भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसे होना जब नहीं घड़ता । वह नैष्कर्म्य सिद्धि है कहाता । सभी सिद्धियोंमें यह जो होता । परम श्रेष्ठ ॥ ९८० ॥ मंदिरके कार्यमें कलश । गंगाकी सीमा सिंधु-प्रवेश । वैसे सुवर्ण-सिद्धिमें कस । सोलहवा अंतिम ॥ ८१ ॥ ऐसे अपना अज्ञान । मिटा देता जो वह ज्ञान । वह भी निगल अर्जुन । रहनेकी दशा ॥ ८२ ॥ इसके पर कुछ नहीं । पाना ऐसे रहता नहीं । इसीलिये कहना यही । परम-सिद्धि ॥ ८३ ॥ किंतु यही जो आत्म-सिद्धि । जैसे है कोई भाग्य-निधि । श्रीगुरुकृपा-उपलब्धि । होती तब मिलती ॥ ८४ ॥ सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥ ब्रह्मत्व-सिद्धिका विवेचन— उदय होते ही दिनकर । प्रकाश ही होता है अंधार । अथवा दीप सह् कर्पूर । होता है दीप ॥ ८५ ॥ अथवा लवण-कणिका । मिलकर जैसे उदका । होती है आप भी उदक । उसी प्रकार ॥ ८६ ॥ या निद्रित होता है जागृत । स्वप्न सह् नींद होती व्यर्थ । तथा अपना रूप जागृत । पाना जैसे ॥ ८७ ॥ जिस किसीके सुदैवसे । श्रीगुरु-वाक्य श्रवणसे । द्वैत निगल स्थिरतासे । रहता स्ववृत्तिमें ॥ ८८ ॥ श्रवण वचनका मिलन । होते ही जैसे सुन अर्जुन । स्वयं-स्वरूप हो जाना मान । अपने आपमें ॥ ८९ ॥ मिला है सिद्धिमें ब्रह्म कैसे किस प्रकारसे । ज्ञानकी श्रेष्ठ जो निष्ठा अल्पमें कहता सुन ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९८