ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा तू साभिमान । मेरा सब ये कथन । रखेगा सीमापे जान । कान मनकी ॥ ७४ ॥ यदि तू है नित्य मुक्त अव्यय । व्यर्थ होकर वह धनंजय । देहाहंकारका आघात भय । होगा तुझको ॥ ७५ ॥ जिस देह संबंधमें पार्थ । प्रति पगमें है आत्मघात । भोगनेमें होगा सदा श्रांत । शांति न मिलेगी ॥ ७६ ॥ इस बोलका तू धनुर्धर । नहीं करेगा यदि विचार । मृत्यु न होके भी भयंकर । पायेगा मृत्यु ॥ ७७ ॥ यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ पथ्य-द्वेषी पोसता है ज्वर । या दीप-द्वेषीको अंधःकार । विवेक-द्वेषसे अहंकार । पोसता वैसे ॥ ७८ ॥ स्वदेहका नाम अर्जुन । पर देहका नाम स्वजन । संग्रामका नाम मलिन । पापाचार ॥ ७९ ॥ ऐसी अपनी मति अर्जुन । तीनोंको नाम देकर तीन । मै न लडूंगा ऐसा वचन । कहती है जो ॥ १२८० ॥ मनमें ऐसा निश्चय एक । करेगा यदि तू आत्यंतिक । कार्य करेगा सो नैसर्गिक । स्वभाव तेरा ॥ ८१ ॥ तथा मैं अर्जुन ये आत्मिक । इनको मारना है पातक । यह है जान भ्रम-मूलक । है तत्वहीन ॥ ८२ ॥ पहले होता है तू लडाका । तथा फिर शस्त्र उठानेका । फिर कहता न लड़नेका । विचार अपना ॥ ८३ ॥ इसीलिये नहीं जूझना । व्यर्थ है तेरा जो कहना । लौकिक दृष्टिसे भी जान । तो भी व्यर्थे ॥ ८४ ॥ कहेगा न लडूंगा मैं वश हो अहंकारके । यह निश्चय है पार्थ करायेगा स्वभाव जो ॥ ५९ ॥ ८२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग