ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय । कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥ एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना । विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥ तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार । इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥ तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर । मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥ तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें । भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥ तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना । फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥ जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब । होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥ पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर । मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥ वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म । फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥ इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें । अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥ जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना । प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥ वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच । उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥ यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप । तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥ ८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
किंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन । तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥ राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ । वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥ इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत । तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥ इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता । इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥ जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश । किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥ पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर । किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥ इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय । विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥ देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन । इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥ सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता । उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥ सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे । अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥ इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे । साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥ कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण । मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥ मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध । तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३२
ऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब । करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥ अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण । मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥ इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध । देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥ इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता । विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥ तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान । जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥ शरणागतिका विवेचन— आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता । वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥ वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक । तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥ करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार । या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥ अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला । व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥ अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे । अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥ सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर । जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥ (92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय
वैसे धर्माधर्म जो सकल । दिखाता है अज्ञान है मूल । तजके वह त्यागो सकल । धर्मजात ॥ ९५ ॥ मिट जाता जब अज्ञान । सहज रहता मैं ही जान । जानेसे जैसे स-नींद स्वप्न । रहता है आप ॥ ९६ ॥ वैसे मैं एकके बिन नहीं । भिन्नाभिन्न कुछ भी कहीं । सोऽहं-बोधसे हो उसमें ही । अनन्य सदैव ॥ ९७ ॥ किंतु है उनसे भेद बिन । मेरा ही जानना एकपन । उसका ही नाम है शरण । आना मेरी ॥ ९८ ॥ जैसे घटका होनेसे नाश । गगनमें गगन प्रवेश । इस भांति होता समरस । आनेसे शरण ॥ ९९ ॥ स्वर्ण-मणि जैसे स्वर्णमें । या कल्लोल जैसे पानीमें । वैसे अर्जुन तू मुझमें । पा ले आश्रय ॥ १४०० ॥ भिन्न अस्तित्व रखकर शरणागतिका विवेचन— अथवा समुद्रके उदरमें जैसे । वडवानल आश्रय पाता है वैसे । सिंधुको वह जलाके सुखाता वैसे । तज दे वह ॥ १ ॥ मेरे ही शरणमें आना । जीवत्वसे भिन्न रहना । निर्लज्ज है ऐसे बोलना । ऐसी वह प्रज्ञा ॥ २ ॥ सहज ही करता है धनुर्धर । कोई राजा जब दासीका स्वीकार । वह दासी भी समान स्तरपर । आती है वैसे ॥ ३ ॥ अजी ! विश्वेश्वर मैं भेटता । तथा जीव बंध न छूटता । ऐसी यह अमंगल वार्ता । न सुनना कभी ॥ ४ ॥ मद्रूप हो मुझसे मिलना । भक्ति मेरी ऐसी ही करना । ऐसी भक्ति देता है जो ज्ञान । उसको कर प्राप्त ॥ ५ ॥ जिस मट्ठेसे निकाला नवनीत । फिरसे उसीमें डाला वह पार्थ । फिर कभी उसमें नहीं मिलता । उसी प्रकार ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३४
लोहेपे जंग सहज चढ़ता । किंतु उसे जब परिस छूता । सुवर्णपे कभी नहीं चढ़ता । जंग अर्जुन ॥ ७ ॥ जाने दे काष्ठोंका कर मंथन । करने पर अग्निको उत्पन्न । उसी काष्ठमें कहो अग्नि कण । समाता क्या कभी ॥ ८ ॥ अभिन्न शरणागतिसे सभी मैं हो जाता हूँ— ऐसे अद्वयत्वमें मुझ । शरण आनेसे है तुझ । धर्माधर्म जो है सहज । नहीं छूएंगे ॥ ९ ॥ कभी क्या कह तू दिनकर । देखता है क्या कहीं अंधार । जागृतिमें होगा क्या गोचर । कभी स्वप्न ॥ १४१० ॥ वैसे मुझमें होनेसे मिलन । मेरी सर्व-व्यापकतासे भिन्न । रहनेका क्या रहा कारण । कह तू मुझे ॥ ११ ॥ इसलिये उसकी नहीं । चिंता व्यर्थ करना कहीं । तेरे पाप पुण्यका मैं ही । बनूंगा सारा ॥ १२ ॥ जलमें गिरा हुवा लवण । सब ही जल होता अर्जुन । बनूंगा मैं अनन्य शरण । तुझको वैसे ॥ १३ ॥ वहां जो सभी बंधका कारण । पाप है मुझसे रहता भिन्न । मेरे बोधमें ही वह विलीन । होगा सारा ॥ १४ ॥ इतनेमें ही तू सहज । मुक्त हुवा है पार्थ आज । जान ले भली भांति मुझ । करूंगा मैं मुक्त ॥ १५ ॥ इसीलिये न रहा है अर्जुन । मनमें चिंताका कोई कारण । मुझ एकको मान तू शरण । आज ही सुमति ॥ १६ ॥ ऐसे सभी रूपसे जो सुंदर । तथा सभी दृष्टिसे जो चतुर । कहता है जो सर्व व्याप कर । रहता श्रीकृष्ण ॥ १७ ॥ फिर शाम-सुंदर स-कंकण । पसार कर स्व-बाहू दक्षिण । आलिंगन करता स्व-शरण । भक्त-राजको ॥ १८ ॥ ८३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोग
भक्त और भगवानका सामरस्य— नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको । वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥ ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक । देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥ हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक । द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥ दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया । द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥ तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर । बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥ सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता । उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥ वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन । किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥ गीता वेदका भी मूल-सूत्र है— ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र । श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥ वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता । तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥ अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास । सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥ इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित । अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥ स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता । उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६
वह कांड - त्रयात्मक । शब्दराशि जो अशेष । गीतामें है रहा सुख । बीजमें जैसे ॥ ३१ ॥ इसीलिये वेदका बीज । श्रीगीता ही है यह मुझ । लगा है वैसे भी सहज । लगता ही है ॥ ३२ ॥ जो है वेदके तीनों भाग । गीतामें उमडे हैं चांग । भूषण करनेसे सर्वांग । शोभता जैसे ॥ ३३ ॥ कर्मादिक जो उसके तीन । कांड हैं यहां किस स्थान । गीतामें है जो वे संपूर्ण । दिखाऊंगा अब ॥ ३४ ॥
गीता और वेदकी समानता—
गीताका जो पहला पर्व । शास्त्र-प्रवृत्तिका प्रस्ताव । दूजा सांख्य - शास्त्र सद्भाव । है प्रदर्शित ॥ ३५ ॥ मोक्ष-दानमें जो स्वतंत्र । ज्ञान प्रधान यह शास्त्र । इसीमें है यह सु-सूत्र । लिया हाथमें ॥ ३६ ॥ फिर हैं जो अज्ञानमें बद्ध । मोक्ष-पदमें चढ़ने सिद्ध । उन्हे साधनारंभ विशुद्ध । कहा तीसरेमें ॥ ३७ ॥ तथा जो देहाभिमानमें बद्ध । छोडकर काम्य-कर्म निषिद्ध । विहित कर्म करें अप्रमाद । कहा है यह ॥ ३८ ॥ सद्भावसे ऐसे कर्म करना । तीसरे अध्यायका है कहना । श्रीकृष्णका निर्णय जो जानना । कर्मकांड ॥ ३९ ॥ और वे ही नित्यादिक । अज्ञानंका आवश्यक । आचरनेसे मोचक । होगा ऐसे ॥ १४४० ॥ ऐसी जब अपेक्षा होती । बद्धमें मुमुक्षुता आती । तब ब्रह्मार्पणत्व कृती । करना भी सिखाया ॥ ४१ ॥ जो काया वाचा मनसे । विहित हो सब ऐसे । वह ईश्वरोद्देश्यसे । करनेको कहा । ४२ ॥
८३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध
कर्मयोगसे उपासना । ईश्वर-स्थानमें करना । श्रीहरिका यह कहना । चौथेके अंतमें ॥ ४३ ॥ वहांसे जो एकादशाध्याय । पूर्ण होने तक धनंजय । कर्मसे ईश-भजन कार्य । कहा है सारा ॥ ४४ ॥ इन आठ अध्यायोंमें है स्पष्ट । देवताकांड किया है निर्दिष्ट । शास्त्रोंमें कहे गये सभी पट । खोले हैं यहां ॥ ४५ ॥ तथा यही ईश्वर-प्रसादसे । मिलता श्रीगुरु-संप्रदायसे । सच्चा अपरिपक्व ज्ञान जिसे । प्रतीत किया जान ॥ ४६ ॥ वही अद्वेष्टावि श्लोकोंमें । तथा अमानित्वादिकमें । परिपक्व किया ज्ञानमें । बारहवाका अंत ॥ ४७ ॥ वह बारहवाका अध्याय प्रथम । तथा पंद्रहवा अध्याय अंतिम । ज्ञान-फल-पाक सिद्ध निरुपम । है निरूपण ॥ ४८ ॥ इसीलिये इन चारमें । ऊर्ध्व-मूलांत अध्यायमें । ज्ञान-कांड इस स्थानमें । कहा गया है ॥ ४९ ॥ एवं कांडत्रय निरूपण । करता है जो श्रुति-वचन । गीता पद रत्नोंके भूषण । पहनते यहां ॥ १४५० ॥ कहने पर ये कांडत्रयात्मक । श्रुति मोक्ष-फल जो है एक । प्राप्त करना है यह आवश्यक । कहा गरजकर ॥ ५१ ॥ उसीके साधन ज्ञानसे । वैर करते जो सदासे । अज्ञान वर्ग है जो उसे । कहा सोलहवेमें ॥ ५२ ॥ शास्त्रोंके यहां इसी साथीको । साथ ले जीतना है शत्रूको । ऐसा वह संदेश सबको । देता सत्रहवां ॥ ५३ ॥ इसभांति है पहलेसे । सत्रहवें तक जो ऐसे । बखाने हैं स्पष्ट-रूपसे । स आत्म-विश्वास ॥ ५४ ॥ यह अर्थ जात संपूर्ण । किया तात्पर्य अर्थ-पूर्ण । अष्टादशमें निरूपण । कलशाध्याय जो ॥ ५५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६
ऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध । सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता— मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण । कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥ यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त । उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥ पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर । प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥ अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर । पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥ गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता । गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥ ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर । डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥ अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर । सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥ करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान । सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥ पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर । अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥ इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता । पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥ बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर । वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥ ८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध
करके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ । तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥ अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल । उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥ वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण । दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥ शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल । कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥ पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र । जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥ द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद— फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन । समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥ जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण । तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥ अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन । भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥ जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन । सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥ उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल । जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥ परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें । न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥ नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार । इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४०
तूने बहुत पुण्य किया । उससे आज धनंजया । सुननेमें सुपात्र भया । गीता-तत्व ॥ १४८० ॥ इस शास्त्रके धनुर्धर । संप्रदायको ओढ़कर । आचर तू शास्त्रानुसार । भली भांति ॥ ८१ ॥ नहीं तो अमृत-मंथन । वैसे होगा जान अर्जुन । यदि होगा अनुष्ठान । संप्रदाय छोड़ ॥ ८२ ॥ गाय मिली है भली भाग्यसे । किंतु दुहना आता है उसे । नहीं तो दूध मिलेगा कैसे । मिलकर भी व्यर्थ ॥ ८३ ॥ वैसे गुरु होकर प्रसन्न । शिष्यको देता है विद्या-दान । संप्रदाय-युक्त अनुष्ठान । करनेसे फलती है ॥ ८४ ॥ इसीलिये यहां धनंजय । गीता शास्त्रका जो संप्रदाय । कहता सुन इस समय । आदरसे तू ॥ ८५ ॥ इदं ते नातपस्याय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ यह इससे नहीं कहना चाहिये— तुझे मिला यह जो पार्था । इसमें रखनेसे आस्था । तपोहीनको जो सर्वथा । कहना नहीं ॥ ८६ ॥ या तापस भी हुवा अर्जुन । किंतु है गुरु-भक्तिसे हीन । उनको वैसे ही दूर मान । जैसे अंत्यजको वेद ॥ ८७ ॥ अथवा पुरोडासु जैसा । मृगको नहीं देते वैसा । न दो गीता वैसे तापसा । गुरु-भक्तिहीन ॥ ८८ ॥ तथा तनसे जो है तपता । गुरु-देवको भी है भजता । किंतु जो सुनना न चाहता । उसको न कहना ॥ ८९ ॥ न है जिसे तपोभक्ति उसे न कह तू यह । ईर्षा जो करता मेरी न चाहता सुने इसे ॥ ६७ ॥ ८४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान । करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥ उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल । गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥ सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार । व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥ दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको । वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥ हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं । उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥ रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण । उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥ इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति । किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥ जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति । इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥ जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता । उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥ तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात । उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥ वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान । किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥ अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण । किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥ सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर । किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४२
बनाया गया नाना विध पक्वान्न । उसमें मिलाया कालकूट मान । अथवा छल भरी मैत्री अर्जुन । रहती है जैसे ॥ ३ ॥ वैसे तप भक्ति मेधा । उसकी जान प्रबुद्धा । करता जो मेरी निंदा । तथा मद्भक्तोंकी ॥ ४ ॥ इसी कारण तू पांडुकुमार । भक्त तपी मेधावी होनेपर । गीता उसको त्याज्य मान कर । न कह तू बाबा ॥ ५ ॥ क्या कहूं यदि वह निंदक । योग्य है सृष्टिकर्ता सरीखा । गीता-ग्रंथ यह सकौतुक । न दे उसको ॥ ६ ॥ तभी है तपका धनुर्धर । पत्थरका बाडा बना कर । रचा गुरु-भक्तिका सुंदर । प्रासाद जिसने ॥ ७ ॥ वैसे ही श्रवणेच्छा द्वार । खुला रखना चारों प्रहर । फिर रचा कलश सुंदर । अनिंदा रत्नका ॥ ८ ॥ य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥ मेरे भक्तोंसे जो यह गीता कहेगा वह मद्रूप होगा— देख ऐसा भक्तालय सुंदर । प्रतिष्ठा कर वहां गीतेश्वर । तुलेगा तू मेरे समान फिर । इस विश्वमें निश्चित ॥ ९ ॥ क्यों कि जो एकाक्षरपनमें । तीन मात्राओंके उदरमें । फंसाथा वहां गर्भ-वासमें । यह प्रणव ॥ १५१० ॥ यह वेद-बीज जो ओंकार । गीता विस्तारसे फैलकर । या गायत्री फल-फूलकर । आयी है श्लोकोंमें ॥ ११ ॥ यह जो मंत्र-रहस्य गीता । मेरे भक्तोंसे जो है कहता । अनन्य शिशुको जैसे माता । देती है जीव ॥ १२ ॥ कहेगा गूढ जो श्रेष्ठ मेरे भक्त-गणों सह । उसी परम भक्ती से मिलेगा मुझमें वह ॥ ६८ ॥ ८४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-गोम
अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग
वैसे भक्तोंको जो गीतासे । परिचय कराता ऐसे । देह-पातपे है मुझसे । मिलता वह ॥ १३ ॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ उसे मैं अपना हृदय-सिंहासन देता हूं— अथवा ले शरीरका भूषण । लेकर रहता है भिन्न जान । तब भी मेरा यह जीव प्राण । जान तू पार्थ ॥ १४ ॥ ज्ञानी कर्मठ तापस । जो है ये मेरे मानस । इनमें वह विशेष । प्रिय है मेरा ॥ १५ ॥ भूतल पर ऐसे संपूर्ण । अन्य कोई नहीं है अर्जुन । गीता कहता जो भक्त-जन- । मेलेमें मेरे ॥ १६ ॥ धरके मुझ ईश्वरका लोभ । गीता कहता है जो हो अक्षय । वह भूषण होता है सुलभ । संत-समाजका ॥ १७ ॥ नव-पल्लवोंसा रोमांचित । तथा मंदानिलसा कंपित । आमोद-जलसा हो द्रवित । पुष्य-नयन जैसे ॥ १८ ॥ कोकिल कल-रव वत । सगद्गद करके बात । मद्भक्तोग्रानमें वसंत । करता प्रवेश ॥ १९ ॥ सफल जन्म माने जैसे चकोर । वैसे उदित होता शशि अंबर । या नव-मेघ आते सुन पुकार । मयूरके जैसे ॥ १५२० ॥ वैसे सज्जनोंके मेलेमें जाकर । गीता पद रत्नोंका बरखा कर । मेरे स्वरूप प्राप्तिकी हेतु भर । रख अपनेमें ॥ २१ ॥ तब उससे मेरा कोई प्रिय । नहीं दीखता मुझे धनंजय । मेरे भक्तोंके सारे समुदाय । मध्यमें और ॥ २२ ॥ कोई मेरा नहीं पार्थ उससे बढके प्रिय । वैसे ही न कभी होगा जगमें उससे प्रिय ॥ ६९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४४
क्या कहूं मैं तुझे अब अर्जुन । संतोंको देता जो गीता भोजन । देता हूं मैं उसको सिंहासन । मेरे अंतःकरणका ॥ २३ ॥ अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥ मेरा तेरा यह जो मिलन । जिससे बढ़ा यह कथन । खिला मोक्ष-धर्मका जीवन । जिस स्थानपे ॥ २४ ॥ यह जो सकालार्थ प्रद । हम दोनोंका है संवाद । नहीं करके पद-भेद । करना आवर्तन ॥ २५ ॥ उस ज्ञानाग्निमें जो है प्रदीप्त । मूल अविद्या-आहुति दे पार्थ । किया है मुझको संतोषित । परमात्मा मैं ॥ २६ ॥ करने गीतार्थ विवेचन । ज्ञानियोंमें जो है बुद्धिमान । प्राप्त होते हैं कर पठन । ब्रह्म-रूप यह ॥ २७ ॥ गीता पाठकको भी ऐसे । फल अर्थज्ञको है जैसे । गीता-मातामें भेद ऐसे । न है छोटे बडेका ॥ २८ ॥ श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ तथा सभी मार्गमें निंदा । छोड़कर आस्था में शुद्ध । गीता श्रवणमें ही श्रद्धा । रखता है जो ॥ २९ ॥ करेंगे जब उनके कान । गीताके अक्षरोंका श्रवण । करेंगे दुरित पलायन । उसी समय ॥ १५३० ॥ वनमें होते ही अग्निका प्रवेश । वहां करते जो पशु-पक्षी वास । छोड दौड़ते हैं दिशाएं दस । मिलती जहां राह ॥ ३१ ॥ यह जो धर्म-संवाद अभ्यासेंगे जहां कहीं । मानता पूजते हैं वे मुझको ज्ञान-यज्ञसे ॥ ७० ॥ सुनेगा यह जो कोई श्रद्धासे द्वेष छोडके । पायेगा कर्म-पूतोंकी मुक्त हो वह सद्गती ॥ ७१ ॥ ८४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अथवा जैसे उदयाचल पर । झलकते ही रवि-किरणके हार । खो जाता है अंतरालमें तिमिर । उसी भांति ॥ ३२ ॥ वैसे ही कर्णोंके महाद्वार । सुनते हैं गीताका गजर । मिटता है सभी पाप भार । सृष्ट्यादिका भी ॥ ३३ ॥ इससे भावी जन्म सर्वत्र । होते जाते हैं अति पवित्र । इससे अन्य ऐसे हैं अत्र । भारी पुण्य ॥ ३४ ॥ तथा इस गीताके हैं अक्षर । कानोंसे जाके हृदय-गव्हर । उतने ही करते हैं जो पूर । अश्वमेध याग ॥ ३५ ॥ तभी है श्रवणसे पाप हरता । वैसे ही धर्मको उन्नत करता । इससे स्वर्गका राज्य है मिलता । अंतमें जो ॥ ३६ ॥ मेरे पास आनेमें अर्जुन । स्वर्ग है पहला ही सदन । उसको भोग फिर सज्जन । मिलते मुझमें ही ॥ ३७ ॥ इस प्रकार गीता पार्था । जो सुनता और पढ़ता । उसे ब्रह्मानंद मिलता । मेरे रूपका ॥ ३८ ॥ यह सारा रहने दे पार्थ । किस लिये तुझे कही गीता । उसका क्या हुवा है स्पष्टता । कह तू मुझे ॥ ३९ ॥ कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसः । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥ सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या— तो तू मुझसे कह अर्जुन । यह शास्त्र-सिद्धांत संपूर्ण । किया न चित्त देके श्रवण । जीवभावसे ॥ १५४० ॥ हमने यहां जैसे जिस भांति । कानोंको दी है गीताकी संपत्ति कानोंसे वह हृदयमें पूर्ति । रोपी है न ? ॥ ४१ ॥ इसे तूने सुना है न पूरा एकाग्र चित्तसे । अज्ञान रूप जो तेरा मिटा क्या मोह मूलता ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४६
अथवा वह बीचमें । गिरा फैला है व्यर्थमें । या वैसे ही उपेक्षामें । दिया छोड़ ॥ ४२ ॥ या मैंने जैसे कथन किया । हृदयमें वैसे रोपन भया । मुझसे कह तू धनंजया । पूछता हूं मैं ॥ ४३ ॥ था जो स्व-अज्ञान जनित । मोहमें हो चित्त भ्रमित । कर्माकर्म-मोहकी बात । रही क्या अब ॥ ४४ ॥ यह सब भला मैं क्यों पूछता । यह मैं करता या न करता । यह अपने हाथमें मानता । क्या तू अब भी ॥ ४५ ॥ स्वानंदैक्य इसमें पार्थ । गलेगा मान कर द्वैत । भावमें लाता लक्ष्मीनाथ । प्रश्न करके ॥ ४६ ॥
अर्जुनका समरसैक्यसे द्वैतमें अवतरण— पूर्ण-ब्रह्म हुवा है पार्थ । अगला कार्य साधनार्थ । नहीं होने देता श्रीकांत । मर्यादा भंग ॥ ४७ ॥ स्वयं वैसे जो करता । सर्वज्ञ क्या नहीं जानता । किंतु श्रीकृष्ण है पूछता । सकारण ही ॥ ४८ ॥ ऐसे करके वह प्रश्न । लुप्त-प्राय अर्जुनपन । पूर्णत्वसे लाके कथन । कराता है अब ॥ ४९ ॥ जैसे क्षीराब्धि तटपर । नभमें बैठा रश्मिकर । अभिन्न हो भिन्न होकर । दीखता पूर्णचंद्र ॥ १५५० ॥ वैसे ब्रह्म मैं यह भूलता । ब्रह्मसे विश्व ही भरता । यह भी भूल सहज होता । स्वयं ब्रह्मत्व ॥ ५१ ॥ भूलता स्मरता ऐसे ब्रह्मत्व । देह दुख सीमापे मान तत्व । अर्जुन मैं ऐसा नाम-रूपत्व । लेके खडा रहा ॥ ५२ ॥ फिर वह कंपित करतल । दबाकर कुछ रोमांच-मूल । अपने आपमें ही स्वेद जल । पचा करके ॥ ५३ ॥
८४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्राण-क्षोभसे डुलता हुवा । अंग अंगसे संभाला हुवा । हल चल सब भूल हुवा । खडा सूना स्तंभसा ॥ ५४ ॥ नेत्र-युगलसे बहते । आनंदामृतसे झरते । आंसुओंको जो संभालते । अति कष्टसे ॥ ५५ ॥ विविध औत्सुक्यका भार । भरा था गलेमें आकर । उसको कुछ दबाकर । हृदयमें तब ॥ ५६ ॥ वाचाका द्रवना । प्राण संभालना । अक्रम श्वासन । सुचारुकर ॥ ५७ ॥ अर्जुन उवाच नष्टो मोहःस्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥ तेरा दर्शन सब कुछ देता है— अर्जुन कहता यह क्या देव । पूछता क्या रहा अब भी मोह । गया वह स-कुटुंब छोड ठाव । लेकर सब साथ ॥ ५८ ॥ पास आकरके दिनकर । पूछता आ आंखोंसे अंधार । दीखता क्या कहो किसी ओर । दीखेगा क्या वह ॥ ५९ ॥ ऐसा है तू श्रीकृष्ण । हमें देता दर्शन । क्या न देगा दर्शन । यही हमको ॥ १५६० ॥ फिर प्रेमसे माताके समान । कहता है बोध पूर्ण वचन । किसी उपायसे न होता ज्ञान । उस विषयमें ॥ ६१ ॥ और पूछता मोह है या नहीं । ऐसा यह पूछना रहा कहीं । कृतकृत्य हुवा मैं मुझमें ही । तेरे ही रूपसे ॥ ६२ ॥ अर्जुनने कहा मिटा है मोह तो देव कृपासे बोध भी हुवा । हुवा निःशंक मैं आज करूंगा जो कहा मुझे ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४८
उलझा था मैं अर्जुनपनसे । मुक्त हुवा हूं समरैक्यसे । अब कहना पूछना जो ऐसे । नहीं रहा कुछ ॥ ६३ ॥ अब मैं तेरे ही प्रसादसे । प्राप्त जो इस आत्मबोधसे । मोहको सब मूल रूपसे । भूल गया हूं ॥ ६४ ॥ तेरे बिना भिन्न कुछ न होनेसे संदेह भी नहीं रहा— अब करना या नहीं करना । रहता यह कैसे द्वैत-स्थान । वह न रहा तेरे बिन भिन्न । कहीं भी यहां ॥ ६५ ॥ इस विषयमें मुझमें कहीं । संदेहका नाम तक भी नहीं । त्रिशुद्धि-पूर्वक कर्म है नहीं । वह मैं हुवा आज ॥ ६६ ॥ तुझसे पाकर स्व-स्वरूप । कर्तव्य मिटा है पूर्ण रूप । अब रहा है आज्ञाके रूप । करना सारा ॥ ६७ ॥ क्यों कि जो दृश्य दृश्यको नाशता । तथा जो द्वैत द्वैतको ग्रासता । एक ही एक सर्वत्र बसता । सर्वकाल ॥ ६८ ॥ जिस संबंधसे बंधुत्व मिटता । जिसके लोभसे लोभही टूटता । मिलनेसे जो सब ही मिल जाता । अपनेमें आप ॥ ६९ ॥ वह जो गुरु-लिंग तू मेरा । एकत्वको जो पोसता है सारा । उसके लिये कहते हैं पूरा । अद्वय बोध ॥ १५७० ॥ स्वयं आप ही हो कर ब्रह्म । दूर कर कृत्याकृत्य कर्म । फिर करना जो निःसीम । सेवा जिसकी ॥ ७१ ॥ सिंधुसे गंगा मिलने गयी । मिलते ही समुद्र हो गयी । वैसे भक्तोंको सेवा हो गयी । जिस पदकी आज ॥ ७२ ॥ वह तू मेरा निरुपचार । श्रीकृष्ण सेव्य जगदीश्वर । मानता ब्रह्मत्व उपकार । ऐसा है तो ॥ ७३ ॥ हम दोनोंमें जो आड़ । था जो भेदका किवाड़ । दूर कर दिया गोड़ । सेवाके रूपमें ॥ ७४ ॥ (93) ८४९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोश
तब अब होती जो आज्ञा । सकल देवाधिदेवराज्ञा । मान करूंगा हेतु अनुज्ञा । किसी भी बातकी ॥ ७५ ॥ सुन अर्जुनके यह बोल । नाचता देव सुखसे भूल । कहता फला विश्वका फल । अर्जुन रूपसे ॥ ७६ ॥ खिला हुवा पूर्ण सुधाकर । देख अपना यह कुमार । सीमा भूलके क्षीर सागर । बढ़ता जैसे ॥ ७७ ॥ ऐसे संवादकी वेदी पर । दोनोंका भावैक्य देखकर । आया महदानंदसे भर । संजय हृदय ॥ ७८ ॥ ऐसे हृदयानंदातिशयसे । कहता संजय धृतराष्ट्रसे । बादरायणकी कृपासे कैसे । उद्धार हुए हम ॥ ७९ ॥ अजी आज आपने जो अवधारा । नहीं चर्म-चक्षुभी जो संसारा किंतु ज्ञान दृष्टिके हैं व्यवहार । जानलिये जो ॥ १५८० ॥ रथमें लगते हैं जो घोडे । उन्हें लेने हमें रख छोडे । किंतु आज हुवा खडे खडे । ज्ञानबोध ॥ ८१ ॥ तथा युद्धका जो निर्वाण । होता है अत्यंत दारुण । दोनोंकी हार होगी समान । अपनी ही ॥ ८२ ॥ व्यासकी ऐसी कृपा महान । जहां युद्धसा कष्ट दारुण । वहां ब्रह्मानंद निरावरण । देते हैं सहज ॥ ८३ ॥ संजय कहता है यहां ऐसे । राजा कुछ भी न हुवा जैसे । तटस्थ रहा पाषाण जैसे । न द्रवता चांदनीमें ॥ ८४ ॥ संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ संजयने कहा जो कृष्णार्जुनका ऐसा हुवा संवाद अद्भुत । सुना मैने बडोंसे जो खिलाता रोमरोमको ॥ ७४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५०