ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग
कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ अथवा कृषिसे है जीना । गोधनकी रक्षा करना । अधिक मूल्यमें बेचना । स्वस्त वस्तु ॥ ८१ ॥ इतना ही है धनंजय । वैश्य-कर्मका समुदाय । वैश्यका गुण-समुच्चय । इतना जान ॥ ८२ ॥ तथा वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण । द्विजन्मके हैं ये तीनों वर्ण । इन सबका जो शुश्रूषण । कर्म है शूद्रका ॥ ८३ ॥ द्विज-सुश्रूषासे पर । शूद्र कर्म ना यहांपर । वर्णोचित है धनुर्धर । दिखाये कर्म ॥ ८४ ॥ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ वर्णानुसार सहज कर्म ही अधिकार है— भिन्न भिन्न वर्णोंको उचित । कर्म इसी प्रकार हैं पार्थ । जैसे इंद्रियोंको है उचित । शब्दादिक विषय ॥ ८५ ॥ अथवा मेघसे जो चूता । पानीको उचित सरिता । सरिताको है पांडुसुता । उचित है सिंधु ॥ ८६ ॥ वर्णाश्रम वश जैसे । करणीय कार्य ऐसे । गोरेकी गौरता जैसे । होती स्वाभाविक ॥ ८७ ॥ वह है जो स्वाभाविक कर्म । शास्त्रानुसार ही वीरोत्तम । करनेमें ही उत्कट प्रेम । ऐसे रहता ॥ ८८ ॥ खेती व्यापार गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावसे । करना प्राप्त सेवा जो शूद्र-कर्म स्वभावसे ॥ ४४ ॥ जो है स्व-कर्ममें दक्ष पाता है मोक्ष निश्चित । मोक्ष कैसा सुनो पाता स्वकर्म दक्ष जो नर ॥ ४५ ॥ ७८९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
होता है यदि अपना ही रत्न । कराता जौहरीसे परीक्षण । वैसे शास्त्रानुसार निरीक्षण । करना कर्मका ॥ ८९ ॥ जैसे दृष्टि होती है अपने पास । दीपके बिन उपयोग न खास । या पथ नहीं जानने पर विशेष । जैसे हैं पैर ॥ ८९० ॥ तभी जो है वर्णानुसार । सहज होता अधिकार । आप हो शास्त्रोंसे गोचर । करता आप ॥ ९१ ॥ जो है घरकी ही धरोहर । दीप दिखाता है धनुर्धर । उठानेमें कह तू फिर । आलस कैसे ॥ ९२ ॥ स्वाभाविक ही जो पाया । शास्त्रोंसे सही कहा गया । विहित कर्म अपनाया । आचरणमें जो ॥ ९३ ॥ आलसको छोड़कर । फलाशाको तज कर । तन मन एक कर । देना आरंभमें ॥ ९४ ॥ प्रवाह-बद्ध होकर बहता । पानी भिन्न दिशामें नहीं जाता । वैसे ही शास्त्रोचित आचरता । अपना कर्म ॥ ९५ ॥ इस प्रकारसे जो पार्थ । स्वयं कर्म करता विहित । करता है मोक्ष-द्वार प्राप्त । इस ओरका ॥ ९६ ॥ अकरणीय और निषिद्ध । कर्मसे न रखना संबंध । तभी तो वह भव-बद्ध । नहीं होता ॥ ९७ ॥ शास्त्रोक्त निष्काम कर्मसे आत्म-ज्ञान मिलता है— तथा काम्य-कर्मकी ओर । दृष्टिपात भी नहीं कर । स्वर्गका भी चंदन-द्वार । रोकता वह ॥ ९८ ॥ वैसे ही अन्य जो है नित्य-कर्म । फल-त्यागसे किये निष्काम । इसीलिये है मोक्षकी सीम । पायी उसने ॥ ९९ ॥ ऐसे शुभाशुभ संसार । तज कर जो धनुर्धर । वैराग्य मोक्ष-द्वार पर । आ के खडा हुवा ॥ ९०० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९०
सकल भाग्यकी है जो सीमा । तथा है मोक्ष लाभकी प्रमा । विविध कर्ममागोंका श्रम । शांत होता यहां ॥ १ ॥ मोक्ष-फलका जो दिया हुवा ओल । अथवा सुकृत तरुका है फूल । वैराग्य कमल पर अलिकुल । बैठता जैसे ॥ २ ॥ जैसे आत्म-ज्ञान सुदिनका । वार्ता देनेवाले अरुणका । उदय होता है वैराग्यका । उस समय ॥ ३ ॥ अथवा मानो वह आत्म-ज्ञान । हाथमें जिससे आता निधान । उस वैराग्यका है दिव्यांजन । आता है बुद्धिमें ॥ ४ ॥ ऐसी जो मोक्षकी योग्यता । सिद्ध होती है पांडुसुता । विहित कर्म जो करता । उसको सदैव ॥ ५ ॥ यह विहित कर्म जो अर्जुन । अपना मानो अनन्य जीवन । गुरु सर्वात्मकका है पूजन । श्रेष्ठ तम जो ॥ ६ ॥ या संपूर्ण भोग सह् जैसे । पतिव्रता रमती पतिसे । उसी क्रियाको कहते वैसे । किया सभी तप ॥ ७ ॥ या बालकको माताके बिन । दूसरा क्या है अन्य साधन । तभी है माताकी गोद मान । उसका धर्म ॥ ८ ॥ केवल पानी ही मान मीन । गंगाको नहीं तजके जान । पाता जैसे सभी तीर्थ स्थान । सागर सहज ॥ ९ ॥ वैसे है अपने जो विहित । उपाय स्मरनेसे सतत । ऐसे करता कि जगन्नाथ । मानले भार ॥ ९१० ॥ अजी ! जिसको जो विहित । ईश्वरका है मनोगत । मान करनेसे निभ्रांत । मिलता वह ॥ ११ ॥ अजी ! मनमें जो उतरती । दासी भी है स्वामिनी बनती । शीस देकर होती जो प्राप्ति । स्वामीकी कृपा ॥ १२ ॥ वैसे स्वामीका है मनोभाव । न चूकता है परम सेवा । यह छोड दूसरा पांडव । केवल वाणिज्य ॥ १३ ॥ ७९१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विंदति मानवः ॥ ४६ मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था अनिवार्य है— तभी है विहित क्रिया करना । मानो ईश्वरकी आज्ञा पालना । जिससे प्राप्त हुवा है अर्जुन । आकार भूतोंको ॥ १४ ॥ टुकडोंसे जो अविद्याके । बनाकर गुड्डे उनके । खिलाता है तीन गुणोंके । अहंकार सूत्रसे ॥ १५ ॥ जिससे यह विश्व समस्त । अंतर्बाह्य संपूर्ण भरित । रहते हैं जैसे दीप जात । तेजसे वैसे ॥ १६ ॥ वह सर्वात्मक ईश्वर । स्वकर्म कुसुमसे वीर । पूजा जाता जब अपार । तोषता वह ॥ १७ ॥ तब है जैसी पूजासे । संतुष्ट आत्म-रामसे । मिलता अति प्रेमसे । वैराग्य-प्रसाद ॥ १८ ॥ उस वैराग्य-प्रसादके कारण । होता है सतत ईश-चिंतन । नहीं सुहाता अन्य कुछ मान । वमन है सारा ॥ १९ ॥ जैसे प्राणनाथके वियोगमें । वियोगिनी दुःख पाती जीनेमें । चुभते सारे सुख भोगनेमें । दुःख रूप ॥ १२० ॥ उदय न होते सम्यग्ज्ञान । ध्यानसे तन्मयता अर्जुन । आती है ऐसी योग्यता जान । बोधसे ही ॥ २१ ॥ इसीलिये जो मोक्ष-लाभार्थ । तनसे आचरता है व्रत । उसे स्वधर्ममें आस्था पार्थ । रखनी ही होगी ॥ २२ ॥ स्वधर्मसे नियत-कर्म स्वभावके दोषोंको दूर कहता है— अजी है अपना जो स्वधर्म । आचरणमें यदि विषम । तो भी देखना है परिणाम । फळता जो ॥ २३ ॥ विस्तार जिसका विश्व प्रेरता प्राणिमात्र जो । उसको पूजके मोक्ष पाता स्वकर्म पुष्पसे ॥ ४६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९२
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥ अपने हितके लिये सब । नीम है सुख दायक जब । उसके तीतापनसे तब । उक्तायें कैसे ॥ २४ ॥ फलनेसे प्रथम जैसे । आशा भंग होता केलेसे । इसीलिये उखाडनेसे । फल मिलेगा क्या ॥ २५ ॥ स्वधर्मका आचरण । करना जान कठिन । तजा तो मोक्ष अर्जुन । मिलेगा कहां ? ॥ २६ ॥ तथा अपनी जो माता । कुलटा होनेसे पार्था । तो भी होते हैं जीविता । स्नेह न होता टेढा ॥ २७ ॥ अथवा जो है परकीय । रंभासे सुंदर काय । उससे मिले क्या स्तन्य । बालकको कभी ॥ २८ ॥ अजी ! पानीसे भी बहुत । गुणमें उत्तम घृत । इससे कह मीन पार्थ । रहेगा क्या उसमें ॥ २९ ॥ विश्वको होता है जो विष । जंतुओंका वह पीयूष । तथा विश्वका गुड देख । विष है उनको ॥ ९३० ॥ इसीलिये है जो शास्त्र-विहित । कर्मसे खुलता भव अंकित । तभी कष्टदायक भी विहित । करना कर्म ॥ ३१ ॥ अपना विहित-कर्म तजकर । दूसरोंका भला जो अपनाकर । जैसे पैरोंसे चलना छोडकर । चलना सिरसे ॥ ३२ ॥ इसीलिये जो कर्म अपना । स्वभावसे मिला हुवा मान । करनेसे ही कर्म-बंधन । छूटता पार्थ ॥ ३३ ॥ तथा स्वधर्मको पालना । पर-धर्म जान तजना । यह नियम न पालना । उस समय ॥ ३४ ॥
हलका अपना धर्म भला है पर धर्मसे । जलता दोष जो कर्म नियुक्त जो स्वभावसे ॥ ४७ ॥ ७९३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जब न होता आत्मानुभव । कर्म नहीं छूटता पांडव । उन्हे भोगना दुःख सदैव । मिलता मात्र ॥ ३५ ॥ सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ प्रत्येक कर्म करते समय प्रारंभमें आयास होते हैं— इसीलिये किसी भी कर्ममें । आयास होते हैं प्रारंभमें । तब कह तू क्या स्वधर्ममें । रहा दोष ॥ ३६ ॥ अजी ! सरल मार्ग चलना । पैरोंका यदि है थक जाना । तो घने जंगलमें घुसना । तब भी वही ॥ ३७ ॥ शिला या साथ लिया पाथेय । एक ही भार है धनंजय । विश्रांतिमें जो सुखका होय । लेना है वही ॥ ३८ ॥ वैसे तो दाना और भूसा । कूटनेमें श्रम एक-सा । पकानेमें श्वानका मांस । तथा हविष्यान्न ॥ ३९ ॥ दधि तथा जलका मंथन । व्यापार जैसा एक समान । बालू तथा तिलोंका पेरना । एक ही जैसा ॥ ९४० ॥ करनेमें नित्यका होम हवन । जलाके आग करना दहन । फूंकके धूम सहना है अर्जुन । एक जैसा ही ॥ ४१ ॥ धर्म-पत्नी या वारांगना । पोसनेमें कष्ट समान । वारांगना रुख करना । अन्याथ क्या दूसरा ॥ ४२ ॥ पीठमें लगके हथियार । आती जब मृत्यु धनुर्धर । तब सम्मुख हो लडकर । करना विक्रम ॥ ४३ ॥ अकुल की मारके भयसे । परगृहमें खाती है वैसे । अपने पतिको तजनेसे । मिला ही क्या अपना ॥ ४४ ॥ सहज प्राप्त जो कर्म न छोडना सदोष भी । दोष हैं सब कर्मोंमें जैसे हैं धूम आगमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९५
वैसे कमी कोई कर्म । नहीं होता बिना श्रम । तब है विहित कर्म । करना क्या बुरा ॥ ४५ ॥ लेनेसे जब अल्प अमृत । मिलता है अमर जीवित । तब सर्वस्व देनेमें पार्थ । जाता क्या अपना ॥ ४६ ॥ अजी ! क्यों मूल्य देकर । पीना विष खरीद कर । मरना आत्म-दाह कर । पड़ता है जो ॥ ४७ ॥ वैसे कष्ट देकर इंद्रियोंको । खर्च कर आयुष्यके दिनोंको । और क्या इकट्ठा किया पापको । दुःखके लिये ॥ ४८ ॥ इसलिये पालना स्वधर्म । पालनेसे दूर होते श्रम । तथा उचित देता परम- । पुरुषार्थ राज ॥ ४९ ॥ यह कारण है अर्जुन । स्वधर्मका ही आचरण । संकट समयमें स्मरण । सिद्ध मंत्रका जैसे ॥ ९५० ॥ या नांव जैसे समुद्रमें । दिव्यौषधि महारोगमें । तथा स्वधर्म जगतमें । नहीं भूलना ॥ ५१ ॥ फिर करना कपिध्वजा । स्वकर्मसे ही महापूजा । तुष्ट हो ईश तम रज । करेगा दूर ॥ ५२ ॥ शुद्ध सत्वकी है बाट । तथा अपनी उत्कंठा । भव स्वर्ग कालकूट । दिखांती ऐसे ॥ ५३ ॥ जिस वैराग्यके कहे लक्षण । यही पहले संसिद्धि लक्षण । वहां पहुंचना है विलक्षण । जिस स्थान पर ॥ ५४ ॥ इस भूमिकाको प्राप्त कर । साधक वैसे होता है फिर । सर्वत्र क्या पाना धनुर्धर । कहता हूं अब ॥ ५५ ॥ निर्मल स्नेह पक्व-फलकी भांति अलिप्त होता है— देहादिक है संसारमें । तन ही पड़ा है फंदेमें । फंस भी न आता जालमें । वायु जैसे ॥ ५६ ॥ ७९५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल । न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥ पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र । मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥ रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे । पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥ ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान । राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥ इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ । आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥ दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब । आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥ मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख । तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥ अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था— विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन । ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥ संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता । नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥ ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा । फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥ न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह । नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९६
रातके जो चार प्रहर । होते ही मिटाके अंधार । आंखोंको दीखता भास्कर । उसी भांति ॥ ६७ ॥ अथवा आकर फलकी घौंद । करता केलेका बढ़ना बंद । श्रीगुरु मिल साधकको छंद । जगाते हैं मोक्षका ॥ ६८ ॥ चंद्र जो पूर्णिमासे आलिंगित । तजता जैसे सभी व्यंग पार्थ । वैसे उसको मिलती सतत । श्रीगुरुकी कृपा ॥ ६९ ॥ अज्ञान मात्र तब जो रहता । उस कृपासे है सभी मिटता । रजनी सहित है जैसे जाता । अंधार सारा ॥ ९७० ॥ अज्ञानके गर्भमें जैसे । कर्म कर्ता औ' कार्य ऐसे । यह त्रिपुटी रहनेसे । गर्भिणी ही मरी ॥ ७१ ॥ ऐसे अज्ञान नाशके साथ । नष्ट होते हैं सभी क्रिया जात । ऐसे समूल संभव पार्थ । होता संन्यास ॥ ७२ ॥ मूल अज्ञान संन्याससे ऐसे । दृश्यका स्थान ही मिट जानेसे । वहां जानना रहता है ऐसे । आत्मतत्व ॥ ७३ ॥ जगने पर जैसे अर्जुन । डूबे थे ऐसे स्थान । करना पड़ता क्या गमन । बचानेको ॥ ७४ ॥ जो न मैं जानता वह जानूंगा । ऐसा दुष्ट स्वप्न जब मिटेगा । ज्ञाता ज्ञान विरहित जो होगा । चिदाकाश केवल ॥ ७५ ॥ सुखाभास सह वह दर्पण । दूर करनेसे अर्जुन । रहता देखनेके बिन । देखनेवाला जो ॥ ७६ ॥ वैसे न जानना जो गया । साथ जानना भी ले गया । फिर निष्क्रिय रह गया । चिन्मात्रा ही ॥ ७७ ॥ स्वभावसे वहां धनंजय । न रही किसी भांतिकी क्रिया । इसीलिये वह कहा गया । नैष्कर्म्य ऐसा ॥ ७८ ॥ होता है जब वायुका लोप । उससे होता तरंग लोप । तब जैसे रहता है आप । समुद्र मात्र ॥ ७९ ॥ ७९७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऐसे होना जब नहीं घड़ता । वह नैष्कर्म्य सिद्धि है कहाता । सभी सिद्धियोंमें यह जो होता । परम श्रेष्ठ ॥ ९८० ॥ मंदिरके कार्यमें कलश । गंगाकी सीमा सिंधु-प्रवेश । वैसे सुवर्ण-सिद्धिमें कस । सोलहवा अंतिम ॥ ८१ ॥ ऐसे अपना अज्ञान । मिटा देता जो वह ज्ञान । वह भी निगल अर्जुन । रहनेकी दशा ॥ ८२ ॥ इसके पर कुछ नहीं । पाना ऐसे रहता नहीं । इसीलिये कहना यही । परम-सिद्धि ॥ ८३ ॥ किंतु यही जो आत्म-सिद्धि । जैसे है कोई भाग्य-निधि । श्रीगुरुकृपा-उपलब्धि । होती तब मिलती ॥ ८४ ॥ सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥ ब्रह्मत्व-सिद्धिका विवेचन— उदय होते ही दिनकर । प्रकाश ही होता है अंधार । अथवा दीप सह् कर्पूर । होता है दीप ॥ ८५ ॥ अथवा लवण-कणिका । मिलकर जैसे उदका । होती है आप भी उदक । उसी प्रकार ॥ ८६ ॥ या निद्रित होता है जागृत । स्वप्न सह् नींद होती व्यर्थ । तथा अपना रूप जागृत । पाना जैसे ॥ ८७ ॥ जिस किसीके सुदैवसे । श्रीगुरु-वाक्य श्रवणसे । द्वैत निगल स्थिरतासे । रहता स्ववृत्तिमें ॥ ८८ ॥ श्रवण वचनका मिलन । होते ही जैसे सुन अर्जुन । स्वयं-स्वरूप हो जाना मान । अपने आपमें ॥ ८९ ॥ मिला है सिद्धिमें ब्रह्म कैसे किस प्रकारसे । ज्ञानकी श्रेष्ठ जो निष्ठा अल्पमें कहता सुन ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९८
उसको फिर कुछ करना । रहता क्या कह अर्जुन । आकाशको आना तथा जाना । रहता है क्या ॥ ९९० ॥ इसीलिये उसको कहीं । त्रिशुद्धि करना है नहीं । न हुवा ऐसे कुछ कहीं । उसके लिये ॥ ९१ ॥ उन्हे स्व-कर्मकी अग्निमें । काम्य निषेध ईंधनमें । रज तमको जलानेमें । करना प्रारंभ ॥ ९२ ॥ पुत्र वित्त तथा परलोक । इन तीनोंका जो अभिलाष । हुवा जैसे अपना सेवक । ऐसे होगा ॥ ९३ ॥ स्वैर इंद्रियोंमें सर्व-स्पर्शसे । आई हुई जिस मलिनतासे । मुक्त करनेमें प्रत्याहारसे । किया जाता स्नान ॥ ९४ ॥ तथा स्वधर्मका जो फल । ईश्वरार्पण करके बल । लेकर किया है गरल । वैषम्यका वह ॥ ९५ ॥ आत्म-साक्षात्कारमें ऐसे । ज्ञानका उत्कर्ष हो कैसे । इसकी सामग्री जो ऐसे । पाता है वह ॥ ९६ ॥ तथा है ऐसे ही समय । सद्गुरु मिले धनंजय । उसने ज्ञान-दान कार्य । सही किया तो भी ॥ ९७ ॥ वैराग्यका लाभ और श्रीगुरुके लोभसे अनुभव-अंकुर फूटता है- औषध लेते ही तत्क्षण । रोगमें आयेगा क्या गुण । या सूर्योदयसे तत्क्षण । मध्यान्ह होगा क्या ॥ ९८ ॥ सुक्षेत्र तथा है जो तर । बोया बीज गला सुंदर । किंतु फल आनेमें देर । लगेगा ही ॥ ९९ ॥ चले मार्ग पर जो सरल । वहां मिला सत्संगका मेल । पहुंचने तक कुछ काल । लगेगा ही ॥ १००० ॥ ऐसे हुवा वैराग्यका लाभ । तथा मिला श्रीगुरुका लोभ । अंतःकरणमें फूटा कोंब । विवेकका ॥ १ ॥ ७९९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
वह ब्रह्म ही एक सत । दूसरा संपूर्ण है भ्रांत । इसको जिसने प्रतीत । किया है दृढ ॥ २ ॥ किंतु वह जो परब्रह्म । सर्वात्मक है सर्वोत्तम । जिससे मोक्षका भी काम । रहता नहीं ॥ ३ ॥ अपनेमें ही यह जो ज्ञान । पचाता तीनो अवस्था जान । उस ज्ञानका भी आलिंगन । करती जो वस्तु ॥ ४ ॥ ऐक्यकी एकता होती समाप्त । आनंद कण भी होता है लुप्त । कुछ न करके रहता नित । जो है कुछ ॥ ५ ॥ उस ब्रह्ममें ही लय होकर । रहना है ब्रह्म ही बनकर । क्रमसे उसको भी प्राप्त कर । लिया है तब ॥ ६ ॥ जैसे है कोई बुभुक्षित । करता षड्रसान्न प्राप्त । तब प्रति ग्राससे तृप्त । होता है वैसे ॥ ७ ॥ मिला वैराग्य-स्नेहका भरण । विवेक दीप कर प्रज्वलन । उसमेंसे आत्म-तत्व निधान । पा लेना है ॥ ८ ॥ भोगना है आत्म-ऋद्धि । इतनी योग्यता सिद्धि । जिसने है निरवधि । पायी भूषण रूप ॥ ९ ॥ जिस क्रमसे वह ब्रह्म । होता जाता यह सुगम । उस क्रमका अब मर्म । कहता हूं सुन ॥ १०१० ॥ बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ द्वंद्व चिंता छोड़ कर स्व-चिंतन करना शुद्ध-बुद्धि है— श्रीगुरुके दिखाये मार्ग पर । चारु विवेक-तीर्थ तटपर । साधक बुद्धिका मल धोकर । तदुपरांत ॥ ११ ॥ जुड़ाके सात्विकी बुद्धि धृतिकी डोर खींचके । तजके शब्द स्पर्शादि जीतके राग-द्वेषको ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८००
फिर जो राहुके मुखसे मुक्त । चंद्र-प्रभा चंद्रसे आलिंगित । वैसे शुद्ध बुद्धि करती प्राप्त । अपने ही रूपको ॥ १२ ॥ जैसे दोनों कुलको तजकर । प्रिया प्रियमें रत निरंतर । वैसे द्वंद्व चिंतन तजकर । करती स्वचिंतन ॥ १३ ॥ वैसेही ज्ञान जैसे जीवन । विषयोंमें ले जा अनुदिन । इंद्रियोंसे किये बडे जान । शब्दादिक जो ॥ १४ ॥ दूर होते ही रश्मि जाल । मिट जाता है मृगजल । वैसे ही धृतिसे निर्मल । किये पांचोंही ॥ १५ ॥ खाया हुवा जो अधमान्न । करते हैं जैसे वमन । इंद्रियोंसे ऐसे वासना । सह किया विजय ॥ १६ ॥ आत्माकार वह वृत्ति फिर । लगाके गंगाके तट पर । प्रायश्चित्त किया जो धोकर । शुद्धिकारक ॥ १७ ॥ तब उसने सात्विक दृष्टिसे । विशुद्ध किये हुए इंद्रियोंसे । मन सह योग-धारणासे । लगाई वह ॥ १८ ॥ वैसे ही प्राचीन इष्टानिष्ट । होती है भोगोंसे जब भेंट । आयी हुई कटुतासे रुष्ट । होते नहीं कभी ॥ १९ ॥ या मिले सुंदर विषय । प्रारब्धवश धनंजय । न करते उस समय । अभिलाषा भी ॥ १०२० ॥ ऐसे इष्टानिष्टमें पार्थ । रागद्वेषसे हो रहित । वन गिरि-गुहामें नित । करते वास ॥ २१ ॥ साधनावस्थाका विवेचन— भीड भाड तजकर । वनस्थलमें जाकर । अंगों सह धनुर्धर । रहता आप ॥ २२ ॥ शम-दमादिकोंसे खेलना । सदा मौनसे ही है बोलना । गुरु-वचनोंमें बिताना । समय सारा ॥ २३ ॥ (90) ८०१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोशी
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना । या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥ करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन । संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥ आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे । रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥ जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन । वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥ दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता । वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥ शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना । ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥ तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट । वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥ ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश । आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥ गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित । दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥ अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ । ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥ ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता । तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥ वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन । दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०२
इसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष । सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥ अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय । उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥ आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध । होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥ कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर । आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥ सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग । उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥ नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर । मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥ योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर । किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥ तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन । आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥ वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा । वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥ देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक । तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥ ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन । साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥ इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य । करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥ वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर । वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥ ८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
फिर जो दृश्य दृष्टि-पथमें आता । उसमें जो छोटा बड़ा दीखता । उसे मिटाने ध्यान खड्ग धरता । विवेक मुष्टिमें ॥ ४८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्म प्राप्ति पथके ये शत्रु— ऐसे संसार-रणांगण पर । सूर्यसा जाता चीरता अंधार । मोक्षश्रीका बनने भर्त्तार । निर्भय होके ॥ ४९ ॥ वहां जो रोकने आता । उस वैरीको मारता । उसमें पहला होता । देहाहंकार ॥ १०५० ॥ मार कर वह नहीं छोड़ता । जन्म देकर जीने नहीं देता । पेंचमें डाल कुंठित करता । अस्थि पंजरके ॥ ५१ ॥ देह दुर्ग उसका सहारा । तोड कर लिया धनुर्धरा । तथा बल है यह दूसरा । मारा शत्रू ॥ ५२ ॥ विषयोंका नाम ही सुनकर । बढ़ जाता चौगुनेसे ऊपर । मृतावस्थामें यह धनुर्धर । पहुंचाता विश्वको ॥ ५३ ॥ वह है विषय-विषका गर्त । सब दोषोंका चक्रवर्ती पार्थ । किंतु कैसे ध्यान-खड्गका घात । सहेगा वह ॥ ५४ ॥ प्रिय विषय जब होते प्राप्त । उस सुखको कर अभिव्यक्त । वही आवरण डालके पार्थ । करता है गर्जना ॥ ५५ ॥ सन्मार्गको ही जो भुलाता । अधर्म वनमें फंसाता । बाघके मुखमें है देता । नरकादिक ॥ ५६ ॥ विश्वाससे मारता जो रिपु । निर्मम कर देता है दर्प । जिसके नामसे आता कंप । तपस्वियोंको ॥ ५७ ॥ बल दर्प अहंकार काम क्रोध परिग्रह । छोड़ कर स-ममत्व पाता है ब्रह्म शांतिसे ॥ ५३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०४
क्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक । भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥ वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर । क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥ जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे । वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥ इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम । मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥ जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ । वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥ वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता । जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥ शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे । डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥ घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता । नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥ अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय । भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥ अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण । वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥ सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण । उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥ तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें । दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥ बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब । योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥ ८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तब ऋद्धि सिद्धिके समुदाय । आते रहते समय समय । उस पुष्प-वृष्टिसे धनंजय । नहाता रहता वह ॥ ७१ ॥ इस भांति ब्रह्मैक्यके समान । स्वराज्य आता है समीप जान । आनंदसे तीनों लोक अर्जुन । भर देता है ॥ ७२ ॥ शत्रु-मित्रभाव तब अर्जुन । नहीं रहता साम्यके कारण । न होता द्वंद्व अणु समान । उस समय ॥ ७३ ॥ यही नहीं किसी कारणसे । कभी कहें यह मेरा ऐसे । इतना द्वैत भी प्रतीतिसे । न जानता वह ॥ ७४ ॥ एक मात्र तब अपनी सत्ता । विश्व-व्यापी करके पांडुसुता । पास फटकने न देता ममता । इतना भी वह ॥ ७५ ॥ जीतकर ऐसा रिपुवर्ग । आप बन गया सारा जग । तब होगया तुरंत योग । वहां सुदृढ ॥ ७६ ॥ अपने पथके शत्रुओंको जीतनेके बाद— फिर वैराग्यका आवरण । तनपे दृढ था जो अर्जुन । करता शिथिल कुछ क्षण । उस समय ॥ ७७ ॥ चलाने ध्यानकी जो तलवार । सम्मुख नहीं द्वैत धनुर्धर । तब होता है ध्यानका भी कर । कुछ शिथिल ॥ ७८ ॥ अथवा रसौषधि जैसे । अपना काम हो जानेसे । आप ही न रहती वैसे । उसी प्रकार ॥ ७९ ॥ जैसे है जहां पहुंचना होता । वह स्थान देख पैर रुकता । वैसे ब्रह्म-दर्शनसे होता । अभ्यास शिथिल ॥ १०८० ॥ जैसे सिंधुसे संपर्क आता । गंगाका वेग भी उतरता । या पतिसे मिलके स्थिरता । आती कामिनीमें ॥ ८१ ॥ अथवा आता है जब फल । बढ़ न सकता जब केल । या गांव आते जैसे केवल । रुकता मार्ग ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०६
वैसे ही आत्म-साक्षात्कार । होता है यह देख कर । साधनाका जो हथियार । रखता नीचे ॥ ८३ ॥ इसीलिये ब्रह्मसे उसका । समय आने पर ऐक्यका । शिथिल होता है साधनोंका । वेग पार्थ ॥ ८४ ॥ वैराग्यका फिर है तिरोधान । नानाभ्यासका वार्धक्य अर्जुन । योग फलका परिपाक जान । दशा है जो ॥ ८५ ॥ तब वह शांति मान पांडुसुता । उसके अंगांगमें आती पूर्णता । ब्रह्मत्व पाके योग्य है वह होता । पुण्य-पुरुष ॥ ८६ ॥ पूर्णिमासे जैसे चतुर्दशी । अल्पत्वमें रहता है शशी । या सोलहवे कससे जैसे । पंद्रह होता अल्प ॥ ८७ ॥ सागरमें जाता पानी वेगसे । वह होता गंगौघका जैसे । तथा जो निश्चलतासे । रहता सिंधुका ॥ ८८ ॥ ब्रह्म या ब्रह्मत्वके निकट । व्यक्ति होता उसमें सुभट । ऐसा अंतर जो वह काट । पाता ब्रह्मत्व ॥ ८९ ॥ परंतु ऐसे हुए बिन । प्रतीत होता ब्रह्मपन । वही ब्रह्म होनेकी जान । योग्यता है वहां ॥ १०९० ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ वह ब्रह्म-भाव योग्यता । पुरुष फिर पांडुसुता । आत्म-बोधकी प्रसन्नता । पद पाता है ॥ ९१ ॥ जिस तापसे होता है पाक । वह जाता पकनेपे पाक । फिर जैसे आह्लाद कारक । होता है वह ॥ ९२ ॥ अनेक प्रवाह जैसे लगभग । शरत्कालमें तजते है गंग । अथवा गीत होनेपे उपांग । रुकते जैसे ॥ ९३ ॥ हुवा ब्रह्म प्रसन्नात्मा कामना शोकके बिन । पाता मेरी परा भक्ति देखती साम्य जो कहीं ॥ ५४ ॥ ८०७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम । उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥ आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! । उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥ ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन— उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना । डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥ उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति । लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥ उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था । तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥ पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर । वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥ वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न । वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥ फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन । उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥ जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय । वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥ जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता । फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥ या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥ या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता । शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०८