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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अथवा तू साभिमान । मेरा सब ये कथन । रखेगा सीमापे जान । कान मनकी ॥ ७४ ॥ यदि तू है नित्य मुक्त अव्यय । व्यर्थ होकर वह धनंजय । देहाहंकारका आघात भय । होगा तुझको ॥ ७५ ॥ जिस देह संबंधमें पार्थ । प्रति पगमें है आत्मघात । भोगनेमें होगा सदा श्रांत । शांति न मिलेगी ॥ ७६ ॥ इस बोलका तू धनुर्धर । नहीं करेगा यदि विचार । मृत्यु न होके भी भयंकर । पायेगा मृत्यु ॥ ७७ ॥ यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ पथ्य-द्वेषी पोसता है ज्वर । या दीप-द्वेषीको अंधःकार । विवेक-द्वेषसे अहंकार । पोसता वैसे ॥ ७८ ॥ स्वदेहका नाम अर्जुन । पर देहका नाम स्वजन । संग्रामका नाम मलिन । पापाचार ॥ ७९ ॥ ऐसी अपनी मति अर्जुन । तीनोंको नाम देकर तीन । मै न लडूंगा ऐसा वचन । कहती है जो ॥ १२८० ॥ मनमें ऐसा निश्चय एक । करेगा यदि तू आत्यंतिक । कार्य करेगा सो नैसर्गिक । स्वभाव तेरा ॥ ८१ ॥ तथा मैं अर्जुन ये आत्मिक । इनको मारना है पातक । यह है जान भ्रम-मूलक । है तत्वहीन ॥ ८२ ॥ पहले होता है तू लडाका । तथा फिर शस्त्र उठानेका । फिर कहता न लड़नेका । विचार अपना ॥ ८३ ॥ इसीलिये नहीं जूझना । व्यर्थ है तेरा जो कहना । लौकिक दृष्टिसे भी जान । तो भी व्यर्थे ॥ ८४ ॥ कहेगा न लडूंगा मैं वश हो अहंकारके । यह निश्चय है पार्थ करायेगा स्वभाव जो ॥ ५९ ॥ ८२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तब जो तू मैं न लडूंगा। ऐसे ही निश्चय करेगा । तो भी वह व्यर्थ करेगा । स्वभाव तेरा ॥ ८५ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥ सभी स्वभावके आधीन हैं— प्राचीकी ओर जो प्रवाह बहता । उसमें उलटा ही कोई तैरता । उसका हठ अवश्य ही रहता । पानी खींचता ओघमेंही ॥ ८६ ॥ या कहेगा चावलका दाना । न उगूंगा मैं चावल बना । उसका स्वभाव बदलना । शक्य है क्या ॥ ८७ ॥ वैसे ही क्षात्र-संस्कार सिद्ध । प्रकृतिने बनाया प्रबुद्ध । कहता युद्ध मुझे निषिद्ध । करायेगा वही ॥ ८८ ॥ शौर्य तेज और दक्षता । इत्यादिक जो पांडुसुता । दिये हैं गुणोंको जन्मता । प्रकृतिने तुझे ॥ ८९ ॥ तब क्षात्र-गुणानुरूप । युद्ध करना मान पाप । युद्धसे रहना निर्लेप । तुझे असंभव ॥ १२९० ॥ क्षात्र-गुणोंसे तू अर्जुन । बंधा है स्वभावसे जान । क्षात्र-प्रवाहमें पतन । होगा ही तेरा ॥ ९१ ॥ अपना जो यह जन्म-मूल । न विचार कर तू केवल । न लडेगा इसपे अचल । व्रत लेगा ॥ ९२ ॥ जैसे बांध कर हाथ पाय । किसीको रथमें डाला जाय । न चलके भी वह निश्चय । पहुंचेगा दिगंतमें ॥ ९३ ॥ कुछ भी न करूंगा मैं ऐसे । कह कर अपनी ओरसे । रहेगा तू यदि निश्चयसे । लड़ेगा ही ॥ ९४ ॥ अपने ही स्वकर्मोंसे बंधा है तू स्वभाविक । टालना चाहता जो है करेगा तू अवश्यश ही ॥ ६० ॥ ज्ञानेश्वरी ५२४

विराट राज-पुत्र उत्तर । भागा रण-भूमि छोड़कर । तब लड़ा तू ही धनुर्धर । इसी स्वभावसे ॥ ९५ ॥ महावीर जो ग्यारह अक्षोहिणी । हराये अकेलेने कोदंडपाणी । वही स्वभाव यहां तुझे सेनानी । बनायेगा निश्चित ॥ ९६ ॥ रोगीको कभी क्या रोग भाता । या दरिद्रीको दारिद्य भाता । किंतु जो प्रारब्ध है भोगाता । अति बलवान ॥ ९७ ॥ वह अदृष्ट जो है मित्र । कराता है ईश्वराधीन । वह ईश भी है अर्जुन । हृदयमें तेरे ॥ ९८ ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ सबमें व्याप्त ईश्वर अपनी मायासे विश्व चलाता रहता है— अंतरमें सब भूतोंके । महा नभमें हृदयके । सहस्रकर चिद्वृत्तिके । होता है उदय ॥ ९९ ॥ अवस्थात्रय तीनों लोक । प्रकाश करके अशेष । अन्यथा दृष्टिके पांथिक । जगाते हैं जो ॥ १३०० ॥ देहोदकके सरोवरमें । खिले जो विषय कमलमें । जीव षट्पदसे जीवनमें । चराता है वह ॥ १ ॥ रहने दे रूपक जो ईश्वर । सकल भूतोंका है अहंकार । अपने सिरपे ले निरंतर । प्रकटता है ॥ २ ॥ अपनी मायाका जो आड वस्त्र । लगाके अकेला चलता सूत्र । बाद नटते रहते चित्र । चौरासी लाख ॥ ३ ॥ ब्रह्मादिसे कीटांत । अशेष भूतजात । देख योग्यता पार्थ । दिलाता देह ॥ ४ ॥ रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर । मायासे ही चलाता जो यंत्रोंपर चढा कर ॥ ६१ ॥ ८२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तब जो शरीरका आकार । सम्मुख आया है देखकर । तदनुरूप ही ओढ कर । कहता मैं यह ॥ ५ ॥ सूतसे सूत लपेटा जाता । या घाससे घास बांधा जाता । जल बिंबको आप मानता । बालक जैसे ॥ ६ ॥ उसी भांति देहका आकार । आप ही दूसरा मानकर । देहको आत्मा समझकर । होता प्रकट ॥ ७ ॥ ऐसे हैं ये शरीराकार । यंत्रमें भूत धनुर्धर । डालकर हिलाता डोर । प्रारब्धका जो ॥ ८ ॥ उसका वहां जो कर्मसूत्र । बांधकर रखा है स्वतंत्र । वह उसके गतिका पात्र । होता है सदा ॥ ९ ॥ क्या कहूं मैं तुझे धनुर्धर । उडाता रहता निरंतर । गगनमें तिनके समीर । वैसे भूतोंको है यह ॥ १३१० ॥ जैसे चुंबकके साथ । भ्रमता है लोह नित । वैसे चलते हैं भूत । ईश्वराज्ञासे ॥ ११ ॥ जैसे अपनी चेष्टा पार्थ । करते समुद्रादि नित । चंद्र-सांनिध्यके साथ । उसी प्रकार ॥ १२ ॥ उससे सागर उछलता । सोमकांतमणि पसीजता । कुमुद चकोरका मिटता । सभी संकोच ॥ १३ ॥ वैसे बीज प्रकृति वश । अनेक भूत एक ईश । चलता रहता अशेष । तेरे हृदयमें ॥ १४ ॥ अर्जुनपन नहीं लेकर । 'मैं' ऐसे स्फुरता निरंतर । वही है तत्वता धनुर्धर । उसका रूप ॥ १५ ॥ इसीलिये करना प्रवृत्त । जान तू प्रवृत्तिको सतत । निश्चित ही लड़ायेगी पार्थ । तुझको यह ॥ १६ ॥ इसीलिये स्वामी है यह ईश्वर । उसीकी चलती है प्रकृति पर । वह करा लेती सब धनुर्धर । इंद्रियोंसे कार्य ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२६

करना या न करना पार्थ । प्रकृतिके सिरपे दे नित । वह प्रकृति है आधीनस्थ । जिस हृदयस्थके ॥ १८ ॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥ ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन है— अहं वाचा तन मन । देकर जा तू शरण । जाती है गंगा अर्जुन । सागरमें जैसे ॥ १९ ॥ फिर उसके प्रसादसे । सर्वोपशांति-प्रमदासे । कांत होकर स्वानंदसे । रमेगा स्वरूपमें ॥ १३२० ॥ उत्पत्ति होती जहांसे उत्पन्न । विश्रांतिका जहां विश्रांति-स्थान । अनुभूति बोध लेती अर्जुन । अनुभवका जहां ॥ २१ ॥ उस निजात्मपदका राय । होकर रहेगा तू अव्यय । सुनता है यहां धनंजय । कहता श्रीहरि ॥ २२ ॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ गीता नामसे यह विख्यात । सभी वाङ्मयका जो मथित । जिससे होता है हस्तगत । आत्म-रत्न ॥ २३ ॥ वेदांतमें इसको ज्ञान । ऐसा नाम दिया महान । इससे सदा यशोगान । हुवा वेदांतका ॥ २४ ॥ बुद्ध्यादिक जो ज्ञानवान । इसीसे है प्रकाशमान । “मैं” सर्व द्रष्टाका दर्शन । होता है इससे ॥ २५ ॥ उसीकी ओटमें जा तू पायेगा सर्व भावसे । कृपासे उसकी श्रेष्ठ शांतिका स्थान शाश्वत ॥ ६२ ॥ ऐसा जो गूढसे गूढ कहा ज्ञान तुझे अब । सोचके यह सारा तू स्वेच्छासे योग्य जो कर ॥ ६३ ॥ ८२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

यह है वह आत्मज्ञान । मेरा गुह्यसे गुह्य धन । तुझसे कैसे मैं वंचन । करूं सखासे ॥ २६ ॥ इस कारणसे है अर्जुन । दिया अपना गुप्त निधान । तुझसे होकर सकरुण । हमने यहां ॥ २७ ॥ ममतासे भूलकर पार्थ । माता बोलती अ-यथार्थ । तुझसे भी हम इस अर्थ । बोलते हैं सदा ॥ २८ ॥ जैसे आकाशको भी छानना । तथा अमृतको भी छीलना । अथवा दियासे कराना । दिव्य जैसे ॥ २९ ॥ जिसका शरीर है प्रकाशन । करता पातालका अणु जान । उस सूर्यकी आंखोंमें अंजन । लगाना कैसे ॥ १३३० ॥ ऐसे मैं सर्वज्ञ अर्जुन । विचारसे कर मंथन । सबसे यह भला जान । कहा तुझसे ॥ ३१ ॥ तू ही अब इस पर । कर अपना निर्धार । निर्धारके बाद फिर । कर जो योग्य ॥ ३२ ॥ यह सुनकर धनंजय । स्वस्थ हो रहा उस समय । तब कहे देव हो सदय । भला तू अवंचक ॥ ३३ ॥ भोजनमें बैठा क्षुधित । कहकर हुवा मैं तृप्त । होता आप क्षुधा पीडित । तथा मिथ्याचारी ॥ ३४ ॥ वैसे मिला सर्वज्ञ श्रीगुरु । करानेमें जो आत्म-निर्धार । नहीं पूछता मान आभार । मनमें उसके ॥ ३५ ॥ तब तो अपनेको ही फंसाता । तथा अपनी ही वंचना करता और अपने आप है दूर जाता । सत्य-स्वरूपसे ॥ ३६ ॥ तेरे मौनमें जो है अर्जुन । भेद जानता है मेरा मन । सुनना है फिर वह ज्ञान । अल्पमें एक बार ॥ ३७ ॥ कहता तब वह धनुर्धर । जानता देव तू मेरा अंतर । ऐसे कौन है जानेगा दूसरा । मेरा हृदय ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२८

यह ज्ञेय जो यहां संपूर्ण । इसका ज्ञाता तू एक जान । सूर्य ऐसे सबका वर्णन । करना क्या फिर ॥ ३९ ॥ सुनके यह श्रीकृष्ण । बोलता है तू अर्जुन । है क्या हमारा वर्णन । यह अल्प ॥ १३४० ॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ अनन्य भक्तसे कहा गया हृदयका गूढ— एकाग्र कर संपूर्ण ध्यान । फिरसे यह बात तू सुन । मेरा वचन यह अर्जुन । जो अति निर्मल ॥ ४१ ॥ वाच्य है इसीलिये बोलना । या श्रव्य है इसीलिये सुनना । ऐसे नहीं तो तेरा अर्जुना । भला है भाग्य ॥ ४२ ॥ नहीं होती है कभी दृष्टि प्रेमार्द्र । पिल्लोंको कूर्माकी दृष्टि है प्रेमार्द्र । वैसे ही होता आकाश भी प्रेमार्द्र । चातकके लिये ॥ ४३ ॥ जहां जो व्यवहार नहीं होता । उसका फल भी तब मिलता । जब दैव अनुकूल हो जाता । उस समय ॥ ४४ ॥ वैसे जो द्वैतका आना जाना । रोकके ऐक्य-घरमें जाना । तथा वहांका सुख भोगना । जो है रहस्य ॥ ४५ ॥ तथा जो निरुपचार प्रेम । विषय होता है प्रियोत्तम । दूसरा नहीं होकर आत्म । जानना यह ॥ ४६ ॥ देखनेके लिये दर्पण । पोंछना स्वच्छ जो अर्जुन । अपने लिये होता जान । उसके लिये नहीं ॥ ४७ ॥ तेरे लिये अब मैं पार्थ । बोलता अपने ही साथ । मैं तू यह भेद यथार्थ । नहीं हममें ॥ ४८ ॥ गूढ जो सब गूढोंका फिरसे वाक्य उत्तम । हितार्थ कहता तेरे होगा तू सुन मप्रिय ॥ ६४ ॥ ८२९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

इसीलिये यह हृदयका गुह्य । कहता मैं जीवसे ही धनंजय । अनन्यगति भक्तसे कैसे सह्य । रखना यह गूढ ॥ ४९ ॥ जलको सर्वस्व देता अपना । नून नहीं रहता तब भिन्न । तथा देनेमें सर्वस्व अं न । लजाता भी नहीं ॥ १३५० ॥ वैसे तू मुझमें अपना । न रखता द्वैत अर्जुन । तब तुझसे है छिपाना । रहा क्या गूढ ॥ ५१ ॥ इसीलिये गूढ जो संपूर्ण । खुलता है जिससे अर्जुन । यह शुद्ध गोप्य जो वचन । सुन तू अब ॥ ५२ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥ तब तू बाह्य और अंतर । अपने अन्य सभी व्यापार । मुझ व्यापकके धनुर्धर । कर विषय ॥ ५३ ॥ सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे मुझमें लीन हो— अथवा सर्वांगसे जैसे । वायु मिला है आकाशसे । सब कर्ममें तू भी वैसे । मुझसे मिल ॥ ५४ ॥ मानो तू अपना मन । कर मेरा ही सदन । मेरे श्रवणसे कान । भरे निरंतर ॥ ५५ ॥ आत्म-ज्ञानमें शुद्ध सिद्ध । रहते जो संत प्रसिद्ध । वहां हो तेरी दृष्टि बद्ध । कामुकोंकी सी ॥ ५६ ॥ सब विश्वका मैं वसतिस्थान । उस मेरे नाम जो अर्जुन । उसको अंतःकरणमें स्थान । दे तू वाचासे ॥ ५७ ॥ हाथोंका जो है करना । तथा पैरोंका चलना । यह ही मेरे कारण । ऐसे कर तू ॥ ५८ ॥ प्रेमसे करके ध्यान भज तू पूज तू मुझे । होगा तू मुझमें लीन प्रिय जो जान सत्य है ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३०

अपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय । कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥ एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना । विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥ तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार । इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥ तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर । मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥ तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें । भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥ तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना । फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥ जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब । होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥ पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर । मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥ वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म । फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥ इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें । अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥ जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना । प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥ वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच । उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥ यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप । तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥ ८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

किंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन । तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥ राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ । वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥ इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत । तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥ इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता । इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥ जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश । किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥ पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर । किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥ इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय । विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥ देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन । इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥ सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता । उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥ सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे । अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥ इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे । साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥ कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण । मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥ मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध । तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३२

ऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब । करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥ अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण । मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥ इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध । देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥ इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता । विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥ तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान । जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥ शरणागतिका विवेचन— आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता । वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥ वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक । तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥ करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार । या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥ अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला । व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥ अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे । अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥ सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर । जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥ (92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय

वैसे धर्माधर्म जो सकल । दिखाता है अज्ञान है मूल । तजके वह त्यागो सकल । धर्मजात ॥ ९५ ॥ मिट जाता जब अज्ञान । सहज रहता मैं ही जान । जानेसे जैसे स-नींद स्वप्न । रहता है आप ॥ ९६ ॥ वैसे मैं एकके बिन नहीं । भिन्नाभिन्न कुछ भी कहीं । सोऽहं-बोधसे हो उसमें ही । अनन्य सदैव ॥ ९७ ॥ किंतु है उनसे भेद बिन । मेरा ही जानना एकपन । उसका ही नाम है शरण । आना मेरी ॥ ९८ ॥ जैसे घटका होनेसे नाश । गगनमें गगन प्रवेश । इस भांति होता समरस । आनेसे शरण ॥ ९९ ॥ स्वर्ण-मणि जैसे स्वर्णमें । या कल्लोल जैसे पानीमें । वैसे अर्जुन तू मुझमें । पा ले आश्रय ॥ १४०० ॥ भिन्न अस्तित्व रखकर शरणागतिका विवेचन— अथवा समुद्रके उदरमें जैसे । वडवानल आश्रय पाता है वैसे । सिंधुको वह जलाके सुखाता वैसे । तज दे वह ॥ १ ॥ मेरे ही शरणमें आना । जीवत्वसे भिन्न रहना । निर्लज्ज है ऐसे बोलना । ऐसी वह प्रज्ञा ॥ २ ॥ सहज ही करता है धनुर्धर । कोई राजा जब दासीका स्वीकार । वह दासी भी समान स्तरपर । आती है वैसे ॥ ३ ॥ अजी ! विश्वेश्वर मैं भेटता । तथा जीव बंध न छूटता । ऐसी यह अमंगल वार्ता । न सुनना कभी ॥ ४ ॥ मद्रूप हो मुझसे मिलना । भक्ति मेरी ऐसी ही करना । ऐसी भक्ति देता है जो ज्ञान । उसको कर प्राप्त ॥ ५ ॥ जिस मट्ठेसे निकाला नवनीत । फिरसे उसीमें डाला वह पार्थ । फिर कभी उसमें नहीं मिलता । उसी प्रकार ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३४

लोहेपे जंग सहज चढ़ता । किंतु उसे जब परिस छूता । सुवर्णपे कभी नहीं चढ़ता । जंग अर्जुन ॥ ७ ॥ जाने दे काष्ठोंका कर मंथन । करने पर अग्निको उत्पन्न । उसी काष्ठमें कहो अग्नि कण । समाता क्या कभी ॥ ८ ॥ अभिन्न शरणागतिसे सभी मैं हो जाता हूँ— ऐसे अद्वयत्वमें मुझ । शरण आनेसे है तुझ । धर्माधर्म जो है सहज । नहीं छूएंगे ॥ ९ ॥ कभी क्या कह तू दिनकर । देखता है क्या कहीं अंधार । जागृतिमें होगा क्या गोचर । कभी स्वप्न ॥ १४१० ॥ वैसे मुझमें होनेसे मिलन । मेरी सर्व-व्यापकतासे भिन्न । रहनेका क्या रहा कारण । कह तू मुझे ॥ ११ ॥ इसलिये उसकी नहीं । चिंता व्यर्थ करना कहीं । तेरे पाप पुण्यका मैं ही । बनूंगा सारा ॥ १२ ॥ जलमें गिरा हुवा लवण । सब ही जल होता अर्जुन । बनूंगा मैं अनन्य शरण । तुझको वैसे ॥ १३ ॥ वहां जो सभी बंधका कारण । पाप है मुझसे रहता भिन्न । मेरे बोधमें ही वह विलीन । होगा सारा ॥ १४ ॥ इतनेमें ही तू सहज । मुक्त हुवा है पार्थ आज । जान ले भली भांति मुझ । करूंगा मैं मुक्त ॥ १५ ॥ इसीलिये न रहा है अर्जुन । मनमें चिंताका कोई कारण । मुझ एकको मान तू शरण । आज ही सुमति ॥ १६ ॥ ऐसे सभी रूपसे जो सुंदर । तथा सभी दृष्टिसे जो चतुर । कहता है जो सर्व व्याप कर । रहता श्रीकृष्ण ॥ १७ ॥ फिर शाम-सुंदर स-कंकण । पसार कर स्व-बाहू दक्षिण । आलिंगन करता स्व-शरण । भक्त-राजको ॥ १८ ॥ ८३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोग

भक्त और भगवानका सामरस्य— नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको । वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥ ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक । देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥ हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक । द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥ दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया । द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥ तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर । बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥ सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता । उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥ वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन । किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥ गीता वेदका भी मूल-सूत्र है— ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र । श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥ वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता । तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥ अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास । सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥ इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित । अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥ स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता । उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६

वह कांड - त्रयात्मक । शब्दराशि जो अशेष । गीतामें है रहा सुख । बीजमें जैसे ॥ ३१ ॥ इसीलिये वेदका बीज । श्रीगीता ही है यह मुझ । लगा है वैसे भी सहज । लगता ही है ॥ ३२ ॥ जो है वेदके तीनों भाग । गीतामें उमडे हैं चांग । भूषण करनेसे सर्वांग । शोभता जैसे ॥ ३३ ॥ कर्मादिक जो उसके तीन । कांड हैं यहां किस स्थान । गीतामें है जो वे संपूर्ण । दिखाऊंगा अब ॥ ३४ ॥

गीता और वेदकी समानता—

गीताका जो पहला पर्व । शास्त्र-प्रवृत्तिका प्रस्ताव । दूजा सांख्य - शास्त्र सद्भाव । है प्रदर्शित ॥ ३५ ॥ मोक्ष-दानमें जो स्वतंत्र । ज्ञान प्रधान यह शास्त्र । इसीमें है यह सु-सूत्र । लिया हाथमें ॥ ३६ ॥ फिर हैं जो अज्ञानमें बद्ध । मोक्ष-पदमें चढ़ने सिद्ध । उन्हे साधनारंभ विशुद्ध । कहा तीसरेमें ॥ ३७ ॥ तथा जो देहाभिमानमें बद्ध । छोडकर काम्य-कर्म निषिद्ध । विहित कर्म करें अप्रमाद । कहा है यह ॥ ३८ ॥ सद्भावसे ऐसे कर्म करना । तीसरे अध्यायका है कहना । श्रीकृष्णका निर्णय जो जानना । कर्मकांड ॥ ३९ ॥ और वे ही नित्यादिक । अज्ञानंका आवश्यक । आचरनेसे मोचक । होगा ऐसे ॥ १४४० ॥ ऐसी जब अपेक्षा होती । बद्धमें मुमुक्षुता आती । तब ब्रह्मार्पणत्व कृती । करना भी सिखाया ॥ ४१ ॥ जो काया वाचा मनसे । विहित हो सब ऐसे । वह ईश्वरोद्देश्यसे । करनेको कहा । ४२ ॥

८३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध

कर्मयोगसे उपासना । ईश्वर-स्थानमें करना । श्रीहरिका यह कहना । चौथेके अंतमें ॥ ४३ ॥ वहांसे जो एकादशाध्याय । पूर्ण होने तक धनंजय । कर्मसे ईश-भजन कार्य । कहा है सारा ॥ ४४ ॥ इन आठ अध्यायोंमें है स्पष्ट । देवताकांड किया है निर्दिष्ट । शास्त्रोंमें कहे गये सभी पट । खोले हैं यहां ॥ ४५ ॥ तथा यही ईश्वर-प्रसादसे । मिलता श्रीगुरु-संप्रदायसे । सच्चा अपरिपक्व ज्ञान जिसे । प्रतीत किया जान ॥ ४६ ॥ वही अद्वेष्टावि श्लोकोंमें । तथा अमानित्वादिकमें । परिपक्व किया ज्ञानमें । बारहवाका अंत ॥ ४७ ॥ वह बारहवाका अध्याय प्रथम । तथा पंद्रहवा अध्याय अंतिम । ज्ञान-फल-पाक सिद्ध निरुपम । है निरूपण ॥ ४८ ॥ इसीलिये इन चारमें । ऊर्ध्व-मूलांत अध्यायमें । ज्ञान-कांड इस स्थानमें । कहा गया है ॥ ४९ ॥ एवं कांडत्रय निरूपण । करता है जो श्रुति-वचन । गीता पद रत्नोंके भूषण । पहनते यहां ॥ १४५० ॥ कहने पर ये कांडत्रयात्मक । श्रुति मोक्ष-फल जो है एक । प्राप्त करना है यह आवश्यक । कहा गरजकर ॥ ५१ ॥ उसीके साधन ज्ञानसे । वैर करते जो सदासे । अज्ञान वर्ग है जो उसे । कहा सोलहवेमें ॥ ५२ ॥ शास्त्रोंके यहां इसी साथीको । साथ ले जीतना है शत्रूको । ऐसा वह संदेश सबको । देता सत्रहवां ॥ ५३ ॥ इसभांति है पहलेसे । सत्रहवें तक जो ऐसे । बखाने हैं स्पष्ट-रूपसे । स आत्म-विश्वास ॥ ५४ ॥ यह अर्थ जात संपूर्ण । किया तात्पर्य अर्थ-पूर्ण । अष्टादशमें निरूपण । कलशाध्याय जो ॥ ५५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६

ऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध । सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता— मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण । कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥ यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त । उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥ पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर । प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥ अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर । पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥ गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता । गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥ ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर । डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥ अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर । सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥ करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान । सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥ पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर । अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥ इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता । पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥ बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर । वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥ ८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध

करके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ । तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥ अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल । उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥ वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण । दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥ शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल । कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥ पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र । जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥ द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद— फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन । समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥ जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण । तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥ अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन । भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥ जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन । सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥ उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल । जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥ परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें । न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥ नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार । इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४०

तूने बहुत पुण्य किया । उससे आज धनंजया । सुननेमें सुपात्र भया । गीता-तत्व ॥ १४८० ॥ इस शास्त्रके धनुर्धर । संप्रदायको ओढ़कर । आचर तू शास्त्रानुसार । भली भांति ॥ ८१ ॥ नहीं तो अमृत-मंथन । वैसे होगा जान अर्जुन । यदि होगा अनुष्ठान । संप्रदाय छोड़ ॥ ८२ ॥ गाय मिली है भली भाग्यसे । किंतु दुहना आता है उसे । नहीं तो दूध मिलेगा कैसे । मिलकर भी व्यर्थ ॥ ८३ ॥ वैसे गुरु होकर प्रसन्न । शिष्यको देता है विद्या-दान । संप्रदाय-युक्त अनुष्ठान । करनेसे फलती है ॥ ८४ ॥ इसीलिये यहां धनंजय । गीता शास्त्रका जो संप्रदाय । कहता सुन इस समय । आदरसे तू ॥ ८५ ॥ इदं ते नातपस्याय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ यह इससे नहीं कहना चाहिये— तुझे मिला यह जो पार्था । इसमें रखनेसे आस्था । तपोहीनको जो सर्वथा । कहना नहीं ॥ ८६ ॥ या तापस भी हुवा अर्जुन । किंतु है गुरु-भक्तिसे हीन । उनको वैसे ही दूर मान । जैसे अंत्यजको वेद ॥ ८७ ॥ अथवा पुरोडासु जैसा । मृगको नहीं देते वैसा । न दो गीता वैसे तापसा । गुरु-भक्तिहीन ॥ ८८ ॥ तथा तनसे जो है तपता । गुरु-देवको भी है भजता । किंतु जो सुनना न चाहता । उसको न कहना ॥ ८९ ॥ न है जिसे तपोभक्ति उसे न कह तू यह । ईर्षा जो करता मेरी न चाहता सुने इसे ॥ ६७ ॥ ८४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान । करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥ उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल । गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥ सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार । व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥ दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको । वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥ हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं । उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥ रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण । उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥ इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति । किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥ जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति । इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥ जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता । उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥ तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात । उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥ वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान । किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥ अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण । किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥ सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर । किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४२