ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरना या न करना पार्थ । प्रकृतिके सिरपे दे नित । वह प्रकृति है आधीनस्थ । जिस हृदयस्थके ॥ १८ ॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥ ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन है— अहं वाचा तन मन । देकर जा तू शरण । जाती है गंगा अर्जुन । सागरमें जैसे ॥ १९ ॥ फिर उसके प्रसादसे । सर्वोपशांति-प्रमदासे । कांत होकर स्वानंदसे । रमेगा स्वरूपमें ॥ १३२० ॥ उत्पत्ति होती जहांसे उत्पन्न । विश्रांतिका जहां विश्रांति-स्थान । अनुभूति बोध लेती अर्जुन । अनुभवका जहां ॥ २१ ॥ उस निजात्मपदका राय । होकर रहेगा तू अव्यय । सुनता है यहां धनंजय । कहता श्रीहरि ॥ २२ ॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ गीता नामसे यह विख्यात । सभी वाङ्मयका जो मथित । जिससे होता है हस्तगत । आत्म-रत्न ॥ २३ ॥ वेदांतमें इसको ज्ञान । ऐसा नाम दिया महान । इससे सदा यशोगान । हुवा वेदांतका ॥ २४ ॥ बुद्ध्यादिक जो ज्ञानवान । इसीसे है प्रकाशमान । “मैं” सर्व द्रष्टाका दर्शन । होता है इससे ॥ २५ ॥ उसीकी ओटमें जा तू पायेगा सर्व भावसे । कृपासे उसकी श्रेष्ठ शांतिका स्थान शाश्वत ॥ ६२ ॥ ऐसा जो गूढसे गूढ कहा ज्ञान तुझे अब । सोचके यह सारा तू स्वेच्छासे योग्य जो कर ॥ ६३ ॥ ८२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग