भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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रातके जो चार प्रहर । होते ही मिटाके अंधार । आंखोंको दीखता भास्कर । उसी भांति ॥ ६७ ॥ अथवा आकर फलकी घौंद । करता केलेका बढ़ना बंद । श्रीगुरु मिल साधकको छंद । जगाते हैं मोक्षका ॥ ६८ ॥ चंद्र जो पूर्णिमासे आलिंगित । तजता जैसे सभी व्यंग पार्थ । वैसे उसको मिलती सतत । श्रीगुरुकी कृपा ॥ ६९ ॥ अज्ञान मात्र तब जो रहता । उस कृपासे है सभी मिटता । रजनी सहित है जैसे जाता । अंधार सारा ॥ ९७० ॥ अज्ञानके गर्भमें जैसे । कर्म कर्ता औ' कार्य ऐसे । यह त्रिपुटी रहनेसे । गर्भिणी ही मरी ॥ ७१ ॥ ऐसे अज्ञान नाशके साथ । नष्ट होते हैं सभी क्रिया जात । ऐसे समूल संभव पार्थ । होता संन्यास ॥ ७२ ॥ मूल अज्ञान संन्याससे ऐसे । दृश्यका स्थान ही मिट जानेसे । वहां जानना रहता है ऐसे । आत्मतत्व ॥ ७३ ॥ जगने पर जैसे अर्जुन । डूबे थे ऐसे स्थान । करना पड़ता क्या गमन । बचानेको ॥ ७४ ॥ जो न मैं जानता वह जानूंगा । ऐसा दुष्ट स्वप्न जब मिटेगा । ज्ञाता ज्ञान विरहित जो होगा । चिदाकाश केवल ॥ ७५ ॥ सुखाभास सह वह दर्पण । दूर करनेसे अर्जुन । रहता देखनेके बिन । देखनेवाला जो ॥ ७६ ॥ वैसे न जानना जो गया । साथ जानना भी ले गया । फिर निष्क्रिय रह गया । चिन्मात्रा ही ॥ ७७ ॥ स्वभावसे वहां धनंजय । न रही किसी भांतिकी क्रिया । इसीलिये वह कहा गया । नैष्कर्म्य ऐसा ॥ ७८ ॥ होता है जब वायुका लोप । उससे होता तरंग लोप । तब जैसे रहता है आप । समुद्र मात्र ॥ ७९ ॥ ७९७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग