ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे सभी पदार्थ-ज्ञान । निगल जाता मेरा ज्ञान । तब वह संपूर्ण ज्ञान । अज्ञान निगलता ॥ ६ ॥ जैसे कल्पांतके समय । नदी सिंधुके समुदाय । एक होकर धनंजय । जल होता आम्रक्ष ॥ ७ ॥ या मिटकर नाना घटाकाश । एक हो जाता है महदाकाश । या काष्ठोंसे जलके काष्ठ शेष । रहता है अग्नि ॥ ८ ॥ अथवा भूषणके आकार । आंचमें सभी पिघलकर । सारा नाम रूप मिटाकर । होता है सुवर्ण ॥ ९ ॥ अथवा होते ही जागृत । हो जाता है स्वप्नका अस्त । फिर जैसे आपही पार्थ । रह जाता है ॥ १११० ॥ वैसे ही मुझ एकको छोडकर । न उसे अपने सह कुछ और । कहाती जो चौथी भक्ति धनुर्धर । पाता है वह ॥ ११ ॥ जहां आर्त जिज्ञासू अर्थार्थी । जिस मार्गसे करते भक्ति । इसे देख मैं कहता चौथी । भक्ति इसको ॥ १२ ॥ वैसे नहीं पहली या चौथी । दूसरी तीसरी इस भांति । किंतु जो मेरी सहज स्थिति । भक्ति नाम उसका ॥ १३ ॥ मेरे अज्ञानका प्रकाशन । दिखाके मेरा अन्यथा ज्ञान । सबको सर्वत्र ही भजन- । सुझाती है ॥ १४ ॥ जहां जो जैसे देखता वैसे । उसे वहां रहता है वैसे । दीखता मेरे चित्प्रकाशसे । यह अखंड ॥ १५ ॥ स्वप्नका दीखना या न दीखना । अपने अस्तित्वपे होना जाना । जिससे विश्वका होना या न होना । प्रकाशना वैसे ॥ १६ ॥ ऐसा यह मेरा सहज । प्रकाश जो है कपिध्वज । वह भक्ति नामसे आज । कहा जाता है ॥ १७ ॥ इसीलिये आर्तोंमें जैसे । बनके उत्कट इच्छासे । अपेक्षणीय जो है उसे । भाता मैं ही ॥ १८ ॥ ८०९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग