भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तब जो तू मैं न लडूंगा। ऐसे ही निश्चय करेगा । तो भी वह व्यर्थ करेगा । स्वभाव तेरा ॥ ८५ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥ सभी स्वभावके आधीन हैं— प्राचीकी ओर जो प्रवाह बहता । उसमें उलटा ही कोई तैरता । उसका हठ अवश्य ही रहता । पानी खींचता ओघमेंही ॥ ८६ ॥ या कहेगा चावलका दाना । न उगूंगा मैं चावल बना । उसका स्वभाव बदलना । शक्य है क्या ॥ ८७ ॥ वैसे ही क्षात्र-संस्कार सिद्ध । प्रकृतिने बनाया प्रबुद्ध । कहता युद्ध मुझे निषिद्ध । करायेगा वही ॥ ८८ ॥ शौर्य तेज और दक्षता । इत्यादिक जो पांडुसुता । दिये हैं गुणोंको जन्मता । प्रकृतिने तुझे ॥ ८९ ॥ तब क्षात्र-गुणानुरूप । युद्ध करना मान पाप । युद्धसे रहना निर्लेप । तुझे असंभव ॥ १२९० ॥ क्षात्र-गुणोंसे तू अर्जुन । बंधा है स्वभावसे जान । क्षात्र-प्रवाहमें पतन । होगा ही तेरा ॥ ९१ ॥ अपना जो यह जन्म-मूल । न विचार कर तू केवल । न लडेगा इसपे अचल । व्रत लेगा ॥ ९२ ॥ जैसे बांध कर हाथ पाय । किसीको रथमें डाला जाय । न चलके भी वह निश्चय । पहुंचेगा दिगंतमें ॥ ९३ ॥ कुछ भी न करूंगा मैं ऐसे । कह कर अपनी ओरसे । रहेगा तू यदि निश्चयसे । लड़ेगा ही ॥ ९४ ॥ अपने ही स्वकर्मोंसे बंधा है तू स्वभाविक । टालना चाहता जो है करेगा तू अवश्यश ही ॥ ६० ॥ ज्ञानेश्वरी ५२४