भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उसको फिर कुछ करना । रहता क्या कह अर्जुन । आकाशको आना तथा जाना । रहता है क्या ॥ ९९० ॥ इसीलिये उसको कहीं । त्रिशुद्धि करना है नहीं । न हुवा ऐसे कुछ कहीं । उसके लिये ॥ ९१ ॥ उन्हे स्व-कर्मकी अग्निमें । काम्य निषेध ईंधनमें । रज तमको जलानेमें । करना प्रारंभ ॥ ९२ ॥ पुत्र वित्त तथा परलोक । इन तीनोंका जो अभिलाष । हुवा जैसे अपना सेवक । ऐसे होगा ॥ ९३ ॥ स्वैर इंद्रियोंमें सर्व-स्पर्शसे । आई हुई जिस मलिनतासे । मुक्त करनेमें प्रत्याहारसे । किया जाता स्नान ॥ ९४ ॥ तथा स्वधर्मका जो फल । ईश्वरार्पण करके बल । लेकर किया है गरल । वैषम्यका वह ॥ ९५ ॥ आत्म-साक्षात्कारमें ऐसे । ज्ञानका उत्कर्ष हो कैसे । इसकी सामग्री जो ऐसे । पाता है वह ॥ ९६ ॥ तथा है ऐसे ही समय । सद्गुरु मिले धनंजय । उसने ज्ञान-दान कार्य । सही किया तो भी ॥ ९७ ॥ वैराग्यका लाभ और श्रीगुरुके लोभसे अनुभव-अंकुर फूटता है- औषध लेते ही तत्क्षण । रोगमें आयेगा क्या गुण । या सूर्योदयसे तत्क्षण । मध्यान्ह होगा क्या ॥ ९८ ॥ सुक्षेत्र तथा है जो तर । बोया बीज गला सुंदर । किंतु फल आनेमें देर । लगेगा ही ॥ ९९ ॥ चले मार्ग पर जो सरल । वहां मिला सत्संगका मेल । पहुंचने तक कुछ काल । लगेगा ही ॥ १००० ॥ ऐसे हुवा वैराग्यका लाभ । तथा मिला श्रीगुरुका लोभ । अंतःकरणमें फूटा कोंब । विवेकका ॥ १ ॥ ७९९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग