भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 868

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल । न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥ पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र । मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥ रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे । पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥ ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान । राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥ इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ । आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥ दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब । आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥ मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख । तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥ अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था— विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन । ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥ संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता । नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥ ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा । फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥ न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह । नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९६