भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 872

वह ब्रह्म ही एक सत । दूसरा संपूर्ण है भ्रांत । इसको जिसने प्रतीत । किया है दृढ ॥ २ ॥ किंतु वह जो परब्रह्म । सर्वात्मक है सर्वोत्तम । जिससे मोक्षका भी काम । रहता नहीं ॥ ३ ॥ अपनेमें ही यह जो ज्ञान । पचाता तीनो अवस्था जान । उस ज्ञानका भी आलिंगन । करती जो वस्तु ॥ ४ ॥ ऐक्यकी एकता होती समाप्त । आनंद कण भी होता है लुप्त । कुछ न करके रहता नित । जो है कुछ ॥ ५ ॥ उस ब्रह्ममें ही लय होकर । रहना है ब्रह्म ही बनकर । क्रमसे उसको भी प्राप्त कर । लिया है तब ॥ ६ ॥ जैसे है कोई बुभुक्षित । करता षड्रसान्न प्राप्त । तब प्रति ग्राससे तृप्त । होता है वैसे ॥ ७ ॥ मिला वैराग्य-स्नेहका भरण । विवेक दीप कर प्रज्वलन । उसमेंसे आत्म-तत्व निधान । पा लेना है ॥ ८ ॥ भोगना है आत्म-ऋद्धि । इतनी योग्यता सिद्धि । जिसने है निरवधि । पायी भूषण रूप ॥ ९ ॥ जिस क्रमसे वह ब्रह्म । होता जाता यह सुगम । उस क्रमका अब मर्म । कहता हूं सुन ॥ १०१० ॥ बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ द्वंद्व चिंता छोड़ कर स्व-चिंतन करना शुद्ध-बुद्धि है— श्रीगुरुके दिखाये मार्ग पर । चारु विवेक-तीर्थ तटपर । साधक बुद्धिका मल धोकर । तदुपरांत ॥ ११ ॥ जुड़ाके सात्विकी बुद्धि धृतिकी डोर खींचके । तजके शब्द स्पर्शादि जीतके राग-द्वेषको ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८००