेरा ही सदन । मेरे श्रवणसे कान । भरे निरंतर ॥ ५५ ॥ आत्म-ज्ञानमें शुद्ध सिद्ध । रहते जो संत प्रसिद्ध । वहां हो तेरी दृष्टि बद्ध । कामुकोंकी सी ॥ ५६ ॥ सब विश्वका मैं वसतिस्थान । उस मेरे नाम जो अर्जुन । उसको अंतःकरणमें स्थान । दे तू वाचासे ॥ ५७ ॥ हाथोंका जो है करना । तथा पैरोंका चलना । यह ही मेरे कारण । ऐसे कर तू ॥ ५८ ॥ प्रेमसे करके ध्यान भज तू पूज तू मुझे । होगा तू मुझमें लीन प्रिय जो जान सत्य है ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३०