ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन । तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥ राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ । वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥ इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत । तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥ इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता । इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥ जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश । किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥ पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर । किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥ इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय । विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥ देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन । इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥ सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता । उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥ सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे । अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥ इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे । साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥ कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण । मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥ मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध । तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३२