भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जिज्ञासूके सन्मुख वीरेशा । इसी भांति होकर जिज्ञासा । मैं ही मानो जिज्ञास्यु है ऐसा । दिखाया गया है ॥ १९ ॥ ऐसे ही बनकर अर्थना । मैं ही मेरे अर्थार्थ अर्जुना । करके तब अर्थाभिधाना । लाता मुझको ही ॥ ११२० ॥ ऐसे ही अज्ञानका कर स्वीकार । करते भक्तिमें मेरा व्यवहार । दिखाती भक्ति दृश्य-रूप लेकर । मुझ द्रष्टाको ही ॥ २१ ॥ मुखको दीखता वहां मुख । इस बोलनेमें नहीं चूक । झूठा द्वैत दिखाता है देख । दर्पण यहां ॥ २२ ॥ चंद्रको ही देखते हैं नेत्र । तिमिर करता यही मात्र । दिखाता रहता है सर्वत्र । एकका होकर ॥ २३ ॥ सर्वत्र ऐसे मुझको मैं अर्जुन । भक्तिसे होता रहता आकलन । किंतु है दृश्यत्व अज्ञान कारण । व्यर्थका यहां ॥ २४ ॥ मिटा अब वह सब अज्ञान । मेरा द्रष्टृत्व मुझे मिला मान । निज-बिंबमें हुवा है विलीन । प्रतिबिंब जैसे ॥ २५ ॥ सोनेमें जब मिला रहता मल । तब भी सोना रहता है अचल । किंतु जल करके वह केवल । रहता सोना ही ॥ २६ ॥ अजी ! पूर्णमासिके पहले कहीं । चंद्रमा सावयव होता या नहीं । पूर्णचंद्र देखने मिलता यहीं । पूर्णमासीको ॥ २७ ॥ वैसे मैं अन्यथा ज्ञानसे । दीखता हूं भिन्न रूपसे । वह द्रष्टत्वमें खोनेसे । मुझे मैं भेटता ॥ २८ ॥ तभी दृश्यपथातीत । मेरा यह पांडुसुत । भक्तियोग है चतुर्थ । कहा मैंने ॥ २९ ॥ ज्ञान-भक्तिसे जो सहजरूप । भक्त मुझमें लीन हुवा आप । वह केवल मैं हूं परंतप । जानता तू यह ॥ ११३० ॥ जो मैं हुवा नहीं उसके लिये मैं है ही नहीं— मैंने ही हाथ उठाकर । ज्ञानी भक्त जो धनुर्धर । मेरा आत्मा इस प्रकार । कहा सातवेमें ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१०