ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 903, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय । कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥ एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना । विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥ तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार । इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥ तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर । मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥ तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें । भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥ तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना । फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥ जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब । होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥ पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर । मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥ वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म । फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥ इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें । अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥ जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना । प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥ वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच । उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥ यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप । तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥ ८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग