ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम । उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥ आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! । उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥ ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन— उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना । डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥ उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति । लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥ उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था । तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥ पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर । वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥ वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न । वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥ फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन । उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥ जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय । वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥ जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता । फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥ या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥ या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता । शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०८