ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब । करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥ अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण । मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥ इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध । देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥ इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता । विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥ तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान । जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥ शरणागतिका विवेचन— आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता । वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥ वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक । तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥ करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार । या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥ अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला । व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥ अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे । अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥ सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर । जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥ (92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय